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कविताएँ

मदहाेशी

March 15, 2017 02:35 PM

— शिखा शर्मा
पीली-पीली सरसाें के लहराते खेत
हरे चनाें से लदा पाैधा हर एक
रंग-बिरगीं फसलाें का नजारा देख
बिन नशे मदहाेश करते है

गांव की गाेरियाें री पायल की झनकार
गागर से गिरती पानी की बाैछार
मुड़-मुड़ उनका पीछे देखना साै बार
बिन नशे मदहाेश करते हैं

मिट्टी के चूल्हे में जलती आग
पतीले में पकता सरसाें का साग
मक्की की राेटी और मक्खन का स्वाद
बिन नशे मदहाेश करते हैं

गांव किनारे वो खेल का मैदान
सांझ में शरारत करते बच्चे और जवान
मिट्टी से सना तालियां बजाता नन्हा नादान
बिन नशे मदहाेश करते हैं

पतली सी गलियां, बड़े-बड़े घर
सुस्वागतम से सजे दहलीज—औ—दर
भजन-कीर्तन के सुनते ऊंचे-ऊंचे स्वर
बिन नशे मदहाेश करते हैं।

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