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कविताएँ

विरह

April 14, 2017 03:58 PM

— शिखा शर्मा
विरह के अश्रु न बरस जाएं कहीं नयनों से
थाम लेना गालों पर गिरने से पहले
भीगी पलकें भी उतार देती है आँखों का काजल
स्याही का अंधेरा न छाए चेहरे पर
बस! इतना ख्याल रखना तुम

सिमट गई हूं तेरे लबों के अल्फाजों तक
लफ्जों को सहेज रखा है दिल की किताब में
पन्ने पलटने से पहले
वादों से न कहीं मुकर जाना
बस! इतना ख्याल रखना तुम

प्रेम रस की मिठास में ऐसे हूं डूबी
तैरती कश्ती भटकती देह लगे
डूबी रहूं तुझ में मग्न होकर
चित उबने पर बीच मझधार मत छोड़ जाना
बस! इतना ख्याल रखना तुम

सोलह श्रृंगार की दीवानी हूं इतनी
बागों की मेहंदी भी फीकी पड़े
हृदय की डाली पर खिला है प्रेम पुष्प
प्रेम का फूल कोई और मेरी डाली से न तोड़े
बस! इतना ख्याल रखना तुम

सांझ-सवेरे सांसे रटती है तेरी नाम की तस्वीह
रेशमी धागे में पिरोया अनमोल मोती जैसा तूं
बांधे रखना इस अटूट बंधन में
डोर टूटने से पहले तेरी बांहों का हार मिले
बस! इतना ख्याल रखना तुम

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