ENGLISH HINDI Monday, December 16, 2019
Follow us on
 
ताज़ा ख़बरें
ग्रेट पेरेंट्स डे पर वेद धारा ग्लोबल स्कूल में दादा दादी की धूम‘स्पाईमास्टरज़ और साईबर इंटेलिजेंस इन वॅार एंड पीस’ विषय पर हुई चर्चा ने साईबर सुरक्षा के कई अछूते पक्षों पर प्रकाश डालाबालाकोट एक्शन पर रक्षा विशेषज्ञों द्वारा गंभीर विचार-चर्चाभवन निर्माण व निर्माण श्रमिकों की रजिस्ट्रेशन का समय 31 मार्च तक बढ़ाने के आदेशअफगानिस्तान में 18 साल से तालिबान के साथ लम्बी लड़ाई लड़ रहा अमरीका हार की कगार परपेडा ने बायोमास आधारित ऊर्जा प्लांटों पर बातचीत सैशन करवायाशरीर के लिए जरूरी पौष्टिक तत्वों व कैलोरी की मात्रा कम नहीं होनी चाहिएआरटीआई में नगर परिषद् का अजीबोगरीब जवाब, हाईकोर्ट ने किया जवाब तलब
कविताएँ

बिखरे परिवेश

July 27, 2017 11:50 AM

रेगिस्तान भी हरे हो जाते हैं
जब साथ अपने खड़े हो जाते हैं
मुंह मोड़ लेते हैं अपने तब
हरे—भरे खेत—खलिहान भी सूख कर बंजर हो जाते हैं।
हो कोई जो भी गिले—शिकवे
वे मिल बैठ कर निपटाए जाते हैं
चंद मेरे लोग तो ऐसे हैं कि
उलाहनों के पिटारे भर-भर के लाते हैं
हालातों के मंजर को कर दरकिनार
सहयोग भी ना देकर
सहानुभूति जताकर इतराते हैं
क्या कहूं अब टूटते परिवेशों में
पलते इन होनहारों के बारे
लाज-हया को दरकिनार कर
न जाने अपनी कौन सी महानता दर्शाते हैं
अब अपने ही अपनों को
दुनियां के सामने नीचा दिखाते हैं
प्रकृति का शाश्वत नियम है
हो मंजर या नजारे कुछ भी
आखिर बदल ही जाते हैं
मृत्यु तो तय हो जाती है
जन्म के साथ ही
बचे जीवन के पल तो
कभी हंसाते कभी रूलाते हैं
तो क्यूं व्यर्थ ही आरोप—प्रत्यारोप के
ढेरों को सजाते हैं।
तुम कुछ करो न करो ये तुम्हारी रज़ा
मेरे हाथ स्वयं ही सहयोग को आतुर हो जाते हैं
रोशन

कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें