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कविताएँ

मेरा वजूद

August 02, 2017 06:13 PM

मैं कुछ भी नहीं 

फिर भी
बहुत कुछ हूं
एक अदना सा कलमकार
पन्नों का कलाकार
एक मैकेनिक
इलेक्ट्रिशियन
धोबी
और वो सब कुछ
जो जिंदगी जीने के लिए मांगती है
समय परिवर्तनशील है
बदल रहा है निरंतर
बदलेगा ही और बहुत कुछ
समय से पूर्व घट जाएं जो घटनाएं
वे नहीं जाती भुलाई
साथ जो पंसंद थी उसे
रहने न दिया परवरदिगार ने
दूसरी कोई ना मन को भायी
मैं कुछ भी नहीं
पर बहुत कुछ हूं
आकांक्षा यही होती है प्रस्फुटित
बोझ न बन जाउं किसी पर
कहीं ऐ मौत!
समय पर चलकर
यदि तूं न आई
तेरे स्वभाव से कुछ—कुछ
वाकिफ हो चला हूं
तूं निठल्ली या तो
समय से पूर्व आती है
या फिर
नाजो—नखरे दिखाती
कफन को तरसाती है
तुम्हें खुला निमंत्रण है
हृदय से तेरा है स्वागत
बैठा कर अपनी गोद में
वो चैन की नींद सुला देना
मैं कुछ भी नहीं फिर भी
बहुत कुछ हूं
— रोशन

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