ENGLISH HINDI Wednesday, August 22, 2018
Follow us on
कविताएँ

विहान मयूख

September 11, 2017 02:44 PM

— शिखा शर्मा
नभ से छिपने लगे हैं तारे
गगनचर चहकने लगे है सारे
फूट पड़ी है लौ मार्तण्ड की
देख कुसुम खिले है कितने प्यारे
छंट गया तिमिर का बदरा
रोशन हुआ खुशियों का अंगना
गतिमान है ऊर्जा की धारा
बूंद-बूंद रस घुलता न्यारा
पग-पग अनुभव कर ले राही
निद्रा की चादर छोड़
कर ले नई मंजिल की तैयारी
देख चली है पिपीलिका की पंक्ति
सूक्ष्म होकर भी अपार की शक्ति
न थकना न रुकना
न ललाट ठेंडुना
न भास्कर के पीछे चलना
नई राह की नई मुसाफिर
रोज़ नई मंजिल चुनना
समय की गति का मुसाफिर
समय के साथ ही चल
मंजिल बना
छोर तक पहुंचने का फल पा

कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें