धर्म

धर्म शांतिपूर्वक रहने की कला सिखाता है: सौरभ मुनि

October 14, 2017 07:27 PM

चंडीगढ़, (कुलबीर सिंह कलसी)
धर्म जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य है| धर्म ही जीवन का सार है| पुण्य शुभ प्रवृति। नेक कार्य है परन्तु धर्म प्रवृति नहीं, निर्वृति है| सुख-साधनों से सुख तथा दुःख दोनों मिलते है परन्तु सुख-साधनों का उपयोग करने की कला धर्म सिखाता है| धर्म से ही अच्छे संस्कार मिलते है तथा व्यक्ति शांति से रह सकता है| सुख-साधन प्राप्त हो जाने से भी विवेक, बुद्धि नहीं मिलते| लोग पुण्य तो करते है, परन्तु धर्म नहीं करते| शांति, सद्गति तथा मोक्ष- पुण्य से नहीं, धर्म से ही प्राप्त होते है| मन की पवित्रता ही धार्मिक ह्रदय की कसौटी है| धर्म बन्धन नहीं है, यह बन्धनों को खोलता है | यह आत्मा को विशुद्ध स्वभाव की ओर ले जाता है तथा मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है| जो धरती को धारण करता है, वही धर्म है | प्रत्येक व्यक्ति का दूसरे के प्रति जो कर्तव्य है, वह भी धर्म कहा जाता है | लोग धर्म के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझते | क्रियाकांड धर्म नहीं है, वे धर्म के लिए किए जाते है | धर्म में मुलत: कोई अन्तर नहीं है | सम्प्रदाय के आधार पर ही धर्म को अलग-अलग कहा जाता है| धर्म तो एक ही है| धार्मिक अनुष्ठानों में भावना, चिन्तन का ही महत्व है| क्रियाकांडों के आधार पर ही व्यक्ति को धार्मिक नहीं कहा जा सकता| जहां धर्म होता है, वहां प्रेम और मैत्री के संबन्ध होते है| आत्मा के सद्गुणों में ही धर्म का वास होता है| यह बात आज सेक्टर 18 स्थित जैन स्थानक में चातुर्मास के लिए विराजित संत श्री सौरभ मुनि जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कही| सभा के प्रचार सचिव नीरज जैन ने बताया की रविवार 15 ओक्टूबर को जैन स्थानक में सामायिक दिवस मनाया जायेगा।

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