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संपादकीय

नासमझी व उतावनेपन के चलते सोना पाने से वचिंत है किसान

January 30, 2018 06:03 PM

— रोशन
किसान सोना उगाता तो है ही, उसके आस—पास भी सोने के घटक बिखरे पड़े हैं। बावजूद इसके किसान अपनी नासमझी के चलते और उतावनेपन से इस सोने के घटकों को चुनने के बजाए जहर को चुनता आ रहा है। सिर्फ और सिर्फ आस—पास की लुभावनी जुमलाबाजी में जुमलाबाजों की जादुगिरी के कारण। किसान न केवल हाड—तोड़ मेहनत करता है बल्कि उसके पास वे सभी साधन भी पहले से मौजूद है जो उसके आस—पास बिखरे घटकों को सोने में बदल सकते हैं। और अब तो सरकारें भी इस पर सबसिडी देने का ऐलान कर चुकी है।
बड़ी— बड़ी कंपनियां कृतिम खाद और जहरीले कीटनाशकों का उत्पादन कर इनकी खपत के लिए किसानों को लुभाती रही है। और किसान उनके भयावह नुक्सान से अनजान होकर धड़ले से इनका बहुतायत में प्रयोग में लगा है। कम समय में अधिक की चाह में धरती को बंजर भी बना रहा है। वह स्वयं , उसकी अपनी पीढी और दूसरे भी इस जहर से प्रभावित हो रहे हैं। इसके उलट वह आस—पास बिखरे घटकों जैसे कि प्रयोग में न आने वाली सामग्री पेड़ों के सूखे पत्तों, ताजा पतों, सब्जियों के न प्रयोग में आने वाले हिस्से, गले—सड़े फल व सब्जियों को उपयोग में लेकर यदि 'कम्पोस्ट' का खुद ही निमार्ण करने में जुट जाए तो बहुत ही कम मेहनत और बिना किसी अतिरिक्त खर्च के एक उत्तम खाद प्राप्त करके अपने खेतों में अधिक सोना उपजा सकता है। और बढते जहर के प्रभाव से आने वाली पीढी को बचाने के साथ—साथ देश की स्वच्छता में अपना भारी योगदान दे सकता है। 'कम्पोस्ट' बनाने का तरीका बड़ा आसान है। इसके लिए जितनी जमीन चाहिए उससे सैकड़ों गुणा जमीन तो उनके पास है ही, वह कच्ची सामग्री भी उसके ही खेतों में उपलब्ध है। कमी है तो सिर्फ और सिर्फ जागरूकता की। जबकि इसी का फायदा उठाकर अन्य उद्योगपति बने बैठे लोग ये ही खाद बना कर किसानों को बेच रह हैं और मोटा मुनाफा कमा रहे है। किसान है कि जो दिन रात कड़ी मेहनत तो करता है लेकिन ये काम स्वयं न करके इसी तरह की बनी बनाई कम्पोस्ट खाद लेकर डालता है या फिर जहरीली खादें और कीटनाशक खरीद करने में आतुर है। जिससे उसका खर्च भी अत्याधिक बढ जाता है और इनके दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ होते हुए आने वाली पीढी को सजा देने की ओर कदम बढाए हुए है। खुद भी कर्ज के बोझ तले दब कर आत्महत्या जैसे कुकृत्य की ओर जा रहा है।
पिछले दिनों पंजाब, हरियाणा व देश की राजधानी के आसपास किसानों द्वारा की गई भूल का परिणाम किसानों से स्वयं तो भुगता ही, अन्य देशवासियों को भी भुगतना पड़ा। बड़े स्तर पर देखा—देखी धान की पराली को आग के हवाले कर दिया गया जिसके बड़े भयावह परिणाम सामने आए। इस क्रिया क्लाप से उपजी दुर्घटनाओं के चलते कईयों के घर उजड़ गए। लोग रोग—ग्रस्त हो गए। कारण इतना सा है कि नाड़ को जलाना, कटाई से कुछ सस्ता पड़ना। उसी पराली को अन्य कार्यो में उपयोग लिया जाता या किसान खुद के लिए ही खाद के रूप में उपयोग करे तो देशहित में उनका बड़ा हाथ सिद्ध होता।
पिछले दिनों देश के कई स्थानों से मेरे पास खबरें छपने के लिए आई थी कि किसानों को नहीं मिल रही यूरिया खाद। बेची जा रही है काला बाजारी में। तो इसका सीधा सा फंडा है कि कालाबाजारी का खेल भी मांग और उत्पादन पर टिका है। मांग अधिक होगी और उत्पादन कम या सीमित होगा तो चंद लोगों द्वारा ये खेल वर्षों से खेला ही जाता रहा है। इसी खेल की कमर तोड़ने के लिए किसानों को स्वयं जागृत होना होगा। यदि वे अपने जरूरत का उत्पादन अपने खेतों में करके उपयोग में लाते हैं तो मांग खुद—ब—खुद घटेगी और हार कर काला बाजारी का खेल खत्म होगा व साथ ही देश को जहर मुक्त वातावरण देने में अनुकरणीय सहयोग होगा।

— लेखक फेस2न्यूज के संपादक हैं, और अनेक राष्ट्रीय व प्रांतीय दैनिक समाचार पत्रों से जुड़े रहे हैं।

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