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राष्ट्रीय

होलिका दहन कोई परंपरा या अंधविश्वास नहीं, इसके पीछे हैं बड़े वैज्ञानिक कारण

March 01, 2018 12:53 PM

होलिका दहन की परंपरा कोई अंधविश्वास नहीं है बल्कि इसका वैज्ञानिक कारण भी है। ठंड का मौसम खत्म होता है। गर्मी के मौसम की शुरूआत होती है और ऐसे समय को संक्रमण काल कहते है, हमारे ऋषि मुनियों ने अपने ज्ञान और अनुभव से मौसम परिवर्तन से होने वाले संक्रमण के बुरे प्रभावों को जाना और ऐसे उपाय बताए जिसमें शरीर को रोगों से बचाया जा सके।
आयुर्वेद के अनुसार दो ऋतुओं के संक्रमण काल में मानव शरीर रोग और बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार शिशिर ऋतु में शीत के प्रभाव से शरीर में कफ की अधिकता हो जाती है और बसंत ऋतु में तापमान बढऩे पर कफ के शरीर से बाहर निकलने की क्रिया में कफ दोष पैदा होता है, जिसके कारण सर्दी, खांसी, सांस की बीमारियों के साथ ही गंभीर रोग जैसे खसरा, चेचक आदि होते हैं। इनका बच्चों पर प्रकोप अधिक दिखाई देता है। इसके अलावा बसंत के मौसम का मध्यम तापमान तन के साथ मन को भी प्रभावित करता है। यह मन में आलस्य भी पैदा करता है।
इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से होलिकोत्सव के विधानों में आग जलाना, अग्नि परिक्रमा, भजन, कीर्तन आदि शामिल किए गए। अग्नि का ताप जहां रोगाणुओं को नष्ट करता है, वहीं भजन कीर्तन, ढोलक, मंजीरे और शंख धवनि से अन्य क्रियाएं शरीर में जड़ता नहीं आने देती और कफ दोष दूर हो जाता है। शरीर की ऊर्जा और स्फूर्ति कायम रहती है। मन उमंग से भर जाता है और नई कामनाएं पैदा करता है। इसलिए बसंत ऋतु को मोहक प्रधान ऋतु माना जाता है!
इन संक्रामक रोगों के रोगाणुओं को वायुमंडल में ही भस्म कर देने का यह सामूहिक अभियान होलिका दहन है। पूरे देश में रात्रि काल में एक ही दिन होली जलाने से वायुमण्डलीय कीटाणु जलकर भस्म हो जाते हैं। यदि एक जगह से ये उड़कर कीटाणु दूसरी जगह जाना भी चाहे तो उन्हें स्थान नहीं मिलेगा।
आग की गर्मी से कीटाणु भस्म हो जाएंगे। साथ ही जलती होलिका के चारो और परिक्रमा करने से एक सौ चालीस फेरेनहाइट गर्मी शरीर में प्रवेश कर जाती है। उसके बाद यदि रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु हम पर आक्रमण करते हैं तो उनका प्रभाव हम पर नहीं होता बल्कि हमारे अंदर आ चुकी उष्णता से वे स्वयं नष्ट हो जाते है।
होली रंगों का त्यौहार है। रंगों का हमारे शारीर और स्वास्थ्य पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। प्लाश अर्थात ढाक के फूल यानी टेसुओं का आयुर्वेद में बहुत ही महत्व पूर्ण स्थान है। इन्ही टेसू के फूलों का रंग मूलत: होली में प्रयोग किया जाता है। टेसू के फूलों से रंगा कपड़ा शारीर पर डालने से हमारे रोम कूपों द्वारा स्नायु मंडल पर प्रभाव पड़ता है। और यह संक्रामक बीमारियों से शरीर को बचाता है।
यज्ञ मधुसुदन में कहा गया है —
एतत्पुष्प कफं पितं कुष्ठं दाहं तृषामपि ।
वातं स्वेदं रक्तदोषं मूत्रकृच्छं च नाशयेत ।।
अर्थात ढाक के फूल कुष्ठ, दाह, वायु रोग तथा मूत्र कृच्छादी रोगों की महा औषधी है।
होलिका दहन से पूर्व शाम को, गणेश पूजन, विष्णु पूजन भी किया जाना चाहिए क्योंकि यह त्यौहार विशेष रूप से भक्त और भगवान का त्यौहार है और भगवन विष्णु ही अपने भक्त की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे इसलिए इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जानी चाहिए
होलिका दहन में कुछ मत्वपूर्ण कार्य :
भूल कर भी अपने घर की पुरानी लकड़ी, टूटी कुर्सी, मेज अत्यादी की लकड़ी को होलिका दहन में प्रयुक्त न करे इससे आपके उपर अनिष्ट आने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यह कोई कचरा जलाने का समय और स्थान नहीं है यह एक बड़ा ही पवित्र कार्य है और इसके लिए पवित्र सामान ही उपलब्ध होने चाहिए!
शास्त्रों में भी लिखा है की गौ + वर (गाय का वरदान ) = गोबर में लक्ष्मी से निवास करती है तो यदि आप वर्षभर धन सम्पदा से युक्त रहना चाहते है तो होलिका दहन में गाय के गोबर से बने कंडे ही इस्तेमाल करें। आस पड़ोस में गाय न मिले तो किसी गौशाला से गोबर ला कर अपने घर पर बना लेना चाहिए! इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है कि गाय के गोबर से जो धुंआ निकलता है उससे, तपेदिक, (टी बी), फ्लू, डेंगू आदि के वायरस ख़त्म हो जाते है और यह बात आजकल के वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दी है।
शंख जरुर बजाना चाहिए। शंख धवनि जरूर सुने।
होलिका के समय खेतों में गेहूं और चने की फसल आती है। ऐसा माना जाता है कि इस फसल के धान के कुछ भाग को होलिका में अर्पित करने पर यह धान सीधा नैवैद्य के रूप में भगवान तक पहुंचता है। होलिका में भगवान को याद करके डाली गई हर एक आहूति को हवन में अर्पित की गई आहूति के समान माना जाता है। और फिर उसे घर में लाने से घर हमेशा धन-धान्य से भरा रहता है। इसलिए होलिका में धान डालने की परंपरा बनाई गई। आज भी हमारे देश के कई क्षेत्रों में इस परंपरा का निर्वाह किया जाता है।
विश्व व्यापी पर्व है होली:
होलिकोत्सव विश्व व्यापी पर्व है। भारतीय व्यापारियों के कालांतर में विदेशों में बस जाने के बावजूद उनकी स्मृतियों में यह त्यौहार रचा बसा है और समय के साथ साथ यह पर्व उन देशों की आत्मा से मिलजुल कर, मगर मौलिक भावना संजोते हुए विभिन्न रूपों में आज भी प्रचलित है।
इटली में यह उत्सव फरवरी माह में "रेडिका" के नाम से मनाया जाता है। शाम के समय लोग भांति -भांति के स्वांग बनाकर "कार्निवल" की मूर्ति के साथ रथ पर बैठकर विशिष्ट सरकारी अधिकारी की कोठी पर पहुंचते हैं। फिर गाने-बजाने के साथ यह जुलुस नगर के मुख्य चौक पर आता है। वहां पर सूखी लकड़ियों में इस रथ को रखकर आग लगा दी जाती है। इस अवसर पर लोग खूब नाचते-गाते हैं और हो-हल्ला मचाते हैं।
फ़्रांस के नार्मन्दी नामक स्थान में घास से बनी मूर्ति को शहर में गाली देते हुए घुमाकर, लाकर आग लगा देते हैं। बालक कोलाहल मचाते हुए प्रदक्षिणा करते हैं।
जर्मनी में ईस्टर के समय पेड़ों को काटकर गाड दिया जाता है। उनके चारों तरफ घास-फूस इकट्ठा करके आग लगा दी जाती है। इस समय बच्चे एक दूसरे के मुख पर विविध रंग लगाते हैं तथा लोगों के कपड़ों पर ठप्पे लगा कर मनोविनोद करते हैं।
स्वीडन नार्वे में भी शाम के समय किसी प्रमुख स्थान पर अग्नि जलाकर लोग नाचते गाते और उसकी प्रदक्षिणा करते हैं। उनका विश्वास है कि इस अग्नि परिभ्रमण से उनके स्वास्थ्य की अभिवृद्धि होती है।
साइबेरिया में बच्चे घर-घर जाकर लकड़ी इकट्ठा करते हैं। शाम को उनमें आग लगाकर स्त्री -पुरुष हाथ पकड़कर तीन बार अग्नि परिक्रमा कर उसको लांघते हैं
अमेरिका में होली का त्यौहार "हेलोईन" के नाम से 31 अक्टूबर को मनाया जाता हैं।" अमेरिकन रिपोर्टर" ने एक अंक में लिखा कि हैलोइन का त्यौहार अनेक दृष्टि से भारत के होली त्यौहार से मिलता-जुलता है। जब पुरानी दुनिया के लोग अमेरिका पहुंचे थे तो अपने साथ हैलोइन का त्यौहार भी लाये थे। इस अवसर पर शाम के समय विभिन्न स्वांग रचकर नाचने-कूदने व खेलने की परम्परा है।

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