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राष्ट्रीय

"प्रार्थना"

March 13, 2018 11:30 AM

— रोशन
प्रार्थना का सीधा और सपाट अर्थ है परमात्मा से संबंध स्थापित करना। ब्रह्मांड की विराट शक्ति यानी ईश्वर से जोड़ने में एक कड़ी है प्रार्थना। इस संबंध में विभिन्न विचारकों, धर्मों व लोगों का अलग—अलग मत है। कुछ इसे ईश्वर से निजी सीधा सवांद मानते हैं और कुछ सामूहिक प्रार्थना पर जोर देते और मानते हैं। संसार में लोग प्रार्थना की विभिन्न पद्धतियां अपनाए हुए हैं। प्रार्थना सभी करते हैं, लेकिन भेद कहां रह जाता है कि कहीं प्रार्थना स्वीकार हो जाती है और कहीं अस्वीकृत रह जाती है।
बात करें भारत की तो यह एक धर्मप्रधान देश है। जहां जनजीवन में धर्म व संस्कृति का बड़ा प्रभाव है। दिनचर्या में व्यक्ति पूजा-पाठ हेतू ईश्वर के समक्ष होता है और प्रार्थना यानी ईश्वर से अपना सीधा संबंध जोड़ने का प्रयास करता है।
यहां प्रार्थना को एक धार्मिक क्रिया मान कर करता है, लेकिन उस विराट के प्रति समर्पण कितना गहरा है ये सब कुछ या तो ईश्वर जानता है या प्रार्थनार्थी स्वयं। और प्रार्थना फलीभूत तभी होती है जब जहां, जितना समर्पण भाव गहरा होगा। भाव—भंगिमाओं से ईश्वर का कोई लेन—देन नहीं। ईश्वर-प्राप्ति के लिए आदर्श प्रार्थना आर्तता या व्याकुलता की भावा‍भिव्यक्ति पर निर्भर है। हृदय में जैसे भाव उठेंगे, ईश्वर तक प्रार्थना उसी रूप में फलीभूत होगी। कमोबेश सभी धर्मग्रंथों में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि ईश्वर से जिस भाव या भावना से प्रार्थना की जाती हैं, ईश्वर भी उसी रूप में उसे स्वीकार करता है। अत: मन तथा हृदय का पवित्र होना नितांत ही जरूरी है। माना गया है कि प्रार्थना मस्तिष्क या शरीर की क्रिया मात्र नहीं है। प्रार्थना में हम स्वीकार करते हैं कि कोई तो है,जो हम सबको रोशन किए हुए है। कोई तो है जो इस समूचे ब्रह्माण्ड का संचालन कर रहा है। प्रार्थना में अपने अहम का दमन होता है ना कि दंभ भरा जाता है कि मैंने ये—ये किया। प्रार्थना इस अर्थ पर जीवात्मा का परम आत्मा से मिलन का प्रकाशमय रास्ता है, प्रेममय संबंध है।
अधिकतर प्रार्थनाएं मांग को आधार बना कर की जाती हैं। जबकि प्रार्थना की मूलभूत आवश्यकता बे—शर्त मानी जाती है जो व्यर्थ नहीं जा सकती। लेकिन फिर भी अधिकतर प्रार्थनाओं में मांग की निहितता शामिल होती है। मंत्रोच्चारण व विधियां पूजा पद्धति या कर्मकांड कहला सकते हैं, प्रार्थना नहीं। प्रार्थना में तो उस परम तत्व, विराट से सीधे तौर पर बातें शामिल हैं। बिना किसी लगाव—लपेट और बिना किसी मांग के ह्रदय की सीधी—सीधी बातें।
''मैंने कहीं पढ़ा है कि एक बार एक पुजारी और नन्हा बालक मंदिर में प्रतिमा के आगे खड़े प्रार्थना कर रहे थे। पुजारी ने मंत्रोच्चारण किए, शब्दों में लंबी चौड़ी प्रार्थनाएं की। दूसरी ओर बालक आंखे बंद किए भाव—विभोर हुए खड़ा रहा। पंडित जी की प्रार्थना पूर्ण हुई तो उन्होंने स्वाभाववत् बालक से पूछ ही लिया कि कुछ प्रार्थना—वर्थाना याद भी है या यूं ही... तब बालक ने सहजता से उत्तर दिया कि पंडित जी मुझे कहां याद होते है आप की भांति ये श्लोक। मैनें तो भगवान जी को मुझे आता क-ख-ग सुना दिया और कह भी दिया कि आपकी मर्जी जिस भी क्रम में लगाना चाहो, जिससे प्रार्थना बन जाए, लगा लो। और हां! भगवान ने हामी भी भर ली... ऐसा लगा।''
धर्म से जुड़े लोगों का मानना है कि कोई प्रार्थना एक साथ कई लोग करें तो वह ज्यादा प्रभावशाली होती है। एक साथ प्रार्थना करने पर प्रकृति में तेजी से बदलाव होता है।
लेकिन महान संत, विचारक व दार्शनिक ओशो का मानना है कि प्रार्थना जीव और परमात्मा के बीच का निजी वार्तालाप है। ओशो कहते हैं प्रार्थना चेतना का फूल है। जिस क्षण हमारे प्राण धन्यवाद से भरे होते हैं, अनुग्रह से भरे होते हैं, कृतज्ञता से भरे होते हैं तो प्रार्थना का फूल खिलता है। जिस क्षण हमें ये अनुभूति होती है कि जीवन में कितना प्रेम और सौंदर्य है, प्रार्थना खिलती है। जिस क्षण आनंद की मस्ती अंदर फूटती है, प्रार्थना खिलती है। जब होश की मिट्टी में धन्यवाद का बीज गिरता है तब प्रार्थना खिलती है।
वह क्या है जो हमारी प्रार्थना को मलिन और दूषित कर देता है? एक तो हमारे दुखी चित्त की दशा, दूसरी हमारी यंत्रवत जीवन शैली। हम हमेशा शिकायत से भरे हुए जीते हैं। हम जब प्रार्थना करते हैं तब दुखी मन से करते हैं। उस प्रार्थना में शिकायत का भाव होता है। हम हमेशा कुछ माँग रहे होते हैं। तो हमारी प्रार्थना प्रार्थना न होकर भिक्षावृति हो जाती है। माँगना और शिकायत करना ये दो अलग शब्द नहीं हैं। प्रार्थना तो धन्यवाद है। कोई आश्चर्य नहीं है कि दुनिया में ज़्यादातर जो आस्तिक लोग हैं वह गहरे में नास्तिक ही हैं। प्रार्थना का जन्म माँगरहित चित्त में ही होता है। हम इतनी बेहोशी में प्रार्थना करते हैं कि प्रार्थना के शब्दों का अर्थ समझना तो दूर की बात है कभी-कभी तो हमें शब्द भी नहीं मालूम होते कि हम बोल क्या रहे हैं। प्रार्थना में जब तक उतरते नहीं हैं, गहरे डूबते नहीं हैं, तब तक प्रार्थना मृत है, डूब जाना ज़रूरी है। प्रार्थना की सुगंध जानना चाहते हैं तो हमें इस दुखी चित्त और यांत्रिक जीवन शैली से मुक्त होना होगा। यह आनंदित चित्त, यह सजग चेतना, जहाँ भी होती है वहीं प्रार्थना होती है। जो व्यक्ति सजग है, आनंदित है, वह जहाँ भी है वही प्रार्थना है, वह जो भी करे वही प्रार्थना है। वह अपने आप में ही प्रार्थना बन जाती है। प्रार्थना शब्दों तक ही सीमित नहीं होती।
ईश्वर में अटूट आस्‍था मनोबल को काफी मजबूत बनाती है और अपने लक्ष्‍य से डिगने नहीं देता। महा‍त्मा बुद्ध, ईसा मसीह, गांधीजी इत्यादि बहुत से महापुरूष इसके उदाहरण हुए हैं। उनके हृदयों से निकली हुई सच्ची प्रार्थना से ही वे संकल्पवान बनने में कामयाब रहे।
दूसरी ओर चिकित्सकों व मनोचिकित्सकों ने अपने अनुसंधान में पाया है कि जो व्यक्ति नियमित प्रार्थना करते हैं, वे उन व्यक्तियों की तुलना में अधिक जल्दी स्वस्‍थ होते हैं व जो नियमित प्रार्थना नहीं करते हैं या कम या कभी-कभार ही प्रार्थना करते हैं। सच्चे मन से की गई प्रार्थना से समस्या-समाधान में भी लाभ मिलता है। जब हमें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा हो और हम अगर सच्चे मन से प्रार्थना करें तो हमें ईश्वर से मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
इंसान मेहनत और दिमाग से काबिल तो बन जाते हैं लेकिन कभी-कभी कुछ अवसरों पर काबिलियत भी काम नहीं आ पाती। ये ऐसे मौके होते हैं जब कुछ घटनाओँ पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। इंसान की फितरत ऐसी है कि बुरे दौर में ही उसे ईश्वर की याद आती है। तब वह उनकी शरण जाकर उनसे अपनी कामनापूर्ति की प्रार्थना करता है।
बाइबल कहती है कि परमेश्वर “यहोवा की आँखें नेक लोगों पर लगी रहती हैं और उसके कान उनकी मिन्नतों की तरफ लगे रहते हैं। मगर जो बुरे काम करते हैं यहोवा उनके खिलाफ हो जाता है। इससे ज़ाहिर है कि परमेश्वर प्रार्थनाएँ सुनता है, खास तौर से उन लोगों की जो उसकी बताई राह पर चलते हैं। परमेश्वर हमारी प्रार्थनाएँ सुनने के लिए हरदम तैयार रहता है, इसलिए आयत कहती है, “हमें परमेश्वर के बारे में यह भरोसा है कि हम उसकी मर्ज़ी के मुताबिक चाहे जो भी माँगें वह हमारी सुनता है। सच्चे दिल से प्रार्थना करने वालों को यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की प्रार्थनाएँ परमेश्वर की मर्ज़ी के मुताबिक हैं।
अलग-अलग धर्म जैसे बौद्ध, कैथोलिक, हिंदू और इस्लाम के मानने वालों को माला जपना सिखाया जाता है, ताकि वे प्रार्थना में अपनी बात दोहरा सकें और उसे गिन सकें।
बाइबल कहती है कि प्रार्थनाएँ ह्रदय से की जानी चाहिए। यह ज़रूरी है कि हम प्रार्थना में जो भी बोलें वह सच्चे मन से हो, न कि बिना सोचे-समझे एक ही बात बोलते रहें। शास्त्र कहता है: “प्रार्थना करते वक्‍त, दुनिया के लोगों की तरह बार-बार एक ही बात न दोहरा, क्योंकि वे सोचते हैं कि उनके बहुत ज़्यादा बोलने से परमेश्वर उनकी सुनेगा। इसलिए, तुम उनके जैसे न बनना, क्योंकि परमेश्वर जो तुम्हारा पिता है तुम्हारे माँगने से पहले जानता है कि तुम्हें किन चीज़ों की ज़रूरत है।
दरअसल, जब प्रार्थनाएँ परमेश्वर की मर्ज़ी के मुताबिक नहीं की जातीं, तो प्रार्थना करने वाला मिन्नतें करके शायद अपना समय बरबाद कर रहा होगा या परमेश्वर को नाखुश कर रहा होगा। जो लोग परमेश्वर की मर्ज़ी के मुताबिक प्रार्थनाएँ नहीं करते, बाइबल उन्हें चेतावनी देती है कि उनकी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की नज़र में “घृणित” हैं।
परमेश्वर पर आस्था रखने वाले कुछ लोग मरियम, स्वर्गदूत या कुछ जाने-माने लोग जिन्हें “संत” कहा जाता है, उनसे प्रार्थना करते हैं। वे संतों या गुरुओं से इसलिए प्रार्थना करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर तक उनकी बात पहुँचा सकेंगे।
बाइबल अनुसार परमेश्वर हमारे शब्दों की तुलना में प्रार्थना करते समय हमारे हृदयों में ज्यादा रूचि रखता है। परमेश्वर के सामने अपने पापों से अंगीकार करना और उनसे मुड़ना चाहिए और दूसरों को भी क्षमा कर देना चाहिए जैसे परमेश्वर ने हमें क्षमा किया है। प्रभु की प्रार्थना का सार यह है कि, "और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा" सहायता के लिए ऐसी पुकार है जिसमें पाप के ऊपर विजय प्राप्त की जाती है और बुराई के आक्रमणों से सुरक्षा के लिए एक पुकार है।
और अंत में—
प्रार्थना उधारी का लेन—देन नहीं। जो उधारी में लेकर विराट के समक्ष पेश कर दिया जाए, और स्वीकृत हो जाए। प्रार्थना सहजता में हृदय से निकला वो भाव है जो किसी भी क्रम में हो लेकिन उसमें शुद्धता हो।

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