चंडीगढ़

संस्कार-शाला व प्रेरणा स्रोत है हमारे बुजुर्ग: भारद्वाज

April 17, 2018 03:15 PM

चंडीगढ़ (मनोज शर्मा) लेखक अरविंद भारद्वाज ने बताया कि आज की व्यस्त दौर में हम अपने बड़े बुजुर्गों की सलाह एवं परामर्श लेना तो जैसे भूल ही गए हैं। पहले दादी और नानी की कहानियों में साहस के साथ-साथ संदेश भी होता था। वो हमें अपनी कहानियों के माध्यम से समाज से जोड़ने का कार्य करते थे। उन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को मात्र खुश करना नहीं था बल्कि हमें बहुत से संस्कार, रीति-रिवाज, प्रेम और आदरभाव की ओर अग्रसित करना था। आज की पीढ़ी भले ही इंटरनेट के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में विश्वास रखती है, लेकिन बड़ी- बड़ी नेटवर्किंग साइट्स भी बच्चों को भावनात्मक, संवेगात्मक बौद्धिक, सामाजिक एवं आपसी भाईचारे का ज्ञान नहीं दे सकती, जो समय- समय पर बुजुर्ग दादा- दादी, नाना- नानी अपने प्यार और दुलार की बौछार के साथ देते रहते हैं। भले ही आज वर्तमान पीढ़ी के बच्चों को यह बुरा लगता है कि उन्हें किसी भी कार्य के लिए घर के बुजुर्ग रोकें–टोकें। वे इस बात को अपने जीवन के अंदरूनी मामलों में दखल मानते हैं। यदि माता- पिता अपने बच्चों से यह पूछते हैं कि वो कहां जा रहे हैं, किन– किन लोगों से मिल रहे हैं और कितने बजे तक घर आएंगे तो बच्चे अपने बुजुर्ग माता– पिता, दादा- दादी को भी डांट लगाने से नहीं चूकते और साथ में यह चेतावनी भी दे देते हैं कि वो अपने काम से काम रखें और उनके आंतरिक मामलों में दखल न दें। यह सब समय का दोष नहीं है जिसे अक्सर आधुनिक युग कहा जाता है बल्कि माता- पिता द्वारा अपने बच्चों को दिए जाने वाले संस्कारों का अभाव है। बचपन में बच्चा जब यह देखता है कि उसके माता-पिता अपने बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं तो वह भी वैसा ही व्यवहार अपने माता- पिता के साथ करता है। देखा जाता है कि यदि माता- पिता, दादा —दादी व परिवार के बुजुर्ग लोग जब भी संस्कार की सीख देने का प्रयास करते है तो उन्हें यह कहकर रोक दिया जाता है कि ये पुरानी बात है, आज समय बदल चुका है। सोचने वाली बात यह है कि हमारे बुजुर्गों को आज भी चश्मे, बैसाखियों और दूसरों के सहारे की आवश्यकता क्यों नहीं है? इसका सीधा सा जवाब यह है उनमें संस्कारों का होना, बड़ों की आज्ञा का पालन, समय पर कार्य को पूरा करना, बड़ों का आदर करना, मिलावट से दूर रहना इत्यादि नैतिक गुण भरपूर मात्रा में हैं। इन्हीं संस्कारों की राह पर चलते हुए कई परिवारों के संस्कारी लोग अपने बुजुर्गो की आज्ञा को आदेश की तरह मानते हैं। बुजुर्गों को सही और गलत निर्णय लेने का पूरा अधिकार दिया जाता है। आप जरा सोच कर देखिए की देर रात में घर पर आना प्राचीन समय से ही गलत माना जाता है। बहन, बेटी व परिवार की अन्य स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार एवं सम्मान दिए जाने चाहिए क्योंकि यह जरुरी नहीं है कि सही निर्णय केवल एक पुरुष ही ले सकता है। यह सभी परंपराएं आज भी कई परिवारों ने संजोएं रखी है। आज भी बड़े बुजुर्गों के आदेशों को कई परिवारों में एक कानून की तरह से माना जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि कुछ परिवार बुजुर्गों को अपने साथ रखने की अपेक्षा उनसे अलग रहने में ज्यादा खुशी मांनते हैं। उनका यह विचार है कि बुजुर्ग व्यक्ति उनके परिवार में कलह एवं तकरार का एक कारण बनते हैं यह सोच परिवारों के टूटने और अलग होने का भी एक मुख्य कारण है। आप अपने जीवन का कोई भी एक ऐसा उदाहरण बताइए जिसमें किसी भी बुजुर्ग व्यक्ति ने आपको बुराई की तरफ धकेला हो। बुजुर्गों द्वारा दी गई प्रेरणा, जीवन में नए बदलाव का एक मुख्य स्रोत बनती है। हमें अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों को अधिक से अधिक प्यार और सम्मान देने की आवश्यकता है क्योंकि उन्हें धन दौलत की बजाए अगर किसी चीज की जरूरत है तो वह सिर्फ और सिर्फ आपके प्यार और अपनेपन की है। जो बच्चा आज अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर उनसे संस्कार ग्रहण करता है वह जीवन में कभी भी असफल नहीं होता। अपने व्यस्त समय में से थोड़ा सा समय निकाल कर बुजुर्गों की सेवा कीजिए, उनकी सीख पर ध्यान देते हुए उनके द्वारा दिए हुए संस्कारों को अपने जीवन में अपनाएं। परिवार के बुजुर्गों से दूर भागने की बजाय हमें उन्हें अपने नजदीक लाकर आदर एवं सम्मान देना चाहिए। परिवार में समय-समय पर बुजुर्गों की सलाह लेनी बहुत ही कारगर साबित होती है। वास्तव में बुजुर्गों की सलाह उनके जीवन भर के तजुर्बे और अनुभव पर आधारित होती है। कहते हैं कि हम जितना प्यार और स्नेह बड़े बुजुर्गों को देते हैं उतना ही आने वाले समय में हम अपने बच्चों से प्राप्त करते हैं। किंतु इससे मेरा यह बिल्कुल भी अभिप्राय नहीं है कि हम स्वार्थ भावना से प्रेरित होकर अपने बुजुर्गो को सम्मान दे हमें अपने बुजुर्गों को निस्वार्थ और निष्काम भाव से पूरा सम्मान देना चाहिए क्योंकि वह हमारे समाज के निर्माता है अपने स्वरचित लेख के माध्यम से मैं समाज के सभी वर्गों के लोगों से यह निवेदन करूंगा कि वो अपने बड़े बुजुर्गों को प्यार, सम्मान व अपनापन दे और उनके द्वारा दी गई सीख को अपने जीवन में अपनाएं। यही परिवारों को टूटने से बचाने का एकमात्र रास्ता है।

कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें
और चंडीगढ़ ख़बरें