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राष्ट्रीय

बस! एक दिन का मातृत्व

May 13, 2018 05:57 PM

— रोशन

बस एक दिन
"मातृत्व दिवस" मनाने चले हैं
नौ माह रखा जिसने गर्भ में
बस! एक दिन में उसका
कर्ज चुकाने चले हैं।
365 दिन रही जो अंग— संग
364 भुला कर एक ही दिन में
उसकी ममता को भुनाने चले हैं
भेड़ों सी भीड़ में शामिल वे हैं
जिन्हें मां ने काबिल बनाया
हररोज सतरंगी पल है खोया
मां के प्रति लबा—लब भरा
प्यार वे आज दुनियां को
दिखाने चले हैं
पल—पल देती हैं जो दुआएं
उसी के आगे दुआओं के ढेर
सजाने चले हैं
ज्यूं मंदिर में ढेर- सा मांगने के बदले
मुट्ठीभर चढावा भगवान को चढा चले हैं
नयन तरसते रहे हर पल दीदार को
जुबां तरसती रही मीठी बातों को
अपने जायों के शीश को सहलाउं
क्या अब भी उसकी गोद में
कोई पल कभी बिताएं है
मां तो अज़र अमर है
चंद शब्दों में उसको
कब, कहां और कैसे तोल पाए हैं
नौ माह रखा जिसने गर्भ में
बस! एक दिन में उसका
कर्ज चुकाने चले हैं।

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