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संपादकीय

कल्पेश याज्ञनिकः एक और बलि

July 16, 2018 09:46 PM

चन्द्र शर्मा

हिंदी दैनिक भास्कर समाचार पत्र के समूह संपादक कल्पेश याज्ञनिक की दुखद और अकास्मिक निधन से हिंदी पत्रकारिता को अपूर्णिय क्षति पहुंची है। एक और पत्रकार ब्राडिंग के अत्याधिक बोझ में दब कर शहीद हो गया।

समकालीन मीडिया में पत्रकारिता बस ब्राडिंग मात्र रह गई है। समाचार पत्रों की ब्राडिंग ही पत्रकारिता के मानदंड तय करती है। और बेचारा पत्रकार इस ब्राडिंग के चक्कर में पिस रहा है। भास्कर में टॉप मैनेजमेंट का सीधा फंडा हैः अखबार को हर जगह (प्रकाशन केन्द्र) और हर हाल में नंबर बनना है। और जो कोई भी इसमें पिछड गया, वह ग्रुप में भी पिछड गया। भास्कर में रहते हुए कल्पेश याज्ञनिक से मेरा ज्यादा परिचय तो नहीं था, मगर मैं उनका कॉलम नियमित पढता। ओजस्वी लेखनी के मालिक थे। धडल्ले से लिखते। उनका साप्ताहिक कॉलम “असंभव के विरुद्ध“ काफी लोकप्रिय था और बहुत ज्यादा पढा जाता। याज्ञनिक अंतर्मुखी थे और सहयोगियों से भी कम ही मिलते-जुलते थे। काम से मतलब रखते और खबरों की दुनिया में डूबे रहते। उनकी मौत हृदयाघात से हुई अथवा गिरने से, इस पर रहस्य बना हुआ है। मगर, एक बात मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि वे आत्महत्या नहीं कर सकते, जैसा कि कुछ पत्रकार कह रहे है़। याज्ञनिक भास्कर के इंदौर संस्करण से जुडे थे और यह संस्करण इस समाचार पत्र के सबसे प्रतिष्ठित संस्करणों में से। 

 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  कहा वरिष्ठ पत्रकार कल्पेश याग्निक की संदिग्ध आत्महत्या के मामले की उचित जांच कराई जाएगी. मालूम हो कि दैनिक भास्कर अख़बार के 55 वर्षीय समूह संपादक कल्पेश याग्निक ने अपनी मौत से कुछ ही दिन पहले पुलिस के एक आला अधिकारी से मिलकर उन्हें बताया था कि एक महिला पत्रकार उन्हें झूठे मामले में फंसाने की धमकी दे रही है.   पुलिस को शुरुआती जांच के बाद संदेह है कि याग्निक ने इंदौर के एबी रोड स्थित दैनिक भास्कर की तीन मंज़िला इमारत की छत से बीते 12 जुलाई की रात छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी. उनके शव की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उनकी कई हड्डियां टूटी हुई थीं.

एक जमाने में श्रवण गर्ग इस संस्करण के संपादक हुआ करते थे और उनकी छाप आज भी इस संस्करण पर है। श्रवण गर्ग हीं उन्हें भास्कर में लाए थे। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि श्रवण गर्ग के साथ काम करने वाला सहयोगी कमजोर हो ही नही सकता। श्रवण गर्ग जितने सख्त थे, उतने ही प्रोफेशनल भी। मैने उनसे बहुत कुछ सीखा है।श्रवण गर्ग के बाद ही कल्पेश याज्ञनिक भास्कर के समूह संपादक बने।

भास्कर बेहद प्रोफेशनल अखबार है और इसमें सिर्फ वही पत्रकार फल-फूल सकते हैं, जो अत्याधिक परिश्रमी और प्रतिभाशाली हो। छोटे-मोटे पत्रकार तो ग्रुप में टिक ही नहीं सकते। काम का ही नहीं, अलबत्ता प्रतिस्पर्धा का बहुत ज्यादा प्रैशर रहता है। पिछले दो दशक में इस समूह ने दिन दोगुनी, रात चौगुनी तरक्की की है। नब्बे के दशक में जब मैने लोकमत ज्वाइन किया था, भास्कर मध्य प्रदेश तक ही सीमित था और राज्य का नवभारत इससे ज्यादा लोकप्रिय था। भास्कर का अंगेजी अखबार नेशनल मेल एकदम फिस्सडी और नवभारत के एमपी क्रॉनोनिक्ल से बहुत पिछडा हुआ था। मगर पहले राजस्थान और फिर चंडीगढ ने भास्कर को बुलदियों तक पहुंचा दिया।

काम का अत्याधिक प्रैशर हट्टे-कटटे को भी हिला देता है। मानव के शरीर में दिल सबसे नाजुक होता है और इसके किसी भी तरह का ज्यादा दबाव झेलने की भी एक सीमा होती है। याद करें पिछली सदी (1997) में वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह भी इसी दबाव के शिकार हुए थे। और भी कई पत्रकार इसके शिकार हो चुके है़ं। पत्रकार पीसते रहेंगे और यह सिलसिला चलता रहेगा।

श्री चन्द्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार हैं और भास्कर सहित कई अखबारों में काम कर चुके हैं

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