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संपादकीय

भारत बंद बुद्धि बंद का परिचय

September 12, 2018 04:33 PM


— रोशन लाल गोयल
      संपादक, फेस2न्यूज

आज़ादी के बाद से सरकारें छोटे—मोटे मुद्दों पर घिरती चली आ रही है। जनता के विश्वास से बहुमत हासिल करने वाली पार्टियां सरकार चलाने के काबिल तो समझने लग जाती हैं। लेकिन जनता को राहत देने के मामले पिछड़ती रही हैं। मंहगाई को निम्न स्तर पर लाने और विकास के मुद्दों पर सदैव घिरती रही हैं और घिरती जा रही है। न ही पूर्व की सरकारों ने जनतंत्र के लिए कोई कारगुजारी दिखाई और न ही पिछले चार वर्षों से वर्तमान सरकार इन मुद्दों पर कुछ खास रोल निभा पाई है।
रिकॉर्डतोड़ जीत हासिल करने के बाद अब सरकार महंगाई को लेकर खासे लपेटे में घिर रही है। पिछले दिनों से रूपए की गिरती कीमत तथा पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों को लेकर विपक्षी दल व आम जनता ने एक बार फिर भारत बंद की आवाज को बुलंद किया। भारत बंद बुलाने को लेकर अपना रोष प्रकट किया जा रहा है। प्राइवेट बसों की आवाजाही बंद की जा रही है। तख्तियां लेकर सड़कें जाम करके सरकार विरोधी नारे तो लगाए जा रहे हैं। दुकानों पर ताले जड़े जा रहे हैं। ये सिर्फ रोष प्रकट करने का जरिया है। बात सिर्फ यह है कि क्या रोष प्रकट करने के ये सब तरीके सही और सटीक हैं? क्या इस तरह विरोध प्रकट करने से मात्र सरकार पर ही असर होता है। ऐसे विरोध पूर्ण रूप से कभी कभार किसी खास मुद्दे को लेकर किया गया हो तो ठीक माना जा सकता है। लेकिन विरोध जताने के जिस तरीके से आम दुकानदार, दिहाड़ी मजदूरी कर पेट पालने वाले मजदूर, विद्यार्थी, मरीज प्रभावित होते हों तो क्या ये जनतंत्र का भारी नुक्सान नहीं है? ऐसे मुद्दों पर विरोध जताना लोगों का मौलिक अधिकार है लेकिन विरोध जताने के तरीके, आए दिन दुकानें बंद करवा कर व्यापारिक वर्ग को आर्थिक हानि पहुंचाना, ऐसे विरोध की आड़ में असामाजिक तत्वों द्वारा तोड़ फोड़ करके सरकारी संपत्ति यानि मुख्य रूप से भारत की जनता की संपत्ति को तहस नहस करना कितना उचित है? ये विचारणीय है। पहले सम्पत्ति की तोड़ फोड़ करना बाद में उसकी भरपाई के लिए आम नागरिक की जेबों पर भारी भरकम वजन डालना क्या यही नियति बन चुकी है? चंद मौकापरस्त लोग भारतभर की जनता को किसी न किसी तरह गुमराह करने में कामयाब हो जाते है और जनता भी अपने विवेक बुद्धि का उपयोग किए बिना पिछ लगु बन बैठती है। पक्ष या विपक्ष लड़वाने में फिराक में अपना उल्लू साधते हैं और जनता बिना सोचे पीछे लगने को आतुर हो बैठती है। विरोध के लिए दृढ संकल्प की आवश्यकता होती है। विरोध ही करना हो तो उन्हीं मुद्दों के इर्दगिर्द होना चाहिए। एक जुट होकर उन्हीं वस्तुओं का बहिष्कार किया जा सकता है।  

विरोध करना है तो कुछ इस तरह किया जाए कि सरकारें भी हरकत में आएं और आम जनता का नुकसान भी न हो तथा जिस मुद्दे को लेकर रोष प्रकट किया गया हो उसका भी समाधान हो जाये।


विरोध विदेशों में जताए जाते हैं लेकिन उनके तरीके जन विरोधी नहीं अपितु सरकारों के कान खोलने वाले होते हैं। उदाहरण के रूप में जापान को ही ले लीजिए, जापान में कोई कर्मचारी विरोध जताता है तो ऐसे हड़तालें या तोड़ फोड़ नहीं करते बल्कि एक ही उत्पाद को दोगुणा कर देते हैं। पिछले समय सड़क परिवहन की हड़ताल भी जनविरोधी नहीं बल्कि सरकार तक आवाज पहुंचाने का तरीका था। परिवहन कर्मियों द्वारा न वाहन रोके गए न अपनी डयूटी से कोताही और लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाया भी लेकिन उनसे पैसे नहीं वसूले गए। जिसकी सीधी और स्टीक आवाज सरकार के कानों में गूंजी।    
Roshan Lal Goyal
 

बंद करके विरोध जताना सिर्फ अपना और अपने छोटे—मोटे व्यवसाय का नुकसान अपने हाथों कर रहे हैं। यदि विरोध करना है तो कुछ इस तरह किया जाए कि सरकारें भी हरकत में आएं और आम जनता का नुकसान भी न हो तथा जिस मुद्दे को लेकर रोष प्रकट किया गया हो उसका भी समाधान हो जाये।

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