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संपादकीय

दश—हरा: पहले राम बनो— तब मुझे जलाने का दंभ भरो

October 19, 2018 01:02 PM

— रोशन

संपादक फेस2न्यूज

 

रावण कहता है

सदियों से जलाते आ रहे हो

और कब तब जलाओगे

आज तक नहीं मिटा तो

कब मिटाओ गे।

मेरे पुतले जला कर खुश होने वालो

मैं तुम्हारें जहन में बैठा हूं

वहां से कब हटाओ गे?

पहले दश को हराओगे
तो मुझे हरा पाओगे।

 

 आज दशहरा है, अधिकतर लोग इस त्यौहार को मनाने में उत्सुक होते हैं। बिना जाने बिना समझे! नासमझ लोग रावण रूपी पुतलों को जला कर खुशी मनाने में व्यस्त होते हैं, बिना कुछ सवाल उठाए! कहते भी है कि रावण बुराई का प्रतीक है, और हजारों सालों से इसे ढो भी रहे हैं। क्या बुराई इतनी प्रबल है कि हजारों वर्षो का सफर करके भी समाप्त नहीं हो पाई? बुराई सफर नहीं करती, जहन में रोपित हुई है। वर्तमान समय में लोग रावण को नहीं जला रहे, खुद के लिए तथा भावी पीढी के लिए दूषित वातावरण निर्मित कर रहे हैं। लोग रावण के पुतले के साथ बुराईयाँ नही जला रहे बल्कि एक मनोरंजन की प्रथा निभा रहे है। आज हर इंसान में रावण से अधिक बुराईयाँ कूट-कूट कर भरी है। रावण तो विद्धवान था और भगवान शिव का परम भक्त भी। अपनी मृत्यु के बारे में सब जानने के बाद भी मानव अवतार श्री राम के हाथों मरने के लिए काफी उत्सुक था। आज के युग मे कोई भी इंसान अपनी बुराई सहन नहीं करता और अपनी मृत्यु तो किसी भी स्थिति में नही चाहता। भले ही स्वयं ईश्वर मानव अवतार मे आये कभी भरोसा नहीं करेगा।

लोग रावण रूपी पुतला हर गाँव हर शहर में जलायेगे ओर सब कहेंगे कि अच्छाई पर बुराई की जीत हुई, लेकिन ज़रा चिंतन करे कि क्या रावण वाकई में इतना बुरा था? जितना कि आज का इंसान, और क्या वे असलियत में रावण रूपी बुराई को जला पाए हैं अब तक?

कहानी कहती है कि यदि रावण की बहन का अपमान लक्षमण द्वारा न होता तो सीता का हरण क्यों करता? रावण कहता है कि सीता हरण के बाद उसने सीता के साथ कोई भी जबरदस्ती नही की न ही उनका अपमान किया। वो अपनी मर्यादा में रहा। सीता की पवित्रता पर कोई आँच न आने दी। यहां तक कि सीता को बिना उनकी सहमति के महलों में रखने की बजाए उनकी सहमति का आदर करते हुए अशोक वाटिका में रखा और सेवा के लिए परिचायिकें दी। रावण कहता है कि यदि श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो उसने भी मर्यादाओं का पालन किया है। रावण के पास धन वैभव था, सोने की लंका थी, जहां कोई गरीब न था, लाचार न था, भूख प्यास से मरता न था। प्रजा सम्पन्न ओर आराम से रहती थी। रावण राज्य में शिव की पूजा होती थी। रावण कहता है कि उसको भाईयों से अति स्नेह था, लेकिन मेरा भाई विभीषण मेरी भावना को नही समझता पाया। तब भी मैंने राजा होते हुए उसे बंदी नहीं बनाया, उस पर कोई अत्याचार नहीं किए, देशद्रोही करार देकर मौत के घाट नहीं उतारा बल्कि आजाद ही छोड़ कर राम के पास जाने दिया। रावण पूछता है कि क्या मातृभूमि पर आए संकट में मातृभूमि को त्याग कर शत्रु की शरण में जाना क्या धर्म संगत था?  विभीषण शान्त मृदु भाषी, धार्मिक प्रवृति का था,  मेरी नाभि में अमृत है ये बात सिर्फ विभीषण ही जानता था बावजूद इसके विभीषण को राम के पास जाने दिया, ये भी मेरी रणनीति थी। ताकि राम के हाथों जब सारा राक्षस कुल समाप्त हो तब राज्य संभालने को वो बचा रहे। इस तरह मैंने राक्षस जाति का उद्धार भी करवाया और राज्य भी विभीषण को दिलवाया।

रावण चेताता है कि मेरे पुतलों का आग दिखा कर दंभ भरने वालो तुम्हारे अपने ही देश, घर में स्त्रियों संग अमानवीय व्यवहार हो रहा है, मासूम बच्चों, छोटी—छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है, उन्हे अमानवीय यातनाएं दी जा रही है। लोग भूख—प्यास से मर रहे हैं। वह भी तुम्हारी आंखों के सामने, तुम्हारे ही लोगों द्वारा सब किया जा रहा है।  रावण हुंकार भरता है कि पहले ऐसे दुराचारियों को जलाओ फिर राम बनो और तब मुझे जलाने का दंभ भरना...

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