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राष्ट्रीय

छठ महापर्व क्या है और कैसे हुई इस महापर्व की शुरुआत

November 10, 2018 04:51 PM

चंडीगढ, संजय मिश्रा:
लोकआस्था और सूर्य उपासना का महान पर्व छठ पर्व की शुरुआत कल से हो जाएगी। इस चार दिवसीय त्योहार की शुरुआत नहाय-खाय की परम्परा से शुरू होती हैं। यह त्योहार पूरी तरह से श्रद्धा और शुद्धता का पर्व हैं। इस व्रत को महिलाओं के साथ ही पुरुष भी रखते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में सभी व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला व्रत रखा जाता हैं।
इस चार दिवसीय छठ महापर्व को लेकर कई कथाएं मौजूद हैं। एक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया। इससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।
इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख महाभारत में भी मिलता हैं। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के पुत्र एवं उनके परम भक्त थे। मान्याताओं के अनुसार, वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर भगवान् सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।
किंवदंती के अनुसार, बिहार के ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या से लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।   


इस पूजा के लिए चार दिन महत्वपूर्ण हैं नहाय-खाय, खरना, सांझा अर्घ्य और सूर्योदय अर्घ्य। छठ की पूजा में गन्ना, फल, डाला और सूप आदि का प्रयोग किया जाता हैं। मान्यताओं के अनुसार, छठी मइया को भगवान सूर्य की बहन बताया गया हैं। इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की अर्चना करता है उनकी संतानों की रक्षा छठी मईया करती हैं।
छठ पर्व वास्तव में सूर्योपासना का पर्व हैं। इसलिए इसे सूर्य षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता (छठी माता) बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। बिहार में आज भी बालक के जन्म लेने के छठे दिन छठियारा करने की परंपरा है जिसमे छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और जिंदगी में किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए।
दूसरी ओर छठ पूजा की धार्मिक महत्ता व साथ ही इसके सामाजिक महत्व भी हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ इसे मनाते हैं। सबसे बड़ी बात है कि यह पर्व सबको एक सूत्र में पिरोने का काम करता हैं। इस पर्व में अमीर-गरीब, बड़े-छोटे का भेद मिट जाता हैं। सब एक समान एक ही विधि से भगवान की पूजा करते हैं। अमीर हो वो भी मिट्टी के चूल्हे पर ही प्रसाद बनाता है और गरीब भी, सब एक साथ गंगा तट पर एक जैसे दिखते हैं। बांस के बने सूप में ही अर्घ्य दिया जाता हैं। प्रसाद भी एक जैसा ही और गंगा और भगवान भास्कर सबके लिए एक जैसे हैं।
इस महापर्व में शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है और कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए वरना तुरंत सजा भी मिल जाती हैं।

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