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पंजाब

पंजाबी साहित्य विकास हेतु प्रसिद्ध लेखकों, कवियों और इतिहासकारों ने किया विचार-विमर्श

December 07, 2018 08:15 PM

चंडीगढ़, फेस2न्यूज:
प्रथम विश्व युद्ध के समय के दौरान पंजाबी साहित्य और कविता का विकास काफी हद तक उन पंजाबी युवाओं के परिवारों के दुखों की कहानियों, गीतों और लोककथाओं पर आधारित था, जो उस समय की मौजूदा परिस्थितियों से युद्ध में धकेल गए थे।
इन विचारों को प्रसिद्ध लेखकों और कवियों द्वारा व्यक्त किया गया, जो यहां लेक क्लब में चल रहे सैन्य साहित्य समारोह में ‘पंजाबी कविता, साहित्य और लोक गीतों के पहले विश्व युद्ध द्वारा बढ़ावा देने वाले विषय’ पर चर्चा करने के लिए एकत्रित हुए थे।
शुरुआत में, पंजाबी ट्रिब्यून के संपादक स्वराज बी सिंह ने कहा कि हवलदार नंद सिंह द्वारा किस्सा वड्डा जंग यूरोप शायद युद्ध पर पहला रिकॉर्ड किया गया साहित्य था। इसी प्रकार, उन्होंने कहा कि कई सालों बाद प्रसिद्ध लेखक मुल्क राज आनंद ने अपने उपन्यास ‘द स्वॉर्ड एंड सिकल’ में भी युद्ध पर प्रकाश डाला। हालाँकि, स्वराज बी सिंह ने कहा कि इसी अवधि में लोककथा मुख्य रूप से इस अवधि के साहित्यिक विकास का स्रोत था।
पंजाबी ट्रिब्यून के संपादक ने युद्ध काल से संबंधी कई तथ्यों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोककथा पूर्व पंजाब के पोटोहर बोली में था क्योंकि सेना की अधिकांश भर्ती उन दिनों रावलपिंडी जिले से की गई थी। स्वराज बी सिंह ने कहा कि युद्ध के शुरुआती वर्ष में एक लाख पंजाबियों को ब्रिटिश सेना में भर्ती किया गया था और यह संख्या युद्ध के अंत तक 4.70 लाख तक पहुंच गया था।
अपने संबोधन में रिटायर्ड आई.पी.एस अफ़सर मनमोहन सिंह ने कहा कि 19वीं शताब्दी में पंजाबी साहित्य ने पूरे विश्व में ख़ास तौर पर राज्य में अपने विकास के लिए अपने आप को ढाल लिया। उन्होंने कहा कि इस समय के दौरान साहित्य की अपेक्षा कहीं और ज्यादा शक्तिशाली रूप में लोककथाएं उभरकर सामने आईं। मनमोहन सिंह ने कहा कि पंजाबी लोगगीतों का एक प्रसिद्ध शब्द ‘जुगनी’ का जन्म इसी समय के दौरान हुआ।
रिटायर्ड आई.पी.एस अफ़सर ने यह भी खुलासा किया कि शब्द जंग (वार) का प्रयोग करने की बजाय उस समय लोक-कथाएं शब्द ‘लाम’ के आसपास घूमतीं थे, जोकि ‘किसी अन्य जगह की ओर बढ़ती एक लाईन के रूप’ के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उन्होंने कहा कि मोहन काहलों का उपन्यास ‘वैह गए पाणी’ इस समय के आसपास घूमता है।
इस अवसर पर बोलते हुए प्रसिद्ध लेखिका बब्बू तीर ने कहा कि पहला विश्व युद्ध एक किसानी जंग थी। उन्होंने कहा कि उस समय भारतीय योद्धा नहीं थे परन्तु वास्तव में वह पीडि़त थे, जिनको उनकी आर्थिक ज़रूरतों ने जंग में धकेल दिया था। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक पीडि़त होने के बावजूद भी औरतों ने जंग में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि औरतों ने अपने पतियों, पुत्रों और भाइयों को अपने परिवारों का पेट भरने के लिए जंग में भेजा।
अपने सम्बोधन भाषण में ब्रिगेडियर (सेवामुक्त) के.एस. काहलों ने पंजाब सरकार की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे फेस्टिवलों का आयोजन देश के लोगों को सेनाओं के बहादुरी भरे कार्योंं, प्राप्तियों से अवगत करवाने के लिए बहुत लाभप्रद साबित होते हैं। उन्होंने कई तरह की कठिनाईयाँ और वेतनों और भत्तों में भेदभाव के बावजूद भी भारतीय सैनिकों ने जंग के उस मुश्किल समय में अपनी बहादुरी स्वरूप अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने कहा कि चाहे 26000 के करीब लोग छोड़ गए थे, परन्तु पहली विश्व जंग में भारतीय सैनिकों का योगदान महत्वपूर्ण था।
इस मौके पर संबोधित करते हुुए पंजाबी यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ैसर श्री जसबीर सिंह ने कहा कि जंग के दिनों में सेना की बहुसंख्यक भर्ती पंजाब में से गई थी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अनुपात 150:1 के संबंध सेना में पंजाबियों की भर्ती अनुपात 28:1था।
अपने भाषण के दौरान पंजाब साहित्य अकादमी के प्रधान और प्रसिद्ध कवि श्री सुरजीत सिंह ने कहा कि चाहे जंग के उन दिनों में सैनिकों की बहादुरी भरे कारनामों संबंधी कोई भी हवाला इतिहास में दर्ज नहीं है परन्तु कविताओंं और सार्वजनिक तथ्यों में जंग के दौरान पुरूष और महिलाओं के विरह का चित्रण देखा जा सकता है।
श्री पातर ने कहा कि जंग के उन कठिन दिनों के दौरान सैनिकों के परिवारों की तरफ से झेली कठिनाईयों पर भी प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि जंग के दौरान बहुत से भारतीय आर्थिक मंदहाली के कारण अंग्रेज़ी हकूमत की तरफ से लड़ रहे थे जबकि ग़दर पार्टी अपने देश प्रेम के कारण अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ रही थी, जिसकी झलक उस समय के लोक गीतों और ग़दर पार्टी के साहित्य में से मिलती है।

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