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सवर्ण आरक्षण बिल पर सरकारी स्पीड से हुआ एक्सीडेंट, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

January 13, 2019 02:59 PM

चंडीगढ़, संजय मिश्रा:
सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत के आरक्षण के बिल को भारत के राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है और इसी के साथ सरकार ने भी अधिसूचना जारी कर दी है जिससे इस बिल ने अब कानून का रूप ले लिया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय अब एक हफ्ते के भीतर आरक्षण के इस प्रावधानों से जुड़े नियम-कायदों को अंतिम रूप देगा।
एक तरफ गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण का बिल जो कि 8 जनवरी 2019 को लोकसभा मे लाया गया और इसी दिन लोकसभा ने इसे भारी बहुमत से पास भी कर दिया। फिर यह बिल 9 जनवरी को राज्यसभा मे पहुंचा, वहाँ भी ये बिल भारी बहुमत से पास हो गया और अब 12 जनवरी को इसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई, और सरकार ने अधिसूचना जारी करके इसे कानूनी रूप भी दे दिया है। सचमुच ही कमाल हो गया कि सवर्ण आरक्षण बिल 12 दिनों में ही दोनों सदन से पास होकर राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर से कानून भी बन गया।
जबकि दूसरी तरफ उपभोक्ता संरक्षण बिल 5 जनवरी 2018 को लोकसभा में लाया गया और इसे लोकसभा ने 12 महीने बाद 20 दिसंबर 2018 को पास किया। भगवान जाने कि यह बिल राज्यसभा मे कब जाएगा, कब पास होगा और कब इस पर राष्ट्रपति जी की मंजूरी मिलेगी और कब यह बिल कानून का रूप ले सकेगा।
कभी आपने सोचा कि उपरोक्त दोनों बिल पर सरकार और सांसद की स्पीड में इतना फर्क क्यों है? नहीं तो इसे यूं समझिए कि ये सिर्फ एक चुनावी स्टंट है। 2019 का चुनावी आखाडा सामने है। सवर्ण आरक्षण बिल में वोट की राजनीति छिपी हुई है इसलिए यह बिल मात्र 12 दिन में दोनों सदनो से पास होकर राष्ट्रपति की अनुमति से कानून भी बन गया जबकि उपभोक्ता संरक्षण बिल में वोट नहीं होने के कारण वो 12 महीने से लटकी पड़ी है और कछुए की चाल चल रही है।
सरकार के उपरोक्त स्पीड से ही घबराकर सवर्ण आरक्षण बिल का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। यूथ फॉर इक्विलिटी ने संविधान संशोधन के इस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि ये संविधान संशोधन अवैध है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है। याची का कहना है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
ज्ञात हो कि मोदी सरकार ने चुनावी सीजन में गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने का बड़ा दांव चला है। शीतकालीन सत्र में गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाला यह ऐतिहासिक विधेयक 9 जनवरी को राज्यसभा में भी पास हो गया था। इसके पहके यह विधेयक 8 जनवरी को लोकसभा ने पारित किया था।
दोनों सदनों से इस बिल के पास होने पर प्रधानमंत्री मोदी ने इसे सामाजिक न्याय की जीत बताया और कहा कि यह देश की युवा शक्ति को अपना कौशल दिखाने के लिए व्यापक मौका सुनिश्चित करेगा तथा देश में एक बड़ा बदलाव लाने में सहायक होगा।
वही कुछ विपक्षी दलों ने इस विधेयक को लोकसभा चुनाव से कुछ पहले लाये जाने को लेकर सरकार की मंशा तथा इस विधेयक के न्यायिक समीक्षा में टिक पाने को लेकर आशंका जतायी है।
राजद नेता मीसा ने कहा कि यह एक राजनीतिक स्टंट मात्र है, सरकार ने साढ़े चार साल में कुछ नहीं किया और अब अंत समय में इन लोगों ने सवर्णों को झूनझूना दे दिया है, जो हिलेगा लेकिन आवाज नहीं करेगा।
आम आदमी पार्टी के नेता और सांसद संजय सिंह ने आरक्षण बिल पर कहा कि सरकार ने गरीब सवर्णों को धोखा दिया है। संजय सिंह ने कहा कि हमने वोटिंग का बहिष्कार किया, क्योंकि इस बिल के जरिये गरीब सवर्णों की पीठ में छुरा घोंपने का काम सरकार ने किया है।

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