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भारत में उपभोक्ता संरक्षण और न्यायिक असहयोग

March 11, 2019 09:35 AM

चंडीगढ, संजय मिश्रा:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 का भारत सरकार द्वारा लागू किया जाना वैश्विक जरूरत की एक मांग थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल असेंबली ने 9 अप्रैल 1985 को उपभोक्ता के हितों के संरक्षण हेतु एक रिसोलूसन 39/ 248 को पारित किया। भारत सरकार ने भी इस रिसोलूसन पर हस्ताक्षर किए और भारत में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए 24 दिसंबर 1986 से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 लागू हो गया। इस अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं के कुछ अधिकार चिन्हित किए गए एवं उनकी रक्षा के लिए जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई जिसे क्रमशः जिला उपभोक्ता मंच, राज्य उपभोक्ता आयोग एवं राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का नाम दिया गया। इस अधिनियम कि खासियत धारा 3 के तहत बताया गया कि उपभोक्ता अधिनियम में शिकायत का अधिकार अन्य अधिनियमों में वर्णित शिकायत के अधिकार के अतिरिक्त होगी। कालांतर में इसी खासियत कि वजह से यहाँ बैंकिंग, बीमा, परिवहन आदि सेवा कानूनों मे वर्णित अधिकारियों के होने के बावजूद भी इन सेवाओं मे कमी की शिकायत उपभोक्ता मंच में सुनी जाने लगी।
इस अधिनियम में उपभोक्‍ताओं के निम्‍नलिखित 6 अधिकारों के प्रवर्तन और संरक्षण की कल्‍पना की गई है:
सुरक्षा का अधिकार, सूचित होने का अधिकार, चुनने का अधिकार, सुने जाने का अधिकार, विवाद सुलझाने का अधिकार एवं उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। अधिनियम की धारा 2(1)(ओ) के मुताबिक- निःशुल्क और ब्यक्तिगत सेवाओं को छोडकर बाकी सभी तरह की सेवाएँ इस अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में होंगी जैसे– बैंकिंग, वित्त, बीमा, परिवहन, हाउसिंग, बिजली या अन्य ऊर्जा की सप्प्लाई, या किसी खबर या सूचना की सप्प्लाई।
उपरोक्त कोई भी सेवा संबन्धित क़ानूनों के तहत ही ली जा सकती है अगर कोई कमी हो तो शिकायत निपटान के लिए उपभोक्ता मंच में शिकायत दी जा सकती है। कालांतर में सूचना के संग्रहण से संबन्धित सूचना अधिकार कानून 2005 के बनने के बाद सूचना के संग्रहण में कमी की शिकायत जब उपभोक्ता मंच मे दी गई तो शीर्ष उपभोक्ता आयोग ने 8 जनवरी 2015 को पुनरीक्षण याचिका संख्या 3146 ऑफ 2012 को निपटाते हुए ब्यवस्था दी कि– सूचना संग्रहण से संबन्धित सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत सेवा मे कमी कि शिकायत उपभोक्ता मंच मे नहीं सुनी जाएगी क्योंकि उपभोक्ता मंच एक कोर्ट है और सूचना अधिकार कानून के तहत कोर्ट में इससे संबन्धित शिकायत नई सुनी जा सकती। यही नहीं उपभोक्ता मंच में सुनवाई करना सूचना आयोग के कार्यक्षेत्र में दखलंदाज़ी होगी । जब राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के इस आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में की गई तो देश कि सर्वोच्च अदालत ने स्पेशल लीव पिटीशन संख्या 23903 ऑफ 2016 को 29 अगस्त 2016 को बिना कोई कारण बताए खारिज कर दी। पुनरीक्षण याचिका संख्या 25 ऑफ 2018 को भी शीर्ष अदालत ने 13 मार्च 2018 को खारिज कर दिया। इस तरह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम मे लिखी सेवा– सूचना का संग्रहण, किताबों मे ही दफन होकर रह गया।
उपरोक्त के आलोक में निम्नलिखित अनसुलझे सवाल जिसका जवाब जरूरी है:
1 राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के तीन सदस्यीय बेंच का उक्त निर्णय उनके खुद के पाँच सदस्यीय बेंच के निर्णय (कलावती केस) दिनांक 26-9-2001 के विरुद्ध है जिसमें खुद आयोग ने फोरम को अन्य कानून के तहत बनाया गया “अन्य अधिकारी” बताया था और कहा था कि सोसाईटीज़ एक्ट में वर्णित क्षेत्राधिकार वर्जन में सिर्फ कोर्ट को शिकायत सुनने से वर्जित किया गया है, उपभोक्ता मंच को नहीं। बताना चाहूँगा कि सोसाईटी एक्ट में कोर्ट के वर्जन के लिए जो भाषा लिखी गई है बिलकुल वही भाषा का इस्तेमाल सूचना अधिकार कानून की धारा 23 में भी की गई है, फिर दोनों कानून में क्षेत्राधिकार वर्जन को लेकर उपभोक्ता आयोग का अलग अलग नजरिया क्यों? यही नहीं एक तीन सदस्यीय बेंच अपने पाँच सदस्यीय बेंच के निर्णय को कैसे पलट सकती है?
2 राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का उक्त निर्णय, एम ललिता केस मे दिये गए सूप्रीम कोर्ट के निर्णय के भी खिलाफ है जिसमे फोरम को कोर्ट नहीं बल्कि “ट्रिब्यूनल” बताया गया था और कहा गया था कि– सोसाईटीज़ एक्ट में वर्णित क्षेत्राधिकार वर्जन में उपभोक्ता मंच को शिकायत सुनने से वर्जित नहीं किया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को अपने आदेश को नकारने वाले इन उपभोक्ता अधिकारियों से इतना प्यार क्यों है जिसे बचाने के लिए वो इन अधिकारियों के गलत निर्णयों को खारिज करने के बजाय आमजन के पिटीशन को ही खारिज कर देते है।
3 राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का उपरोक्त निर्णय, विश्वभारती केस में दिये गए सूप्रीम कोर्ट के निर्णय दिनांक 17-01-2003 के भी खिलाफ है जिसमें तीन जज की बेंच ने कहा था कि– उपभोक्ता मंच कोर्ट नहीं बल्कि एक “ट्रिब्यूनल” है । ज्ञात हो कि विश्वभारती केस में सुप्रीम कोर्ट के पास याचिका दी गई थी कि त्रीस्तरीय कंज़्यूमर कोर्ट हमारे देश में पहले से संविधान प्रदत्त त्रीस्तरीय कोर्ट सिस्टम (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सूप्रीम कोर्ट) के समानांतर चल रही है जो असंवैधानिक है इसे अवैधानिक घोषित कर बंद कर दिया जाये। लेकिन उस समय माननीय सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय बेंच ने कंज़्यूमर फोरम को “अन्य अधिकारी” एवं “ट्रिब्यूनल” बताते हुए उपभोक्ता मंच को असंवैधानिक घोषित होने से बचाया था। लेकिन आज अगर उपभोक्ता आयोग के शीर्ष अधिकारी अपने को कोर्ट मानते है तो क्यों नहीं विश्वभारती केस को पुनः खोलकर और इस समानान्तर कोर्ट अवैध घोषित करके इसे हमेशा हमेशा के लिए बंद कर दिया जाये और सभी उपभोक्ता अधिकारियों की छुट्टी कर उन्हे उनके घर भेज दिया जाये?
4 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की प्रस्तावना एवं कानून की धारा 9 के मुताबिक, हमारे नीति निर्माताओं ने उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने एवं उनके झगड़ों के त्वरित निस्तारण के लिए जिला स्तर से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक अनेक “अधिकारी” बनाए। फिर उपभोक्ता आयोग के इन शीर्ष अधिकारियों ने अपने आप को कब कोर्ट बना लिया और कैसे। इन सभी अधिकारियों इसे ‘कोर्ट’ बनाकर देश के नीति निर्माताओं की इच्छा को कुचल कर रख दिया क्यों ? और क्यों सूप्रीम कोर्ट ने भी मेरे पिटीशन को खारिज कर उन अधिकारियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप मे अपना सहयोग दिया है?
5 हमारे संविधान की धारा 32 में सभी नागरिकों को अपनी कानूनी समस्या लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के न्याय करने के उपरोक्त तरीके से संविधान की धारा 32 मे वर्णित नागरिकों के मौलिक अधिकार एक मज़ाक बनकर रह गया, वो भी उन न्यायपालिका के हाथों जिनके पास संविधान और उसके प्रावधानों को बचाने की ज़िम्मेदारी है।
6 हमारे संविधान के प्रस्तावना की शुरुआत ही होती है:
हम भारत के लोग ... लेकिन सूप्रीम कोर्ट द्वारा मेरे पिटीशन को खारिज करने के उपरोक्त फैसले से ये साफ हो गया है कि हमारे देश गणतन्त्र नहीं बल्कि अभी भी राजतंत्र है जहां अधिकारीगण नौकरी ग्रहण के पहले न्याय देने की शपथ लेते है लेकिन बाद में अपने मर्जी के मुताबिक चलते है और फैसले लेते है।
7 हमारे पवित्र संविधान के अनुच्छेद 51 (क) (एच) में नागरिकों का यह मूल कर्तव्य बताया गया है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे, इसी प्रकार अनुच्छेद 51 (क) (जे ) में कहा गया है कि नागरिक व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले। लेकिन अफसोस कि हम नागरिकों ने तो अपना उपरोक्त कर्तव्य निभाया लेकिन हमारे देश की न्यायपालिका ने न्याय देने के अपने कर्तव्य को नहीं निभाया जिससे अनुच्छेद 51 मे वर्णित उपरोक्त संवैधानिक प्रयास को गहरा धक्का लगा है, आश्चर्य है कि खुद संविधान के रक्षक ने ही हम आमजन को संविधान की पालना करने से रोक दिया, अब कोई भी ब्यक्ति इन प्रयासो को करने से बचेगा और जिससे हमारा समाज विनाश की ओर बढ़ेगा।
8 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एवं सूचना अधिकार अधिनियम दोनों ही आमजन के दैनिक कार्यकलाप से संबन्धित महत्वपूर्ण कानून है और सूचना चाहने वालों को उपभोक्ता बनाकर सस्ता, सुगम एवं त्वरित न्याय उनको उनके जिला फोरम मे नहीं दिलवाकर देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों को राज्य के मुख्यालय मे स्थित सूचना आयोग के चक्कर लगाने को या हाईकोर्ट के चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया।
9 वर्ष 1986 के पहले हमारे देश में उपभोक्ता संरक्षण से संबन्धित बहुत सारे कानून थे और उन सभी क़ानूनों मे उपचार के लिए कुछ प्रावधान भी थे और कोई न कोई अधिकारी भी बनाए गए थे, लेकिन वो सभी प्रावधान, उपचार एवं अधिकारी नाकाफी साबित हो रहे थे, जिस कारण वर्ष 1986 मे अतिरिक्त उपचार के पावर के साथ उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लाया गया था । ठीक यही स्थिति अभी भी सूचना अधिकार कानून को लेकर बन गई है, लोगो को सूचना नहीं मिल रही है, अगर मिल रही है तो सही नहीं मिल रही है, लाखो की तादाद मे अपील एवं शिकायत सूचना आयोग मे लंबित है, सूचना आयोग मे कोई न्यायिक मेम्बर नहीं है, सेवानिब्रित अधिकारी आमजन को नहीं बल्कि विभागीय अफसरो से अपनी मित्रता बनाए रखने को प्राथमिकता देते है। अगर कोई आयुक्त सही फैसला कर भी दे तो उन्हे कानून के तहत अपने आदेशो को कियान्वित करने का अधिकार नहीं दिया गया है, जिससे आमजन सूचना आयोग से समुचित न्याय की उम्मीद नहीं कर सकता । उपरोक्त तथ्यो के आलोक मे ये बात साबित हो जाती है की जिस परिस्थिति मे उपभोक्ता कानून 1986 बनाया गया था ठीक वही परिस्थिति सूचना अधिकार कानून को लेकर अभी फिर से बन गई है और सूचना अधिकार आवेदक को उपभोक्ता कानून के अतिरिक्त उपचार की सख्त आवश्यकता है, लेकिन सूप्रीम कोर्ट ने मेरे पिटीशन को खारिज कर विधि निर्माताओं द्वारा उपभोक्ता कानून को बनाने की उपरोक्त उद्देश्य को एक बार फिर से दफन कर दिया ।
10 सूचना अधिकार अधिनियम 2005 + उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 = भ्रष्टाचार से लड़ने व लोकप्राधिकारी के कामकाज मे और भी पारदर्शिता लाने में आम आदमी के हाथों को और भी मजबूती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त पिटीशन को खारिज करके आमजन के हाथों को मजबूत होने से रोक दिया।

अंत मे सरकारी असहयोग की पराकाष्ठा ये है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2016 ड्राफ्ट बनकर ही रह गया, संसद में पारित ही नहीं हो सका। दूसरा उपभोक्ता संरक्षण बिल 2018 जनवरी 2018 मे ही लोकसभा में पारित हो चुका है लेकिन वो अबतक राज्यसभा से पास नहीं हो पाया है, राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर तो दिल्ली दूर है। लेकिन 10 प्रतिशत स्वर्ण आरक्षण विधेयक मात्र 15 दिनों में लोकसभा, राज्यसभा से पारित होकर महामहिम राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर से कानून भी बन गया। ये स्पीड का कारण तो आमजन जरूर समझ रही होगी।

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