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चंडीगढ़

ऑटिज्म की जागरूकता बढ़ाना और जल्द स्क्रीनिंग की सलाह दी

April 02, 2019 09:37 PM
चंडीगढ़,सुनीता शास्त्री।
ऑटिज़्म से प्रभावित बच्चों और वयस्कों को समान्य की जिंदगी जीने के लिए आवश्यक उपचार और जल्द स्क्रीनिंग की सलाह दी। साइंटफिक कॉन्क्लेव में ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के प्रति माता-पिता और शिक्षकों के सहयोग की भूमिका पर प्रकाश डाला।
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर, ‘ऑटिज्म, एडीएचडी एंड एनेक्जाइटी-मेंटल हेल्थ चैलेंजस-एविडेंस बेस्ड एप्रोच’, थीम पर एक साइंटफिक कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया। इसका आयोजन आशा सेंटर फॉर ऑटिज्म और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, चंडीगढ़ढ़द्वारा नेशनल हेल्थ मिशन के साथ सहभागिता में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन सभागार में किया गया। डॉ.सुजीत सिंह, डायरेक्टर, नेशनल सेंटर फॉर कंट्रोल ऑफ डिजीज, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, नई दिल्ली इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे।

एएसडी को ठीक करने के लिए कोई मेडिकल उपचार नहीं : डॉ. शैफाली, ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के प्रति माता-पिता और शिक्षकों की अहम् भूमिका 

आयोजन में डॉ.बी.एस. चवन, डायरेक्टर प्रिंसिपल, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चंडीगढ़और श्रीमती अमनीत पी.कुमार, आईएएस, मिशन डायरेक्टर, नेशनल हेल्थ मिशन, हरियाणा गेस्ट ऑफ ऑनर थे। कॉन्क्लेव में लगभग 200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें ऑटिज्म से पीड़ित बाल रोग विशेषज्ञ, डेवलपमेंट एक्सपर्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, काउंसलर, नीति निर्माता और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के माता-पिता शामिल थे।डॉ.सुजीत सिंह ने कहा कि मंत्रालय ने ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को विशेष दर्जा देने के लिए कई कदम उठाए हैं ताकि वे सामान्य स्कूलों में एकीकृत (इंटीग्रेट) हो सकें और अपने कौशल और क्षमता के अनुसार व्यावसायिक और रोजगार के अवसर प्राप्त कर सके।
श्रीमती अमनीत पी.कुमार  ने कहा कि प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की भारी कमी है जो बच्चों के इन विकास संबंधी विकारों का निदान कर सकते हैं और एक प्रारंभिक अवस्था में उपचार शुरू कर सकते हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी अधिक खराब है। उसने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से अपील की कि वे ऑटिज्म से प्रभावित लोगों के प्रति अपने रवैये को बदलते हुए एक सकारात्मक भूमिका निभाएं और नागरिकों के रूप में उनके अधिकारों को पहचानें। नेशनल हेल्थ मिशन हरियाणा ऐसी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, जहां, इन बच्चों को मल्टीडिस्प्लनरी उपचार मिल सके। उन्होंने घोषणा की कि हरियाणा एक अनूठा, अभी तक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यकम (आरबीएसके) लागू कर रहा है, जो मोबाइल स्वास्थ्य टीमों के माध्यम से प्रारंभिक जांच और शीघ्र उपचार शुरू करने की आवश्यकता को पूरा करता है और हरियाणा के सभी 21 जिलों में डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर्स (डीईआईसी) की स्थापना करने जा रहा है। डॉ.जफर मीनाई, डायरेक्टर, उम्मीद ग्रुप ऑफ चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर्स के अनुसार, बच्चे की जिंदगी के पहले 30 महीनों के भीतर विकास संबंधित विकार के संकेतों को जल्द से जल्द पहचानना महत्वपूर्ण है। यदि माता-पिता बच्चे के बोलने की क्षमता से संतुष्ट नहीं हैं, यदि बच्चा अपनी दुनिया में खो जाताहै और यदि वह 30 महीनों तक निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो माता-पिता को एक बाल रोग विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।
डायग्नोसिस के बाद, एक मल्टीडिस्प्लनरी टीम के साथ माताओं और परिवारों के सशक्तिकरण पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि बच्चा समाज के साथ घुलमिल सके। डॉ.छाया प्रसाद, डायरेक्टर, आशा और शहर में प्रतिष्ठित डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशयन ने सभी को संदेश दिया कि ऑटिज़्म एक बीमारी नहीं है, लेकिन एक ऐसी स्थिति है जिसे जीवन में जल्दी पहचाना जा सकता है और शुरुआती स्तर पर विशेषज्ञों की मदद से कई तरह की थैरेपी और इंटरवेंशस प्रदान कर एविडेंस आधारित एप्रोच के साथ इसको नियंत्रित किया जा सकता है। ऑटिज्म से पीड़ित हर बच्चा अलग होता है और हर बच्चे को एक डेवलपमेंटल बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम लीड के साथ इंडिविजुअल थेरेपी प्लान की जरूरत होती है। उसने कहा कि अगर माता-पिता और शिक्षक सहयोग करते हैं तो ऑटिज्म से पीडि़त बच्चों के जीवन की बेहतर गुणवत्ता और स्वतंत्र कामकाज करने की क्षमता प्राप्त हो सकती है।
डॉ.नीरज कुमार, प्रेसिडेंट, इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी), चंडीगढ़ ने कहा कि ‘‘आईएपी,  एक ऐसा संगठन है जो खुद को सभी कारणों के लिए समर्पित करता है जो बच्चों के लिए चिंता का विषय है, विशेषकर ऑटिज्म, एक जटिल जैसे विकलांग बच्चों के अधिकारों और भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। मस्तिष्क विकार जो सामाजिक संपर्क को बाधित करता है। यह संगठन द्वारा सभी को संवेदनशील बनाने का एक प्रयास है, इस उद्देश्य के साथ कि ये बच्चे समाज के साथ बेहतर ढंग से जुड़ेगे।
’इस मौके पर डॉ.शैफाली गुलाटी, चीफ ऑफ चाइल्ड न्यूरोलॉजी डिवीजन, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एंड एडवांस रिसर्च ऑन चाइल्डहुड न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर, एम्स, नई दिल्ली ने बताया कि एएसडी को ठीक करने के लिए कोई मेडिकल उपचार नहीं है। यह प्रभावित व्यक्ति के जीवनकाल तक रहता है। इंटरवेंशंस का ध्यान एएसडी वाले व्यक्ति की क्षमता को संरचित टीचिंग, सेंसरी इंटीग्रेशन और दवाओं जैसे इंटरवेंशंस के संयोजन के माध्यम से बेहतर करना और बढ़ाना है। एम्स में उनकी टीम ने एएसडी के डायग्नोस के लिए एक वर्तमान डायग्नोस्टिक एंड स्टेटटिस्कल मैनुअल (डीएसएम 5) आधारित टूल विकसित किया है और केयर फिजिशयंस और बाल रोग विशेषज्ञों को मदद प्रदान करने के लिए इस टूल के आधार पर एक मोबाइल ऐप भी विकसित किया गया है।डॉ.नीरज कुमार, प्रेसिडेंट, आईएपी चंडीगढ़और डॉ. अरुण प्रसाद, डायरेक्टर आशा, चाइल्ड केयर एंड डेवलपमेंट क्लिनिक ने सभी का गर्मजोशी से स्वागत किया।राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रतिष्ठित फैकेल्टी सदस्यों ने ऑटिज्म से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात की। उनके साथ ही नेशनल हेल्थ मिशन हरियाणा के कई वरिष्ठ अधिकारियों जैसे डॉ.वीके बंसल, शहर के कई प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञों डॉ. अरपिंदर गिल, डॉ. ओ.एन.भाकू ने भाग लिया। 
 
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