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3 जून को शनि जयंती : करें शनि के उपाय

May 25, 2019 10:25 PM

मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, चंडीगढ़, 9815619620

  खगोल विज्ञान के अनुसार शनि एक ऐसा ग्रह है जिसके चारो ओर वलय (छल्ला) हैं। यह सूर्य से छठा तथा सौरमंडल में बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। शनि के वायुमंडल में लगभग 96 प्रतिशत हाइड्रोजन और 3 प्रतिशत हीलियम गैस है। खगोल शास्त्र के शनि ग्रह के छल्ले पर सैकड़ों प्राकृतिक उपग्रह स्थित हैं।  आधिकारिक रूप से इसके 53 उपग्रह हैं। 

हिन्दू धर्म में शनि ग्रह शनि देव के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक शास्त्रों में शनि को सूर्य देव का पुत्र माना गया है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन आता है कि सूर्य ने श्याम वर्ण के कारण शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया था। तभी से शनि सूर्य से शत्रु का भाव रखते हैं।

ज्योतिषशास्त्र में सभी ग्रहों में शनि का विशेष महत्व होता है। कुंडली में शनि के शुभ और अशुभ स्थिति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शनि न्याय के भी देवता माने जाते हैं। ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को भगवान शनिदेव का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस बार शनि जयंती 3 जून को मनाई जाने वाली है। शनि की साढ़े साती, ढैय्या या शनि की महादशा से परेशान लोगो के लिए यह दिन विशेष फल देने वाला होता है। 

दिन – सोमवार

अमावस्या तिथि आरम्भ = 02/जून /2019 16:38 से

अमावस्या तिथि समाप्त = 03/जून /2019 15:30 तक

शनि जयंती के दिन सर्वप्रथम स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्य होकर एक लकड़ी के पाट पर काला कपड़ा बिछाकर उस पर शनिजी की प्रतिमा या फोटो या एक सुपारी.रख देना चाहिए। इसके बाद उसके दोनों ओर शुद्ध तेल का दीप तथा धूप जलाना चाहिए। इस शनि देव के प्रतीक रूप प्रतिमा अथवा सुपारी को जल, दुग्ध, पंचामृत, घी, इत्र से स्नान कराकर उनको इमरती, तेल में तली वस्तुओं का नैवेद्य चढ़ाना चाहिए । नैवेद्य चढाने से पहले उन पर अबीर, गुलाल, सिंदूर, कुंकुम एवं काजल लगाकर नीले या काले फूल अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेद्य, फल व ऋतु फल के संग श्रीफल अर्पित करना चाहिए । इस पंचोपचार पूजा के नाद इस मंत्र का जप कम से कम एक माला जरूर करना चाहिए ।

ॐ प्रां प्रीं प्रौ स: शनये नमः॥

अथवा

ॐ शं शनैश्चराय नमः।

मंत्र का जाप करना चाहिए। पश्चात शनि आरती करके उनको साष्टांग नमन करना चाहिए। शनि देव के पूजा करने के बाद अपने सामर्थ्यानुसार दान देना चाहिए। इस दिन पूजा-पाठ करके काला कपड़ा, काली उड़द दाल, छाता, जूता, लोहे की वस्तु का दान तथा गरीब वा निःशक्त लोगो को मनोनुकूल भोजन कराना चाहिए ऐसा करने से शनि देव प्रसन्न होते है तथा आपके सभी कष्टों को दूर कर देते हैं।

पौराणिक कथा

शनिदेव के जन्म से जुडी एक कथा ‘स्कन्द पुराण’ में आयी है जिसके अनुसार सूर्य देव का विवाह राजा दक्ष की कन्या “संज्ञा” के साथ हुआ था। सूर्य देव को “संज्ञा” से तीन पुत्रों का जन्म हुआ। सूर्य देव ने उनका नाम यम, यमुना और मनु रखा। “संज्ञा”सूर्य देव के तेज से परेशान रहती थी वह उनके तेज को अधिक समय तक नहीं सहन कर पायी। इसलिए उसने अपनी प्रतिरूप “छाया” को अपना उत्तरदायित्व देकर सूर्य देव को छोड़ कर चली गई। छाया शिव भक्त थी भक्ति तथा तपस्या में लीन रहती थी परिणाम स्वरूप छाया के गर्भ से उत्पन्न शिशु जिनका नाम शनि रखा गया काले वर्ण के हुए काले वर्ण के कारण पिता सूर्य देव छाया के ऊपर लांछना लगाते हुए बोले की यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता।

श्री शनिदेव के अन्दर जन्म से माँ कि तपस्या शक्ति का बल था; उन्होंने देखा कि मेरे पिता , माँ का अपमान कर रहे है | उन्होने क्रूर दृष्टि से अपने पिता को देखा, तो पिता के शरीर का रंग काला सा हो गया | घोडों की चाल रुक गयी | रथ आगे नहीं चल सका | सूर्यदेव परेशान होकर शिवजी को पुकारने लगे | शिवजी ने सूर्यदेव को सलाह दी की आपके द्वारा नारी व पुत्र दोनों का अपमान हुआ है इसलिए यह दोष लगा है | सूर्यदेव ने अपनी गलती स्वीकार किया तथा क्षमा मांगी और पुन: सुन्दर रूप एवं घोडों की गति प्राप्त की | तब से श्री शनिदेव पिता के विरोधी, शिवजी के भक्त तथा माता के प्रिय हो गए | 

ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह का मनुष्य जीवन पर प्रभाव

समाज में शनि ग्रह को लेकर नकारात्मक धारणा बनी हुई है। लोग इसके नाम से भयभीत होने लगते हैं। परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। ज्योतिष में शनि ग्रह को भले एक क्रूर ग्रह माना जाता है परंतु यह पीड़ित होने पर ही जातकों को नकारात्मक फल देता है। यदि किसी व्यक्ति का शनि उच्च हो तो वह उसे रंक से राज बना सकता है। शनि तीनों लोकों का न्यायाधीश है। अतः यह व्यक्तियों को उनके कर्म के आधार पर फल प्रदान करता है। शनि पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी होता है। 

शारीरिक रूप रेखा - ज्योतिष में शनि ग्रह को लेकर ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में शनि ग्रह लग्न भाव में होता है तो सामान्यतः अनुकूल नहीं माना जाता है। लग्न भाव में शनि जातक को आलसी, सुस्त और हीन मानसिकता का बनाता है। इसके कारण व्यक्ति का शरीर व बाल खुश्क होते हैं। शरीर का वर्ण काला होता है। हालाँकि व्यक्ति गुणवान होता है। शनि के प्रभाव से व्यक्ति एकान्त में रहना पसंद करेगा। 

बली शनि - ज्योतिष में शनि ग्रह बली हो तो व्यक्ति को इसके सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि तुला राशि में शनि उच्च का होता है। यहाँ शनि के उच्च होने से मतलब उसके बलवान होने से है। इस दौरान यह जातकों को कर्मठ, कर्मशील और न्यायप्रिय बनाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में सफलता प्रदान मिलती है। यह व्यक्ति को धैर्यवान बनाता है और जीवन में स्थिरता बनाए रखता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति की उम्र में वृद्धि होती है।  

पीड़ित शनि - वहीं पीड़ित शनि व्यक्ति के जीवन में कई प्रकार की परेशानियों को पैदा करता है। यदि शनि मंगल ग्रह से पीड़ित हो तो यह जातकों के लिए दुर्घटना और कारावास जैसी परिस्थितियों का योग बनाता है। इस दौरान जातकों को शनि के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए शनि के उपाय करना चाहिए।

शनि की अशुभ छाया के संकेत

1. पैरों से संबंधित कोई बीमारी हो सकती है।
2. कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जो आपसे आपकी क्षमता से अधिक काम करवाता है और आपको उस काम का श्रेय भी नहीं मिलता।

3. लगातार पैसों का नुकसान होता रहता है।
4. आपके घर के पालतू काले जानवर (जैसे- काला कुत्ता या भैंस) की मृत्यु हो सकती है।

5. बनते काम बिगड़ सकते हैं। बहुत मेहनत करने के बाद भी उसका थोड़ा ही फल मिलता है।
6. कोई झूठा आरोप लग सकता है, कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।

7. नौकरीपेशा लोगों को ऑफिस में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
8. कोई महंगी चीज खो सकती है या चोरी हो सकती है।

9. घर की दीवारों पर पीपल के पौधे उगने शुरू हो जाते हैं।
10. बार-बार मकड़ियां घर के कोनों में अपना जाल बनने लगे तो समझिए भगवान शनि देव की आपके ऊपर काली छाया पड़ने वाली है।
11. चींटियों का आना भी शनि के अशुभ प्रभाव के बारे में हमें संकेत देता है
12. काली बिल्लियों का आपके घर के आस-पास रहना भी शनि के अशुभ छाया का संकेत होता है। 

शनिदेव को खुश करने के लिए प्रात:काल सूर्योदय होने से पहले उठकर सूर्य भगवान की पूजा करें। उन्हें गुड़ मिश्रित जल अर्पित करें। इस उपाय से शनिदेव खुश रहते हैं।

शनि से संबंधित चीजों जैसे काला कपड़ा, चमड़े का काला जूता, साबुत उड़द, लोहा, तेल, काला कंबल आदि का दान करें।

जो मन और कर्म से सात्विक होता है और गरीब लोगों की जरूरत पड़ने पर मदद करता है, शनिदेव उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

अपने माता-पिता का सम्मान और उनकी सेवा करें। यदि आप अपने माता-पिता से दूर रहते हैं तो उन्हें फोन से या फिर मन ही मन प्रतिदिन प्रणाम करें। माता-पिता की फोटो अपने पर्स में रखते हों तो उनके श्री चरणों की तस्वीर भी रखें।

यदि आप पर शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती चल रही है आप खुद को तमाम परेशानियों से घिरा पा रहे हैं तो शमी के वृक्ष की जड़ को काले कपड़े में पिरोकर शनिवार की शाम दाहिने हाथ में बांधे तथा ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: मंत्र का तीन माला जप करें।

शिव की उपासना एक सिद्ध उपाय है। नियमपूर्वक शिव सहस्त्रनाम या शिव के पंचाक्षरी मंत्र का पाठ करने से शनि के प्रकोप का भय जाता रहता है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इस उपाय से शनि द्वारा मिलने वाला नकारात्मक परिणाम समाप्त हो जाता है।

भगवान शिव की तरह उनके अंशावतार बजरंग बली की साधना से भी शनि से जुड़ी दिक्कतें दूर हो जाती हैं। कुंडली में शनि से जुड़े दोषों को दूर करने के लिए प्रतिदिन सुंदरकांड का पाठ करें और हनुमान जी के मंदिर में जाकर अपनी क्षमता के अनुसार कुछ मीठा प्रसाद चढ़ाएं।

शनिदेव के प्रकोप को शांत करने के लिए यह मंत्र काफी प्रभावी है। शनिदेव को समर्पित इस मंत्र को श्रद्धा के साथ जपने से निश्चित रूप से आपको लाभ होगा।

सूर्य पुत्रो दीर्घ देहो विशालाक्ष: शिव प्रिय:।
मंदाचाराह प्रसन्नात्मा पीड़ां दहतु में शनि:।।

– दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।

– अपने माता-पिता की सेवा करें। बुजुर्गों का अपमान नहीं करें।

– शनिवार को तिल के तेल का दीपक जलाएं।

– तिल के तेल से भगवान शनि का अभिषेक करें।

– काले उड़द, काले तिल या काले चने सामर्थ्य अनुसार दान करें।

– शनिवार का व्रत करके शनि व्रत कथा का पाठ करें।

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