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हिमाचल प्रदेश

मूक-बधिर का सही इलाज है छोटी उम्र में कॉकलियर इमप्लांट सजर्री: डा. गुप्ता

May 26, 2019 08:15 PM

मंडी, विजयेन्द्र शर्मा: नवजात बच्चों में मूक-बधिर से सावधान करते हुए फोर्टिस मोहाली के ई.एन.टी. माहिर डा. अशोक गुप्ता ने कहा जन्मजात मूक-बधिर की समय पर पहचान तथा तुरंत कॉकलियर इमप्लांट सजर्री ही गूंगे व बहरेपन का सही मायने में सही इलाज है। डा. गुप्ता यहां मूक-बधिर की बीमारी तथा अति-आधुनिक इलाज तकनीक कॉकलियर इमप्लांट सजर्री के बारे बोल रहे थे।
डा. अशोक गुप्ता ने विश्व स्तरीय अध्यन्न रिपोर्टस के हवाले से बताया कि प्रति 1000 नवजात बच्चों में औसतन एक बच्चा जन्मजात मूक-बधिर का शिकार होता है, यदि उसका सही समय पर सही इलाज नहीं होता तो वह गूंगेपन का भी शिकार हो जाता है, परंतु ज्यादातर बच्चे की यह बीमारी की शिनाख्त ही नहीं होती तथा या फिर ज्यादातर देरी के साथ पता चलता है। इसलिए बच्चे के पैदा होने के बाद उसकी माहिरों से लगातार जांच करवाते रहना चाहिए, ताकि ऐसी बीमारी होने की सूरत में बच्चे का बिना देरी इलाज हो सके।    

प्रति हजार एक नवजात होता है मूक-बधिर का शिकार


डा. अशोक गुप्ता ने बताया कि यदि 6 माह के अंदर ऐसे मूक-बधिर बच्चे की कॉकलियर इमप्लांट सजर्री हो जाए, तो बेहद शानदार नतीजे आते है। देरी की सूरत में पीडि़त बच्चे के दिमाग के बोलने वाले हिस्से पर 6 साल की उम्र उपरांत सिर्फ देखकर समझने वाला दिमागी विकास हो जाता है। इसलिए जितनी जल्दी कॉकलियर इमप्लांट सजर्री होगी, नतीजे उतने ही सकारात्मक होंगे।
डा. अशोक गुप्ता ने बताया कि कॉकलियर एक बेहद संवेदनशील तथा सूझवान यंत्र (डिवाइस) होता है, जिसको आप्रेशन (सजर्री) द्वारा लगाया जाता है। यह प्रक्रिया करीब 2 घंटों के आप्रेशन के साथ पूरी हो जाती है तथा मरीज को 2-3 दिन में अस्पताल में से छुट्टी मिल जाती है। आप्रेशन की सफलता डाक्टर, अस्पताल की सुविधाओं तथा इमप्लांट करने की सजर्रीकल तकनीक पर ज्यादा निर्भर करती है।
डा. गुप्ता ने बताया कि जन्मजात बहरे बच्चों की इस बीमारी का जल्द पता लगाने के लिए भारत सरकर द्वारा ही हर अस्पताल में जांच के बारे योजना की हुई है, परंतु यह प्रभावशाली तरीके के साथ लागू नहीं हो रही।
अब तक 400 से अधिक बच्चों की सफल कॉकलियर इमप्लांट सजर्री कर चुके डा. अशोक गुप्ता ने बताया कि जो बच्चे जन्म उपरांत देरी के साथ रोते हैं, उन बच्चों में इस बीमार का खतरा ज्यादा होता है। ऐसे बच्चों के ऑडियोमेटरी (ए.बी.वी.आर. एंड ए.एस.एस.आर) टेस्टों की जरूरत होती है। इस उपरांत सिटी स्केन तथा कनपटी की हड्डी की एम.आर.आई द्वारा यह पता लगाया जाता है कि बच्चे के कान में घोगे जैसा सुनने वाला कुदरती यंत्र है भी या नहीं।
इस दौरान उन्होंने एक अन्य पहलू पर बोलते हुए कहा कि रोबोटिक सर्जरी जैसी एडवांस टेकनोलॉजी को शुरू में फिजूल समझा जाता था खासकर सिर व गर्दन के कैंसर के केसों में पहले इसको बेकार बताया जाता था। (हाल ही दौरान खबरें आई थी कि एक अस्पताल में रोबोटिक सर्जरी की गई है जो टैले रोबोटिक सर्जरी की तरह उस जगह पर 32 सेंटीमीटर दूर तक पहुंची जहां सर्जनी ने आप्रेशन किया।) डा. गुप्ता ने बताया कि रोबोटिक सर्जरी न केवल संबंधित जगह तक पहुंचती है बल्कि टयूमर के मुकममल सफाया करती है। प्रक्रिया को सरल तथा आसान बनाती है। आप्रेशन दौरान खून का बिना मतलब नुकसान नहीं होता तथा रिकवरी के लिए ज्यादा समय अस्पताल में दाखिल नहीं रहना पड़ता।
डा. गुप्ता ने बताया कि रोबोटिक सर्जरी थायराइड के आप्रेशन के लिए भी शानदार नतीजे देती है। कयोंकि थायराइड का आप्रेशन शारीरिक सुंदरता को प्रभावित करता है परंतु रोबोटिक सर्जरी एक बाल जैसे पतले तथा छोटे से चीरे के साथ हो जाती है जो आम आप्रेशन के निशान जैसे नजर नहीं आता। उन्होंने बताया कि ऐसे 100 से अधिक सफल आप्रेशन किए जा चुके हैं।

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