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हरियाणा

‘मैं शिखंडी नहीं’ किन्नर समाज पर नया दृष्टिकोण: प्रो. नीतू

August 26, 2019 09:09 PM

सिरसा, सतीश बांसल:
साहित्य में किन्नर समाज पर काफी गंभीर लेखन हुआ है लेकिन पंजाबी साहित्यकार रामस्वरूप रिखी ने अपने उपन्यास ‘मैं शिखंडी नहीं’ में किन्नर समाज की व्यथा को जिस कलात्मक ढंग से उकेरा है उससे इस पुस्तक का महत्व बढ़ गया है और आम लोगों को इस पुस्तक के माध्यम से किन्नर समाज को समझने का अवसर मिला है। बठिंडा के पंजाबी यूनिवर्सिटी कालेज की प्रोफेसर नीतू अरोड़ा ने श्री युवक साहित्य सदन व कलम द्वारा मैं शिखंडी नहीं पुस्तक के हिंदी संस्करण पर चर्चा करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि नि:संदेह विषय बहुत अनूठा है और उतने से ही अनूठे ढंग से इस पर कलम चलाई गई है। इस पुस्तक से पंजाबी से हिंदी में अनुवाद प्रताप सिंह कतीरा व उर्मिल मोंगा ने किया है। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुई धनंजय चौहान किन्नर ने अपने जीवन के अनुभव सांझा करते हुए कहा कि उन्होंने समाज में अपना स्थान बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर समाज के हर वर्ग से कड़ा संघर्ष किया है और इस संघर्ष का परिणाम है कि आज भारत में किन्नर समाज को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता मिली। पुस्तक के लेखक रामस्वरूप रिखी ने इस पुस्तक की रचना प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए निरंजन बोहा ने जीवन में साहित्य के महत्व व विशेष रूप से किन्नर समाज पर आधारित साहित्य पर विस्तार से चर्चा की। कलम की ओर से सुरजीत शिरडी ने अतिथियों का स्वागत किया तथा युवक साहित्य सदन के प्रधान प्रवीण बागला ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य सदन का यह उद्देश्य रहा है कि हिंदी साहित्य व भारतीय संगीत के संदर्भ में आयोजनों में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें तथा आज के आयोजन में एक गंभीर पुस्तक पर चर्चा करके सदन ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति की है। कार्यक्रम संचालक गुरबक्श मोंगा ने समाज में व्याप्त किन्नर समाज के प्रति दृष्टिकोण पर गहरी चिंता जताई।

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