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चंडीगढ़

मठ मंदिर में हर्षोल्लास और श्रद्धाभाव से मनाया गया गोवर्धन पर्वत-अन्नकूट उत्सव

October 29, 2019 09:20 PM

चंडीगढ़, फेस2न्यूज:
श्री चैतन्य गौड़ीय मठ चंडीगढ़ में अन्नकूट महोत्सव (गोवर्धन महाराज जी की पूजा) बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
यह महोत्सव दीवाली के अगले दिन मनाया जाता है।

मठ के प्रवक्ता जयप्रकाश गुप्ता जी ने बताया कि 10 बजे से 12.00 बजे तक श्री हरिनाम संकीर्तन हुआ 12.00 बजे से 1.00 बजे तक गोवर्धन महाराज जी की आरती एवं परिक्रमा की गयी और बहुत ही सुंदर श्रृंगार किया गया। इसके बाद सभी के लिए प्रसाद( भंडारे) का आयोजन किया गया। हजारों भक्तों ने प्रशाद पाया।

गौड़ीय मठ में श्री पुज्यापाद वामन महाराज जी ने गोवर्धन (गिरिराज जी) पर्वत की महिमा के बारे में बताया कि गिरिराज जी की परिक्रमा क्यो की जाती है। और इस दिन उनको छप्पन से भी अधिक प्रकार के व्यजनों का भोग क्यों लगाया जाता है कि किस प्रकार गोवर्धन जी वृज- भूमि पर आये

  
  
श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुये।  एक बार पुलस्त्य मुन तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुये।

मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले- मैं काशी में रहता हूँ, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहाँ जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूँ। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पाँच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊँचा था।
(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा  का रास्ता चौदह मील का है)
गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जायेंगे।
पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये। वहाँ के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि स्मरण हो आयी। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गयी। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गये। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जायेंगे।
अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिये कहा। श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुये। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुम ने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिये प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जायेगा।
तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं।
कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी।
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।
'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिये ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र का अहंकार चूर कर गोकुलवासियों को गोधन के महत्व से परिचित करवाया था। वेदों में इस दिन वरुण, अग्निदेव की पूजा का भी विधान है। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने लक्ष्मी सहित समस्त देवी- देवताओं को बलि के कैद से मुक्त करवाया था। एक वार भगवान श्री कृष्ण अपने बाल सखायों संग गांय चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गए। वहाँ गोप- गोपियां नाच गाकर कोई उत्सव मना रहे थे। उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि "इंद्र को प्रसन्न करने के लिए इन्द्रोज नामक यह यज्ञ न करने पर सब व्रजवासियों को इंद्र के कोप का सामना करना होगा। और समूचा व्रज अकाल या बाढ़ की चपेट में आ जायेगा। इसलिए हमें यह यज्ञ हर हाल में करना ही चाहिए। सबपर श्री कृष्ण ने कहा इंद्र में क्या शक्ति है? उससे ज्यादा शक्तिशाली तो हमारा यह गोवर्धन पर्वत है और व्रज में इसी कारण वर्षा होती है। इसलिए हमें इन्द्रोज यज्ञ करने के बजाए गोवर्धन पूजा करनी चाहिए। काफी विवाद के बाद व्रजवासी इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा करने लगे। श्री कृष्ण ने तब गोवर्धन पर्वत में अपना दिव्य रूप प्रविष्ट कराकर स्वयं गोवर्धन के रूप में समस्त व्यजनों का भोग लगाया और ब्रजवासियों को आशीर्वाद दिया।
इस घटना का पता चलने पर इंद्र ने इसे अपना अपमान समझकर मेघों के जरिये ब्रज में तबाही शुरू कर दी। व्रजवासियों की घबराहट देख श्री कृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत की शरण मे चलने को कहा। ओर गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठा लिया। पूरे सात दिन व्रजवासी गोवर्धन के नीचे सुरक्षित रहे।

अतत: इंद्र को हार माननी पड़ी और जब ब्राह्म जी ने उन्हें श्रीकृष्ण अवतार का रहस्य बताया तो इंद्र श्री कृष्ण जी से क्षमा याचना करने लगे। श्री कृष्ण ने तब गोवर्धन को अपनी उंगली से नीचे उतारते हुए ब्रजवासियों से हर वर्ष इसी दिन गोवर्धन की पूजा करने को कहा।  गौड़ीय मठ में गिरिराज जी को अनेक प्रकार के भोग एवं मिठाइयों का भोग लगाया गया। और फिर सभी को यह प्रसाद दिया गया।

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