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शरीर कैसे छोडऩा है दादी पहले से ही कर ली थी प्लानिंग, दादी जी नही चाहती थी कि उनके शरीर छोडऩे पर ज्यादा खर्च हो

April 08, 2020 09:16 AM

राज सदोष

आबू रोड। ब्रह्माकुमारीज संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी जानकी ने पहले से ही अपने शरीर छोडऩे की प्लानिंग कर ली थी। कई बार इसका जिक्र करती थी कि वे चाहती है कि उनके शरीर छोडऩे के समय ना तो कोई डिकल मशीनरी लगी हो और ना ही किसी हास्पिटल में रहे। दादी ने जब 26 मार्च को इस दुनिया से विदा हुई तो बिल्कुल वही स्थिति थी। उक्त बातें दादी जानकी की निजी सचिव रही बीके हंसा ने दादी जानकी के दो महीने साथ के अनुभवों को साझा कर रही थी।

बीके हंसा पिछले 35 सालों से वे दादी जानकी के साथ लंदन सेवाओं में रही और उनकी निजी सचिव के रूप में सेवायें करती रही। उनके काफी करीब रहकर उनके हर श्वासं और संकल्प को समझा, अपने अन्दर गुणों को धारण किया। उनसे बातचीत पर आधारित। यह स्मरण दादी जानकी के शरीर छोडऩे के 13 दिन पर व्यक्त किया गया।

  
उन्होंने बताया कि दादी की इच्छा थी कि जब वे शरीर छोड़े तो उनके शरीर छोडऩे पर ज्यादा ताम झाम या ज्यादा खर्च या लोग इकटठे ना हों। यह बात कई बार वो सार्वजनिक रूप में भी करती थी। वैसे तो उनकी तबियत 17 मार्च को ही अहमदाबाद में ज्यादा खराब हो गयी। वहॉं से चिकित्सक छुटटी नहीं दे रहे थे कि वे माउण्ट आबू लेकर आये। लेकिन दादी का भाव और विचार था कि मुझे जल्दी माउण्ट आबू ले चलो। इसके बाद दादी जी 18 मार्च को माउण्ट आबू आ गये।

एक बारगी लगा दादी ठीक हो रही: माउण्ट आबू आने के बाद एकबारगी लगने लगा कि दादी ठीक हो जायेगी। उनके सपोटिंग सिस्टम को हटा दिया गया। केवल कभी कभी आक्सीजन दी जाती थी। ऐसे में लगने लगा कि दादी अब पूरी तरह ठीक हो जायेंगी। हाथ मिलाया और भाकी पहनी: शरीर छोडऩे के पहले मुझसे हाथ मिलाया और भाकी पहनी। यह करीब रात दस बजे की घटना है। इसके कुछ देर के बाद ही दादी की तबियत ज्यादा ही खराब होने लगी। चिकित्सकों को बुलाया गया लेकिन 26 मार्च को  रात्रि दो बजे वे इस दुनिया से विदा हो गयी।

चिकित्सकों से पूछती हालचाल: जब वे अहमदाबाद में हास्पिटल में थी तब उनकी देखभाल के लिए चिकित्सक आते थे परन्तु दादी उनसे पहले उनका ही हॉल चाल पूछती थी। जिससे चिकित्सकों को भी बहुत आश्चर्य होता था कि आखिर दादी बिल्कुल फरिश्ते की भांति थी। 

खुद लिखवाती थी संदेश: दादी समस्त विश्व के संस्थान से जुड़े लोगों के लिए अस्वस्थ रहते हुए भी खुद ही संदेश लिखवाती थी कि ये संदेश सभी भाई बहनों को तथा समस्त सेवाकेन्द्रों पर भेजा जाये। 

रहने लगी थी उपराम: दादी शरीर में रहते हुए भी उपराम रहने लगी थी। जैसे कि वे शरीर में है ही नहींं। इसलिए डाक्टरों से अपने बारे में खुद मुझसे ही हॉल चाल के लिए पूछने के लिए कहती थी।

कुछ महीने पहले से ही देने लगी थी इशारा: दादी जी को लगता था कि वे इस दुनिया से विदायी लेने वाली हैं। इसका इशारा वे कुछ समय से ही देने लगी थी। वे मुझे कहती थी कि मेरा शरीर साथ नहीं देता, तुम ये मत समझना कि मैं अकेली हूॅं। मैं
हमेशा तेरे साथ रहूंगी। परमात्मा चाहता है कि तुम भी तपस्या कर शक्तिशाली बनो।

पूना से प्रारम्भ की थी ईश्वरीय सेवा, अंतिम बार भी पूना से ही पूरा हुआ: दादी जी ईश्वरीय सेवाओं की शुरूआत पुना से ही की थी। अंतिम बार उनका जाना पूना ही हुआ था। 27 जनवरी को पूना गयी और वहॉं से आने के बाद उनकी तबियत खराब रहने लगी थी।

बीके हंसा पिछले 35 सालों से वे दादी जानकी के साथ लंदन सेवाओं में रही और उनकी निजी सचिव के रूप में सेवायें करती रही। उनके काफी करीब रहकर उनके हर श्वासं और संकल्प को समझा, अपने अन्दर गुणों को धारण किया। उनसे बातचीत पर आधारित। यह स्मरण दादी जानकी के शरीर छोडऩे के 13 दिन पर व्यक्त किया गया।

गौरतलब है कि राजयोगिनी दादी जानकी ने 104 वर्ष की उम्र में अपने नश्चर शरीर का त्याग कर दिया था।

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