कविताएँ

सिकुड़ा वैश्वीकरण

April 21, 2020 09:50 AM

वक़्त है ठहरा ठहरा सा

जहाँ है सूना सूना सा
हर तरफ है हलचल बन्द
सारा जहाँ हो गया है घरों में बंद
समाज में रह कर भी, समाज से है दूर
यह कौन सी आपदा है जो कर रही जन-जन को दूर
इतना खौफ है इस कोरोना का
हर शख्स है सहमा सहमा सा
दुनिया चली थी वैश्वीकरण की ओर
अब सिकुड़ गई है अपने देशों की ओर
आकाश, धरा, सागर सब जगह है
तेरा ही कहर
नहीं दिखता है वहां पर मानव
और न ही मानव निर्मित परिवहन
ऐसा क्या हुआ है इस जग को
किसकी काली नज़र इसको लग गई
दुनिया है परेशान हैरान
कि पड़ोसी को पड़ोसी से ही अलग कर गई
कि पड़ोसी को पड़ोसी से ही अलग कर गई।।

श्रीमती रेनू नगर (शिक्षिका)
शारदा सर्वहितकारी मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल, 40 डी, चंडीगढ़

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