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राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट पर ये आक्षेप लगते रहे कि होती है रसूखदारों की याचिका पर सुनवाई

May 18, 2020 10:59 AM

चंडीगढ, संजय मिश्रा:
इसे निम्नलिखित दो परिदृश्य में से समझा जा सकता है।
पहला परिदृश्य— अर्णव गोस्वामी की याचिका:
एक निजी टी वी चैनल रिपब्लिक भारत के मुख्य संपादक अर्णव गोस्वामी पर विभिन्न राज्यों में करीब 100 प्राथमिकी दर्ज होती है, आरोप यह लगाया गया कि, अर्णव गोस्वामी सोनिया गांधी के बारे में कथित रूप से मानहानि कारक टिप्पणी की, जिस वजह से उनके खिलाफ कई राज्यों में प्राथमिकी और शिकायतें दर्ज करायी गयी थीं। अर्णव गोस्वामी की याचिका पर लॉकडाउन के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंस से त्वरित सुनवाई करते हुए, अर्णव गोस्वामी को उसके गिरफ्तारी पर रोक लगाने सहित अन्य कई राहतें दी।
गुजरात के कानून मंत्री की याचिका:
गुजरात के कानून मंत्री एवम् बीजेपी नेता भूपेंद्र चूड़ासमा के 2017 चुनाव को जब गुजरात हाई कोर्ट ने अवैध करार दिया तो उनकी याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के फैसले पर फौरन रोक लगाई।

दूसरा परिदृश्य —सूचना अधिकार कार्यकर्ता की याचिका:
देश में सूचना अधिकार अधिनियम की दुर्दशा पर सूचना अधिकार के तहत सेवा में कमी की शिकायत को उपभोक्ता मंच में सुने जाने को लेकर 2010 से संघर्षरत याचिका, जिला मंच होते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग एवं राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के बाद 2016 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा इस गूढ़ कानूनी पहलू के साथ की क्या सूचना अधिकार अधिनियम के तहत फीस एवं लागत का भुगतान करने वाला आवेदक उपभोक्ता है? और उपभोक्ता कानून का अतिरिक्त उपचार का लाभ जो सभी कानूनों के उपयोगकर्ता को उपलब्ध है क्या वो सूचना अधिकार कार्यकर्ता को उपलब्ध है? तो सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को पहली सुनवाई में ही 29-8-2016 को खारिज कर दिया। पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई उसे भी मार्च 2018 में खारिज कर दिया गया। (SLP CC 23903 of 2016).
किरण कुमार, बंगलुरू की याचिका:
सूचना आयोग की नाकामी और अपने अधिकार क्षेत्रो से परे जाकर ऊटपटांग आदेश जारी करने को लेकर किरण कुमार ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। मामला था कि कर्नाटक सूचना आयोग द्वारा कानून के प्रावधानों के तहत समुचित कार्रवाई नहीं करना और कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग को आदेश जारी कर उसे सूचना अधिकार से संबंधित कोई भी शिकायत नहीं सुनने की हिदायत। ऐसे ज्वलंत कानूनी पहलू की क्या सूचना आयोग उपभोक्ता आयोग को निर्देशित कर सकता है कि उसे किस तरह की शिकायत सुननी चाहिए? लेकिन ये याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। (Diary No. 17291 of 2015 _ Kiran Kumar Vs Bangalore University).
उपरोक्त दोनों परिदृश्यों से ये साफ होता है कि पहले परिदृश्यों वाली दोनों याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा तुरंत सुनी गई और राहत भी तुरंत दी गई, क्योंकि याचिकाकर्ता एक मंत्री और जाने माने रसूखदार थे
वहीं दूसरे परिदृश्य वाली दोनों याचिकाएं ज्वलंत कानूनी पहलू वाली होने के बावजूद भी सिर्फ इसलिए खारिज हुई क्योंकि याचिकाकर्ता एक आम आदमी था कोइ मंत्री या रसूखदार चेहरा नहीं।
इससे ये तो साफ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ रसूखदारों की याचिका सुनती है आमजनता कि नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपनी नौकरी के अंतिम दिन विदाई भाषण में न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणी की। बुधवार (06 मई) को सुप्रीम कोर्ट बार काउंसिल द्वारा आयोजित वर्चुअल फेयरवेल पार्टी में जस्टिस गुप्ता ने कहा कि देश का कानून और न्याय तंत्र चंद अमीरों और ताकतवर लोगों की मुट्ठी में कैद है।
जस्टिस गुप्ता ने जोर देकर कहा कि ऐसी स्थिति में बेंच और बार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो समाज के वंचितों और गरीबों को न्याय दिलाने में मदद करें। वो इस बात पर नजर रखें कि कहीं गरीबी की वजह से उनके मुकदमे पेंडिंग बॉक्स में पड़े न रह जाएं। उन्होंने कहा, “यदि वास्तविक न्याय किया जाना है, तो न्याय के तराजू को वंचितों के पक्ष में तौलना होगा।”
कुछ दिन पहले की ही बात है, जस्टिस मदन बी लोकुर ने देश में सूचना अधिकार अधिनियम के दुर्दशा पर अपनी चिंता और संवेदना व्यक्त किया था। ज्ञात हो कि जब सूचना अधिकार कानून को मजबूत करने के इरादे से एसएलपी 23903 ऑफ 2016 दाखिल हुई थी तो जस्टिस लोकुर और जस्टिस आर के अग्रवाल की खंडपीठ ने पहले ही सुनवाई में खारिज कर दिया। ये बात अलग है कि जस्टिस आर के अग्रवाल अभी राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए तो वो चुप है और जस्टिस लोकुर को सरकार ने कोइ पद नही दिए तो उन्हें सूचना अधिकार अधिनियम के दुर्दशा की चिंता सता रही है।
सवाल मन में एक बार जरूर आता है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के जज अपने रिटायरमेंट के बाद ही गरीब याचिकाकर्ता के हमदर्द क्यों बनते हैं, अपने कार्यकाल में तो ऐसी बाते नहीं करते कि 90 प्रतिशत याचिका पहली सुनवाई में ही खारिज क्यों कर दी जाती है, इस कुब्यवस्था को बदलना चाहिए। यहां हम इसे कुव्यवस्था इसलिए कह रहे है क्योंकि जज महोदय जब अपने पद की शपथ लेते है तो उस शपथ में ये शपथ नहीं होता है कि हम याचिका खारिज कर देंगे, बल्कि शपथ लेते हैं कि हम जनता के साथ न्याय करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गुप्ता ने ‘द टेलीग्राफ’ को दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘जो भी पार्टी सत्ता में होती है। वह न्यायपालिका पर नियंत्रण रखने की या प्रभावित करने की कोशिश करता है। लेकिन यह न्यायाधीशों पर है कि वे निष्पक्ष रहें।
लेकिन क्या सचमुच में ऐसा होता है ? कदापि नहीं। ऐसा नहीं है कि रिटायर्ड जजों की अन्य आयोगों में नियुक्त को हमेशा से संदेह के घेरे में देखा जाए, ये तो कानूनी बाध्यता है जिसके तहत रिटायर्ड जस्टिस को अन्य आयोग, जैसे उपभोक्ता आयोग या मानव अधिकार आयोग जैसे कई आयोगों में नियुक्त करना ही है, लेकिन जहां कानूनी बाध्यता नहीं होने के बावजूद भी रिटायर्ड जजों को पोस्ट ऑफर किए जाते हैं तो उसे संदेह की दृष्टि से जरूर देखा जाए जैसे कि जस्टिस गोगोई का राज्यसभा के लिए सरकार द्वारा मनोनीत किया जाना।
मुझे एक कहानी याद आ रही है जिसमें एक राजा था उसने कई लड़ाईयां लड़कर अन्य कई राजाओं को अपने अधीन कर लिया और लूटे गए माल से अपना खजाना भर लिया। एक साधु ने राजा के दरबार में आकर कहा, राजन इस दुनियां से आजतक कोई भी मनुष्य मरने के बाद अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सका है लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप अपने इस खजाने को मरने के बाद अपने साथ जरूर लेकर जाओगे। ऐसे में मेरी आपसे विनती है कि मेरी ये कमंडल और ये वस्त्र आप अपने पास रख ले मै ऊपर के लोक में ये सामान आपसे लेे लूंगा। सुनने में आया कि इतना सुनते ही उस राजा की आंखे खुल गई और उसने लूटे गए सभी धन वापस कर दिए।
काश अपने देश के न्यायाधीश भी इस बात को समझ पाते कि उनका काम न्याय करना है, याचिका खारिज कर अन्याय करना नहीं। ये न्याय रूपी अनमोल रत्न बस यही पर रहकर लोगों में बांटने के लिए है जिसे वो बचाकर अपने साथ ऊपर नहीं ले जा सकते।

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