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चंडीगढ़

कोरोना- नीतियां एवं नियंत्रण

May 28, 2020 05:58 AM

— एफ पी एन
फरीदकोट मेडिकल यूनिवर्सिटी से बतौर रजिस्ट्रार रिटायर हुए डॉक्टर पी. एल. गर्ग लॉक डाउन के वक्त कैलिफोर्निया (अमेरिका) में थे। दरअसल वे स्वास्थ्य विशेषज्ञ के साथ-साथ अनुभवी प्रबंधक व उच्च कोटि के विश्लेषक भी माने जाते हैं। एडल्ट लिटरेसी मिशन पंजाब के निदेशक ही नहीं रहे बल्कि स्टेट हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर पंजाब के कार्यकारी निर्देशक भी रहे। वर्तमान समय में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की फैकल्टी ऑफ मेडिकल साइंसेस के डीन भी हैं। अमेरिका से वापसी की उड़ान 24 मार्च की थी जो लॉक डाउन के चलते कैंसिल हो गई। हजारों किलोमीटर दूर होकर भी डॉक्टर गर्ग इंटरनेट के जरिए देश की पल-पल की खबर ले रहे थे और देश के प्रति चिंतित भी थे। कुछ दिन देखते रहे कि शायद सरकार की तरफ से सभी वांछित प्रबंध कर लिए जाएंगे। परंतु जो कुछ होना अति आवश्यक था, जब नहीं होते दिखा तो उन्होंने टेलीफोन पर दी गई एक इंटरव्यू में बताया कि लॉक डाउन के दौरान अगर देश में मौजूद सभी स्वास्थ्य कर्मचारियों, जिनमें 8.30 लाख आशा वर्कर व उनके सहयोगी, 2 लाख ए.एन.एम. एवं पुरुष कार्यकर्ता मौजूद हैं, जिनके द्वारा मात्र 10-12 दिन में ही देश के करीब 26 करोड़ घरों का संपूर्ण सर्वेक्षण हो सकता है। पंजाब में स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या 25 हजार से ज्यादा है। पंजाब के 56 लाख घरों का सर्वेक्षण 7-8 दिनों में आराम से हो सकता है. इतने दिनों में प्रति कर्मी ढाई सौ घरों का सर्वेक्षण आसानी से किया जा सकता है। इस सर्वेक्षण में करोना के मरीज, उनके संपर्क व संदिग्ध मरीजों की पहचान करना व उनकी बड़े स्तर पर टेस्टिंग, एकांतवास, इलाज व निगरानी शामिल है। उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि लॉक डाउन या कर्फ्यू 10-15 दिनों से ज्यादा रखना हमारे देश के लिए हर तरह से घातक सिद्ध होगा। पश्चिमी देशों की नकल हमारे लिए किसी भी रूप में ठीक नहीं होगी। वहां होम डिलीवरी का तंत्र पहले ही बहुत अच्छे से बना हुआ है। किंतु हमारे देश के दूरदराज के इलाकों में यह तंत्र अभी बहुत दूर की कौड़ी है। सबसे पहले बीमार, करोना पीड़ित व तंदुरुस्त लोगों को जितनी जल्दी हो सके अलग-अलग किया जाए। लेकिन हमारे देश की अफसरशाही पहले माह तो करोना पीड़ितों को ढूंढते -ढूंढते ही थक गई। जब उनके इलाज के साथ-साथ उन्हें घर पर लॉकडाउन हुए लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा करना पड़ा तो हाथ-पैर फूल गए। जब अचानक करोना के 2-4 मरीज भी पकड़ में आ जाते तो जैसे सारे सरकारी तंत्र को कंपकंपी छूट जाती। डॉक्टर गर्ग मीडिया में आकर बार-बार करोना को नियंत्रण करने के उपाय बताते रहे किंतु सरकार और उनके अफसर सदैव अपने ही घोड़ों पर सवार रहे।   


अब किस्सा और भी दिलचस्प! मगर त्रासदी पूर्ण भी। अमेरिका से 15 मई को एयर इंडिया की फ्लाइट में लोगों को लाया गया। यात्रियों से दोगुना किराया यह कहकर वसूला गया कि शरीरक दूरी के नियम के चलते एक सीट छोड़कर बिठाया जाना आवश्यक है। लेकिन यात्रियों को हैरत तब हुई जब जहाज की 16 घंटे की उड़ान में उन्हें बिना कोई सीट छोड़े बिठा दिया गया। इतनी लंबी उड़ान में जाहिर है कि लोग निद्रा की हालत में 5-6 फुट तो क्या 2 फुट की दूरी भी नहीं रख पाए थे। लेकिन जैसे ही भारत में एयरपोर्ट पर उतरे तो एयर इंडिया के कर्मचारियों द्वारा सभी यात्रियों को 6 फुट की दूरी कायम रखने के लिए बाध्य किया जाता रहा। किस्सा यहीं खत्म हो जाता तो भी गनीमत थी। दिल्ली से वे लोग जब अपने शहर में पहुंचे तो शहर के पांच सितारा होटल की पांचवी मंजिल पर बने कमरों में सीढ़ियों के रास्ते जाने के आदेश मिले। सरकारी आदेश के अनुसार सीनियर सिटीजन व सीढ़ियां चढ़ने में अक्षम लोगों के लिए भी लिफ्ट का इस्तेमाल निषेध था। इस पर तुर्रा यह कि एकांतवास के 14 दिनों तक ना तो उस कमरे की सफाई होगी और ना 14 दिनों तक उनके बेड की चादर ही बदली जा सकेगी। सरकार की शर्तों पर एकांतवास में तो रहना पड़ेगा किंतु सिविल जेल में रहने का सारा खर्चा विदेश से आने वाले व्यक्ति को स्वयं ही उठाना पड़ेगा। नियमों के मुताबिक किसी भी तरह की जेल में रखना अक्सर गृह विभाग की जिम्मेदारी हुआ करती है।

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