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राष्ट्रीय

आखिर क्यों नहीं पीएमओ पीएम केयर फंड आरटीआई के दायरे में ?

May 31, 2020 09:38 AM

संजय कुमार मिश्रा

 प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए आमलोगों से ली जाने वाली वित्तीय सहायता स्वीकार करने के लिए गठित पीएम-केयर्स फंड से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने से मना कर दिया है।

यह जानकारी सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट इनवायरमेन्ट (सेफ) के संस्थापक और नोएडा निवासी विक्रांत तोंगड़ ने 21 अप्रैल को आरटीआई के तहत पीएम केयर्स फंड की ट्रस्ट डीड, सभी सरकारी आदेश की कॉपी, नोटिफिकेशन और सर्कुलर संबंधी भी जानकारी मांगी थी । लेकिन मात्र 6 दिनों के भीतर 29 मई को पीएमओ के पब्लिक इंफोर्मेशन अधिकारी ने यह कहकर खारिज कर दिया है कि “पीएम केयर्स फंड पब्लिक अथॉरिटी नहीं है। हालांकि पीएम केयर्स फंड के बारे में उसकी वेबसाइट से जानकारी ली जा सकती है।”

पीएमओ के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ)परवीन कुमार ने ये जवाब देने के लिए सीआईसी का एक आदेश और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में पीठ के एक कथन का सहारा लिया है. जानकार बताते है कि लोक सूचना अधिकारी ने इन दोनों फैसलों के गलत मायने निकाल लिए हैं क्योंकि ये दोनों फैसलों में सूचना देने से किसी भी तरह की रोक नहीं लगाई गई है ।

पूर्व सीआईसी शैलेश गांधी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर दिया गया बयान बिना सोचे-समझे की गई टिप्पणी है। 

यहां सवाल उठता है कि जब प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड यानी (PMNRF) पहले से ही मौजूद है. तो नया रिलीफ फंड एकाउंट PM CARES fund बनाने की क्या जरूरत पड़ गई ? खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही कश्मीर और केरल की बाढ़ के मौके पर इस फंड के जरिए से ही लोगों से मदद मांगी और लोगों ने दी भी थी, फिर अब क्या हुआ ?

सवाल ये भी है कि जब पी एम केयर फंड एक पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट है और इसमें पब्लिक के दान किए हुए पैसे महामारी के समय पब्लिक की भलाई में ही खर्च होने है तो फिर पब्लिक को इस फंड की आमदनी एवं खर्च से संबंधित सूचना देने में आनाकानी और बहानेबाजी क्यों ? क्या दाल में कुछ काला है ? ऐसे तो इस फंड के प्रति अविश्वसनीयता और बढ़ेगी*नए फंड के निर्माण, संचालन एवं अन्य जानकारी आमजन को मिलनी ही चाहिए क्योंकि फंड में आमजन द्वारा दान दिया गया पैसा है जिसके बारे में उसे जानने का हक है । इसे नकारने या छिपाने की जितनी कोशिश होगी, इस नए फंड की विश्वसनीयता उतनी ही घटेगी। 

दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट के एक विवादित जजमेंट के बेस पर कहा जाता है कि नेहरु का बनाया PM NRF फंड RTI के दायरे में आता था और मोदी ने जो PM care फण्ड बनाया है वो RTI के दायरे में नहीं आते है। ये बात गलत है दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट के इस जजमेंट में दो जजों की बेंच बैठी थी और दोनों जजों ने एक दुसरे से विपरीत राय दो बिन्दुओ के आधार पर रखी थी, जिससे ये मामला फिलहाल तीसरे बेंच के अधीन है जहां 15 जुलाई 2020 को सुनवाई होनी है।

पुराने प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ़ फंड में कौन कौन इस ट्रस्ट के सदस्य होते है विवादित जजमेंट की कॉपी के इस पार्ट को पढ़िए :-जबकि, जो नया PM CARES fund बनाया गया है. वहां प्रधानमंत्री मोदी खुद इसके चेयरमैन हैं, साथ में गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एवं एक अन्य मंत्री राजनाथ सिंह उसके ट्रस्टी हैं. इसके अलावा और कोई नहीं है. अगर वो कल को पद पर नही रहेगे तो जो नये बनेगे वो होगे सदस्य इस नए फंड का, लेकिन नेहरु ने तो PMNRF में कोग्रेस के अध्यक्ष सहित टाटा ट्रस्टी एवं फिक्की के चेयरमैन को इसका आजीवन सदस्य बना दिया था  और इसी स्थाई सदस्यता की चेन को तोड़ने के लिए ही ये नई फंड पीएम केयर फंड बनाया गया है, ऐसा कहा जाता है।

लेकिन बात सिर्फ RTI में लाने की नही है बात RTI में आने के बाद किसकी जिम्मेदरी होगी ये भी निर्धरित करने की है ।

खुद प्रधानमंत्री ने एक छात्र द्वारा दिए गए 1000 रुपये के योगदान के लिए उसे शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि देश का भविष्य राष्ट्र के भविष्य को सुनिश्चित कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि समाज के सभी वर्ग के लोगों ने कोविड-19 के खिलाफ जंग में दान देने की इच्छा जाहिर की है। उनकी भावना का सम्मान करते हुए पीएम-केयर फंड बनाया गया है जो की एक पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट है। प्रधानमंत्री इसके चेयरमैन होंगे और गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री इसके सदस्य होंगे। इसमें दान की गई छोटी से राशि भी 80(जी) के तहत कर मुक्त होगी। इस फंड से हमारी आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ेगी।

सवाल ये भी है कि जब पी एम केयर फंड एक पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट है और इसमें पब्लिक के दान किए हुए पैसे महामारी के समय पब्लिक की भलाई में ही खर्च होने है तो फिर पब्लिक को इस फंड की आमदनी एवं खर्च से संबंधित सूचना देने में आनाकानी और बहानेबाजी क्यों ? क्या दाल में कुछ काला है ? ऐसे तो इस फंड के प्रति अविश्वसनीयता और बढ़ेगी। 

उपरोक्त बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते है, कोरोना से खड़े हुए संकट के इस दौर में पीएम केयर्स फंड के गठन को प्रधानमंत्री का अच्छा प्रयास बताते हैं. मगर उनका मानना है कि इसको लेकर उठ रहे सवालों का सरकार को जवाब देना चाहिए, ताकि शंकाओं का समाधान हो सके. उनका मानना है कि सरकार से सवालों का उचित जवाब दिए जाने पर पीएम केयर्स की विश्वसनीयता बढ़ जाएगी.

विराग गुप्ता कहते हैं कि इस फंड के लिए पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया गया है जिसमें प्रधानमंत्री समेत कई अन्य मंत्री ट्रस्टी हैं. इस रजिस्टर्ड ट्रस्ट डीड की कॉपी को सार्वजनिक कर दिया जाए तो अधिकांश अटकलों पर विराम लग जाएगा. सरकार को आधिकारिक तौर पर यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि प्रधानमंत्री राहत कोष में बड़े पैमाने पर रकम होने के बावजूद इस नए फंड को बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? क्या कोरोना की महामारी खत्म होने के बाद इस फंड को समाप्त कर दिया जाएगा?

विराग गुप्ता ने कहा, ‘ जनता को यह जानने का भी अधिकार है कि सरकार के मंत्री इस ट्रस्ट के पदेन सदस्य हैं या व्यक्तिगत तौर पर ट्रस्टी हैं. यदि मंत्री लोग इस ट्रस्ट के अधीन ट्रस्टी हैं तो फिर भविष्य में मंत्रियों के विभाग में किसी परिवर्तन से ट्रस्टियों में भी बदलाव करना पड़ सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के जजों ने भी इस फंड के लिए अपना योगदान दिया है, इसलिए भविष्य में इसे यदि कोई नई चुनौती दी गई तो अदालतों में कैसे सुनवाई हो सकेगी? कुछ नेताओं ने बयान देकर कहा है कि इस फंड की सीएजी ऑडिट होगी इसलिए इस पर कोई भी बात करना उचित नहीं है लेकिन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के सीएजी ऑडिट का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए यदि ऐसी कोई व्यवस्था बनाने का विचार है तो उस बारे में टैक्स छूट के लिए जारी किए गए अध्यादेश के साथ ही कोई प्रावधान करना चाहिए था ।

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ की तीखी आलोचना करते हुए कहते हैं कि ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ के वजूद में होते हुए इस कोष के स्थापना की कोई आवश्यकता नहीं थी. यह स्वयं की प्रशंसा के लिए गढ़ा गया है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिख कर दिए गए सुझावों में एक सुझाव यह भी दिया है कि ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ की समस्त राशि ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ में स्थान्तरित कर दी जाये जिसमे पहले से ही तीन हजार आठ सौ करोड़ रूपए हैं.

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इसके नियम और खर्चे अपारदर्शी हैं और उन्हें अपने अतार्किक निर्णयों का जवाब देश को देना होगा. इस फंड के पक्ष में भारतीय जनता पार्टी के सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं कि इस फंड का उपयोग न केवल कोरोना वायरस से लड़ने के लिए किया जायेगा बल्कि लाक डाउन की वजह से प्रभावित लोगो की सहायता के लिए भी किया जा सकेगा. हाल ही में राहुल गांधी और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी प्रधान मंत्री से इस कोष से किये गए खर्च का हिसाब मांगा है

सारांश यही है कि इस नए फंड के निर्माण, संचालन एवं अन्य जानकारी आमजन को मिलनी ही चाहिए क्योंकि फंड में आमजन द्वारा दान दिया गया पैसा है जिसके बारे में उसे जानने का हक है । इसे नकारने या छिपाने की जितनी कोशिश होगी, इस नए फंड की विश्वसनीयता उतनी ही घटेगी। 

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