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पंजाब

दूरदर्शिता या मूर्खता

May 31, 2020 01:24 PM

— एफ पी एन
सुरजीत मान मोहाली वासियों के लिए एक समाज सेवक का नाम है। जब भी अफसरशाही किसी कमजोर व्यक्ति के साथ कहीं ज्यादती करती है तो मिस्टर इंडिया की तरह सुरजीत मान वहां पहुंच जाते हैं। तर्कशील सोसायटी के संपर्क में रहने के कारण उनकी यह आदत बन गई कि जब कहीं कुछ गलत होने का पता चलता है तो वे तुरंत उसका समाधान निकालते हैं, संबंधित अफसर को तथ्यों सहित समझाने का प्रयत्न करते हैं। अक्सर उन्हें अपने इस काम में सफलता भी मिलती रही है। परंतु कभी-कभार किसी जिद्दी अफसर से पाला पड़ जाए तो वे मीडिया कर्मियों को बुलाने से भी नहीं चूकते। किंतु करोना वायरस के शुरू के दिनों में एक अजीब वाक्या हुआ।    

भयंकर भूल को सुधारने का खामियाजा सुरजीत मान को कई जगह जलील होकर भुगतना पड़ा। परंतु सरकार व उसकी अफसरशाही अपनी कार्यप्रणाली में टस से मस होने को अभी तक तैयार नहीं।


उनके अनुसार 23 मार्च को उनके पास सिविल अस्पताल फेस 6 से एक डॉक्टर का फोन आता है कि आपकी सहायता की जरूरत है। अस्पताल में डॉक्टर्स वाले रूम के बिल्कुल साथ वाले कमरे को करोना पीड़ितों के लिए आरक्षित कर दिया गया है। डॉक्टर्स वाले रूम में जाने की एंट्री उसी रूम से है। अस्पताल प्रशासन किसी की बात नहीं सुन रहा। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर सुरजीत को यह सुनकर अचंभा लगा। इस बात की पुष्टि जब दो और लोगों ने भी कर दी तो उन्होंने सीनियर मेडिकल ऑफिसर को फोन करके समस्या के गंभीर होने का अंदेशा जताया और कहा कि इस तरह तो सभी डॉक्टर्स करोना की चपेट में आ सकते हैं। सीनियर मेडिकल ऑफिसर ने अफसरशाही वाला रोअब झाड़ते हुए कहा कि हमारे काम में दखल देने के दोष में मैं तुम पर पर्चा दर्ज करवा सकती हूं। सुरजीत के अनुसार उन्होंने कहा कि ऐसा मैंने कौन- सा गुनाह कर दिया है, मैं तो सिर्फ अस्पताल प्रशासन को अपनी गलती सुधारने को ही कह रहा हूं। इस तरह मैं तो सरकार, लोगों और अस्पताल प्रशासन की ही सहायता कर रहा हूं। सुरजीत मान ने बताया कि करीब आधे घंटे बाद मुझे पता चला कि मेरे सीनियर मेडिकल ऑफिसर से फोन पर बात करने के ठीक 20 मिनट बाद करोना के मरीज को अस्पताल की पहली मंजिल पर बने आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। उसे एकबारगी तो लगा कि उसका काम खत्म हो गया है किंतु हैरानी तब हुई जब इस घटना के 2 दिन बाद यानी 25 मार्च 2020 को रात 9:36 पर मोहाली के डीएसपी अमरोज सिंह का फोन आया। उन्होंने बताया कि मेरे खिलाफ 188 का पर्चा दर्ज किया जाना बनता है। पुलिसिया अंदाज में धमकाते हुए उन्होंने बताया कि करोना महामारी के दौरान मुझे नोडल अफसर बनाया गया है। झूठी अफवाह फैलाने का दोष लगा कर तुम पर एफ. आई. आर दर्ज की जा सकती है। मैंने जब निडरता पूर्वक कहा कि अगर किसी की गलती सुधारना गुनाह है तो मुझ पर आप कोई भी पर्चा दर्ज कर सकते हैं। डीएसपी ने कहा कि सीनियर मेडिकल अफसर ने हमारे पास तुम्हारी शिकायत की है कि तुम उनके काम में अड़चन डालते हो। सुबह 10:00 बजे मेरे पास आकर पेश होना पड़ेगा। इसके लगभग आधे घंटे बाद सिविल अस्पताल के सीनियर मेडिकल अफसर- दो का फोन आता है और धमकी भरे अंदाज में इस मामले से किनारा कर लेने को कहा जाता है। करोना महामारी में सरकारी अफसरों की ताकत का अंदाजा लगाने को कहते हुए इस मामले को तूल देने के साइड इफेक्ट समझाए जाते हैं। जब अपनी बेगुनाही की बात मैंने सख्त शब्दों में कही तो उन्होंने बात वहीं खत्म करने को कहते हुए डीएसपी के पास ना जाने की बात कही। इसके बावजूद मैंने सुबह 9:30 बजे डीएसपी अमरोज को कॉल करके पूछा कि सर! मैं आपके पास कब और कहां आऊं? उन्होंने कहा कि मेरे पास आने की जरूरत नहीं। परंतु आगे से मैडम को तंग नहीं करना। जब मैंने कहा कि सर , मैंने मैडम को कभी भी किसी तरह से तंग नहीं किया है। मैंने सिर्फ अस्पताल प्रशासन की गलती सुधारने को कहा था तो उन्होंने यह कहते हुए फोन काट दिया कि हम लोगों पर करोना के कारण पहले से ही बहुत प्रेशर है। इसके करीब 1 घंटे बाद पुलिस चौकी फेस 6 से फिर फोन आता है। यह पूछने पर कि आप कौन बोल रहे हैं तो आगे से पुलिसिया अंदाज में जवाब मिलता है कि मैं पंडित बोल रहा हूं। काका आप का टेवा बनाना है। तुम पुलिस चौकी आओगे या हम तुम्हें घर से उठाने आए? सुरजीत मान अपने पिता , जो पंजाब सरकार से बतौर सेक्रेटरी रिटायर हुए हैं, को लेकर आधे घंटे में पुलिस चौकी पहुंच गया। वहां उस पर माफीनामा लिखकर देने का दबाव डाला गया। लेकिन जब उसने उन्हें मामले से संबंधित कॉल रिकॉर्डिंग सुनाई तो उन्होंने खानापूर्ति करते हुए सिर्फ यह लिखने को कहा कि मैं मैडम को क्रोना महामारी के दौरान कुछ नहीं कहूंगा। मैंने समय की नजाकत को समझते हुए मामले को कुछ देर के लिए लटका देना ही मुनासिब समझा। क्योंकि यदि उस समय यह मामला मीडिया में आ जाता तो लोगों के साथ-साथ सरकार व स्थानीय प्रशासन के लिए भी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती थी। अतः मैंने वहां यह लिखकर दे दिया कि इस महामारी के चलते मैं सीनियर मेडिकल ऑफिसर को कुछ नहीं कहूंगा।   
Surjeet Maan (Social Worker)
 

अब देखा जाए तो उसकी यह दूर-अंदेशी समय और हालात को देखते हुए समझदारी ही मानी जाएगी ना कि मूर्खता!क्योंकि यदि यह मुद्दा उस समय मीडिया में उठाया जाता तो लोगों तक भी पहुंचता। सिविल अस्पताल के ऐसे हालत जान लेने के बाद लोग मरते मर जाते पर करोना बीमारी हो जाने के डर से अस्पताल की तरफ मुंह ना करते। सरकार व उसके स्वास्थ्य विभाग की कार्य प्रणाली पर उंगलियां उठती अलग से। ऐसे में समाज का कितना बड़ा नुकसान हो सकता था, जो अस्पताल प्रशासन की एक भयंकर भूल का नतीजा था। उनकी इस भयंकर भूल को सुधारने का खामियाजा सुरजीत मान को कई जगह जलील होकर भुगतना पड़ा। परंतु सरकार व उसकी अफसरशाही अपनी कार्यप्रणाली में टस से मस होने को अभी तक तैयार नहीं।

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