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राष्ट्रीय

मास्क पहनने का औचित्य

June 05, 2020 11:22 AM

— एफ पी एन
कुछ महीने पहले तक गर्मी- सर्दी, धूल- मिट्टी व वायु प्रदूषण के चलते लोगों को मुंह-सिर ढक कर ही बाहर निकलना पड़ता था। वायु प्रदूषण के चलते ना सिर्फ चमड़ी के रोग हो रहे थे बल्कि घर वापसी तक चेहरे पर प्रदूषण की मोटी परत भी जम जाती थी। गर्मी के मौसम में चेहरा व हाथ- पांव धूप से जलते थे और कड़कड़ाती सर्दी में सर्द व खुश्क हवाएं कई तरह की और बीमारियों को निमंत्रण देती थीं। किंतु सरकारों के अपने फंडे हैं। गोया वे हमारी अपनी सरकारें ना होकर किसी दूसरे देश की हों और लोगों की मुश्किलों और उनके दु:ख- सुख से उनका कोई वास्ता ही ना हो। कड़वा सच यही है कि लोकतंत्र में सरकार लोगों की वोटों से ही बनती है, किंतु चुने जाने के बाद धीरे-धीरे वह लोगों से दूर होती चली जाती है। नेताओं के चमचे- कड़छे, पंखे-पंखियां (फैंस) फिर उन्हें राजा और कुछ समय बाद भगवान का दर्जा दिला ही देते हैं। उस समय सरकारों को एतराज था कि मुंह-सिर तो चोर- उचक्के, डाकू- लुटेरों को छुपाना पड़ता है ताकि कोई उन्हें पहचान ना ले या वे जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों की पकड़ में ना आ जाएं। तब ट्रैफिक पुलिस ने सिर- मुंह ढक कर बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी थी। बहुत जगह पर चालान काटने भी शुरू कर दिए थे, चालान का जुर्माना, वह भी 300 रुपए। सरकारी आदेशों का पालन ना करते हुए अक्सर शरीफ लोग ही उनकी पकड़ में आते। चोर, डाकू, लुटेरे तो तब भी पुलिस की पकड़ में कम ही आते थे। क्यों जो अपने बचने का प्रबंध उन्होंने पहले ही से बखूबी कर रखा होता था।   

गोया वे हमारी अपनी सरकारें ना होकर किसी दूसरे देश की हों और लोगों की मुश्किलों और उनके दु:ख- सुख से उनका कोई वास्ता ही ना हो। कड़वा सच यही है कि लोकतंत्र में सरकार लोगों की वोटों से ही बनती है, किंतु चुने जाने के बाद धीरे-धीरे वह लोगों से दूर होती चली जाती है।


अब जब लॉकडाउन के चलते वायु प्रदूषण छूमंतर हो चुका है, हवा में ताजगी का एहसास होने लगा था तो सरकारों का आदेश मिला कि मुंह-सिर ढक कर बाहर निकलो। करोना वायरस का सहम फैला तो देशभर में धड़ाधड़ मास्क बिके! रईस लोगों ने मार्केट के सारे मास्क खरीद कर अपने कब्जे में कर लिए। मास्क की खूब कालाबाजारी हुई। 5-10 रुपए वाला मास्क बाजार में 50 से 100 रुपए में बिका। आज भी बिक रहा है। इस कालाबाजारी को रोकना हालांकि सरकारों का काम है परंतु ऐसे सारे काम अब सरकारों के सिलेबस से शायद बाहर हो चुके हैं। ना स्वास्थ्य मंत्री को फुर्सत है कि इस तरफ ध्यान दें और ना किसी अफसर की ही हिम्मत हुई। लूट तो आम लोगों की ही हो रही है ना, और यह आम लोग तो आज यूं भी हाशिए पर धकेले जा चुके हैं। हालांकि सरकारों के सारे काम, सारी मशक्कत और सारी उठापटक इसी आम आदमी के नाम पर ही हो रही है। परंतु उसका जीवन स्तर ऊंचा होने की बजाय उतना ही गर्त में जा रहा है। उस पर सितम यह कि उसे दिल खोलकर चीखने का अधिकार भी नहीं। मुंह पर मास्क पहनना शायद इसीलिए जरूरी किया गया है कि अगर कभी उसका दर्द या तकलीफ असहनीय हो जाए और वह चीख पड़े तो उसकी चीख कहीं विदेशों में सुनाई न दे जाए। दम घुटने सेे वह मर बेशक जाए। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री तो वैसे भी शराब के कारोबारी हैं। शराब स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। शराब की प्रत्येक बोतल पर यह वैधानिक चेतावनी लिखी होती है। लेकिन उनके लिए तो यह कारोबार खुद की और राज्य की कंगाली दूर करने का साधन मात्र है। स्वास्थ्य मंत्री होते हुए लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करना भले ही उनका संवैधानिक कर्तव्य हो किंतु उन्हें राज्य के खाली खजाने की शायद ज्यादा फिक्र है। यूं भी हमारे मुख्यमंत्री साहब ने तो प्रधानमंत्री से हुई पहली मीटिंग में ही ऐलान कर दिया था कि पंजाब में 87 फ़ीसदी लोग करोना पीड़ित हो सकते हैं।अब अगर पीड़ितों की संख्या कम हो गई तो वे झूठे पड़ जाएंगे। करोना महामारी में अब बॉस को झूठा सिद्ध ना होने देने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्री को ही लेनी पड़ेगी। सो तनदेही से वे इसे पूरा कर रहे हैं। यानी आम के आम- गुठलियों के दाम!
एक संक्षिप्त सर्वेक्षण के अनुसार अगर 6 माह तक लोगों को इसी तरह गर्मी व बरसात के इस मौसम में मास्क पहने को बाध्य किया जाता रहा तो एक साल बाद देश में कम से कम 40 फ़ीसदी लोग सांस की गंभीर बीमारी के रोगी हो सकते हैं।लेकिन सरकारों को इससे कोई सरोकार नहीं। हमारी सरकारों का सिर्फ एक ही मंत्र है कि यदि किसी को ताजी हवा में सांस लेने का ज्यादा ही शौक है तो निकालो 500 रुपए। चाहे आप अपनी बंद गाड़ी में ही क्यों ना बैठे हों।
इधर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी बिना सोचे-समझे और देश के जलवायु और मौसम को बिना जाने मास्क पहनने के दिशा- निर्देश जारी कर दिए। कोरोना के डर से लोगों ने धड़ाधड़ मास्क खरीदने और पहनने शुरू कर दिए थे। सरकारों ने लोगों का सहम देखा तो उसे कैश करने की सोची। अब हालत यह है कि आपको सांस आए या ना आए, सरकार या उसके कर्मचारियों को इस बात से कुछ लेना-देना नहीं। काम-धंधा करो या ना करो। खाना खाओ या ना खाओ! परंतु हमारी पूजा तो करनी ही पड़ेगी। मास्क नहीं खरीदोगे तो उसकी कीमत से कई गुणा ज्यादा जुर्माना भरना ही पड़ेगा। कोरोना चाहे सरकार की दोषपूर्ण नीतियों व गलत प्रबंधन की वजह से ही फैल रहा हो किंतु यह जजिया तो आपको ही देना पड़ेगा।
अच्छा होता यदि सरकारें बीमार, खांसी- जुकाम से पीड़ित लोगों को मास्क पहनने को मजबूर करती और ना पहनने पर भारी-भरकम जुर्माना लगाती तो मास्क पहनने का औचित्य फिर भी समझ में आता, ताकि तंदुरुस्त लोग उनसे थोड़ा दूरी बना कर रख लेते।आज हालत यह है कि हर कोई एक दूसरे पर करोना पीड़ित होने का शक करता है जिससे आपसी प्यार व भाईचारे में भी दरारें उत्पन्न हो रही है।

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