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राष्ट्रीय

भ्रष्ट तंत्र की उपज है विकास दुबे— जो बहुतों का जीवन ही ले डूबे

July 09, 2020 08:16 PM

— एफपीन  

व्यवस्था तब तक नहीं बदल सकती जब तक शीर्ष पर बैठे लोग इस गठजोड़ को तहस-नहस करने की दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं दिखाते।


विकास दुबे को पुलिसिया भाषा में गैंगस्टर, कुख्यात अपराधी, सरगना और ना जाने कैसी-कैसी संज्ञा दी जा रही है। आज सुबह 10 बजे पूर्व नियोजित ढंग से उसने खुद को उज्जैन के महाकाल मंदिर में पुलिस के आगे सरेंडर कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ-साथ हरियाणा व मध्य प्रदेश की पुलिस का भी दम फुला हुआ है विकास दुबे के नाम से। एक डीएसपी समेत आठ पुलिसकर्मी उसके घर के आगे विकास दुबे के कारिंदों की गोलियों का शिकार होकर मारे गए। वैसे वे सब कब, कैसे, किस की गोलियों या किस-किस की साजिश का शिकार हुए यह तो तब ही पता चलेगा जब कभी इस घटना की निष्पक्ष जांच होगी। वैसे हमारी मौजूदा न्याय प्रणाली में क्या सच में कभी किसी पुलिस द्वारा निष्पक्ष जांच होती भी है? यह बात कानून को थोड़ा जानने समझने और कानूनी प्रक्रिया की पेचीदगियों से वाबस्ता रहने वाले लोग अक्सर दबी जुबान में कहा करते हैं। दबी जुबान में इसीलिए कि पता नहीं कब कोई पुलिस वाला उनके साथ इस बात की खुंदक निकाल बैठे और बिना कोई गुनाह किए पुलिस के किसी झूठे पुलिस एनकाउंटर का शिकार हो जाए। पंजाब के पूर्व डीजीपी सुमेध सैनी पर चल रहा केस इस बात का जीता जागता उदाहरण है। हमारी न्याय प्रणाली के छिद्र ऐसे असरदार लोगों के बड़े काम आते हैं। इधर हमारा मीडिया भी अक्सर खड़ा बेशक दिए के साथ दिखाई देता है लेकिन मदद हवा की ही कर रहा होता है।  
 

आज पुलिस, राजनीति और अपराधी ऐसे घी-खिचड़ी हुए दिखाई दे रहे हैं कि अदालतें चाह कर भी कुछ खास नहीं कर पा रही। हमारी न्याय प्रणाली में इन सबके चलते इतनी चोर- मोरियां या कहीं छिद्र हो चुके हैं कि आगे आने वाले समय में कई विकास दुबे लाइन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। दरअसल जब कानून बनाने वाले और उसकी रक्षा करने वाले लोग अपराधी किस्म के लोगों के साथ किसी तरह का गठजोड़ बनाते हैं और फिर गाहे-बगाहे उनको संरक्षण या सहायता प्रदान करने लगते हैं तो लोकतंत्र का मजाक बनना तय ही है। चौबेपुर थाने के थानेदार विनय तिवारी और हल्का इंचार्ज दरोगा ही जब पुलिसिया कार्रवाई की सूचना अपराधी तक पहुंचा रहे हों तो भला ऐसी घटना पर हैरत कैसी? कानपुर-मुरादाबाद जैसे क्षेत्र तो वैसे भी अपराधों के सिरताज माने जाते हैं। यदि इंसानों में कभी कोई सिंघम जैसा पुलिस अफसर तैनात कर दिया जाता तो शायद इन इलाकों की तकदीर कुछ बदल जाती। परंतु जब राजनेता ही अपराधी तत्वों को पनाह देने वाले हों और उन्हीं की सिफारिश पर थाने में ऊपर से नीचे तक का स्टाफ लगाया जाता हो तो भला ऐसी घटनाओं पर इतनी हाय-तौबा मचाते हुए हम कहां अच्छे लगते हैं? हमारी न्याय प्रणाली का कड़वा सच यही है कि आज भी जब कभी कोई पीड़ित व्यक्ति थाने के भीतर घुसता है तो सिपाही से लेकर अफसर तक की नजर या तो उसकी जेब पर होती है या उसकी हैसियत पर। ऐसे हालात में इंसाफ की चाह तो आरंभ में ही कुंठित होकर रह जाती है। पुलिस थाने में नेता/मंत्री का कत्ल कर देने पर भी यदि कातिल खुलेआम घूम रहा है तो कसूर कातिल का नहीं, कसूर उन पुलिस अफसरों का है जो जनता के पैसों में से भारी भरकम वेतन तो लेते हैं लेकिन सलाम अपराधियों को ठोकते हैं। और बदले में उनसे मोटी रकम भी वसूलते हैं। न्याय प्रणाली के इन्हीं छिद्रों की बदौलत आज अपराधी तत्व ऐश कर रहे हैं और ईमानदारी से जीवन जीने वाला अवसाद का शिकार होने को मजबूर है। सरकार चाहे किसी की भी हो, यह व्यवस्था तब तक नहीं बदल सकती जब तक शीर्ष पर बैठे लोग इस गठजोड़ को तहस-नहस करने की दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं दिखाते। विकास दुबे के इर्द-गिर्द फैले लोगों या उसके परिवार वालों को जेल भेजने के साथ-साथ अपना तंत्र दुरुस्त करने और शासन-प्रशासन के उन लोगों का चेहरा बेनकाब करना ज्यादा जरूरी है जो ऐसे तत्वों को शह देते हैं।
यह एक सुनहरा अवसर हो सकता है जब इस घटना से सबक लेते हुए भ्रष्ट पुलिस तंत्र और मौजूदा न्याय प्रणाली के छिद्रों की समीक्षा की जाए। पुलिस तंत्र में जहां आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है वहां अंग्रेजों के जमाने की न्याय प्रणाली को भी जनहित में परिवर्तित किए जाने की सख्त जरूरत है। पुलिस तंत्र को 'अपराधी और पीड़ित', गलत और ठीक, शरीफ और बदमाश में अंतर करना शायद नए सिरे से सिखाए जाने की जरूरत है। अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह पूरी ईमानदारी से ना करने पर सख्त सजा का प्रावधान होना भी उतना ही जरूरी है। अपराधी से रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने वाली खबरों से समाचार पत्र भरे रहते हैं। कर्मचारी व अफसर एक बार पकड़े जरूर जाते हैं, लेकिन कब, कैसे छूट गए, कोई नहीं जान पाता। अच्छा हो यदि उन पर ऐसी कड़ी कार्रवाई हो, जिस से डर कर शेष लोग उस गलत रहा पर जाने की सोचें भी ना।

 
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