मनमोहन सिंह ‘दानिश’
बात 1960 की है। एक हिंदी फिल्म बनी थी — जिस देश में गंगा बहती है। उस फिल्म एक गाना शैलेन्द्र ने लिखा था। उस गाने के बोलों में था “हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है”। हमें लगा हमारी नागरिकता का प्रमाण है हमारे पास। हम भारत में पैदा हुए, हमारे बाब दादा यहां पैदा हुए। हमारे बच्चे यहां पैदा हुए लेकिन अब पता चला कि हमारे पासपोर्ट पर “नागरिकता” के कॉलम में जो “भारतीय” लिखा है वह वैसे ही किसी अफसर का दिल किया तो लिख दिया उसका कोई मतलब थोड़े है। अरे वो तो एक यात्रापत्र है जो हम ऐरे गैरे किसी को भी “बांट” देते हैं। वो कोई हमारा भारतीय नागरिक होने का प्रमाण थोड़ी है। जिसकी वेरिफिकेशन पुलिस ने कर दी उसे पासपोर्ट मिल गया।
तो फिर हमारी नागरिकता अगर कहीं पैदा होने से नहीं, वहां रहने से नहीं, विदेशों में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने से नहीं तो किससे है? फिर हमें एक दिन याद आया कि हमने स्कूल की इतिहास की किताब में पढ़ा था कि आर्य भारत में मध्य एशिया से आए थे। अब पता नहीं हम भी उनके साथ थे। अगर साथ थे तो कौन से काफिले में शामिल थे। पर उसका कोई रिकॉर्ड नहीं। पर सरकार क्या करे उसे तो हम जैसे हर उस विदेशी को बाहर निकालना है जो आर्यों के साथ भारत में घुस आया था।
एक बात है, हमारी विद्वान लोगों की यह सरकार इतिहासकारों के इन तथ्यों को नहीं मानती। वह कहती है कि आर्य ही यहां के मूल निवासी हैं। अगर मूल निवासी हैं तो नागरिकता पर सवाल क्यों? मुझे लगता है कि हमें अपनी नागरिकता के अवशेष सिंधु घाटी की सभ्यता और मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में तलाशने पड़ेंगे। चलो कोई बात नहीं जहां से हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, और सत्ताधारी दल के नेता और उनके भक्त अपनी नागरिकता के सबूत खोजेंगे वहां से हम भी ढूंढ लेंगे।
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