Thursday, 10 September 2026
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चाटुकारिता की इंतिहा क्या है?

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

” मुर्दा बोले कफ़न फाड़े” यह मुहावरा शायद छठी या सातवीं क्लास में हम सब ने पढ़ा होगा। पर इसका अर्थ अब जाके समझ में आया। हमें आभारी होना चाहिए हमारे नेताओं, अभिनेताओं, टीवी एंकर्स और कुछ विद्वान पत्रकारों का जिन्हों के “अथक” प्रयासों से हम जैसे मूड़ मति के कलम घसीट भी इस मुहावरे का अर्थ समझने लायक हो गए। हालांकि निजी रूप से मेरा इस मुहावरे से कोई प्यार या लगाव नहीं है पर क्या करूं जब मैं अपने नेताओं, अभिनेताओं, टीवी एंकर्स और पत्रकारों के बयान, उनका विश्लेषण, उनके अलंकार आदि पढ़ता या सुनता हूं तो सोचता हूं इससे तो खामोश ही रहते तो बेहतर था। किसी ज़माने में किसी ऐसे ही नेता ने कह दिया था कि : “इंदिरा इज इंडिया” तब पहली बार एहसास हुआ कि इस मुहावरे का अर्थ क्या है।

लेकिन अब तो इस तरह के बयानों, अलंकारों, उदाहरणों की भरमार होने लगी है। भोजपुरी फिल्मों के एक अभिनेता ने तो यहां तक कह दिया कि मोदी जी भारत हैं और अगर मोदी जी नहीं होंगे तो भारत भी नहीं होगा। वैसे इन भाई साहब का भी कसूर नहीं है। ये बेचारे सारी उम्र स्क्रिप्ट राइटर के लिखे संवाद बोल कर वाह वाही लूटते रहे। इन्हें क्या पता कि कौनसी बात कैसे करनी चाहिए। इनका मकसद तो चाटुकारिता की इंतिहा को छूना था। खैर, उसमें वे सफल रहे।

एक महिला मुख्यमंत्री हैं उन्हों ने कहीं स्कूल की चौथी पांचवीं की किताब में पढ़ लिया होगा कि जब बहुत गर्मी पड़ती है तो समंदर का पानी भाफ बनके उड़ता है जिस से बादल बनते हैं और वे मॉनसून बन कर देश भर में बारिश करते हैं। इन मोहतरमा ने इससे यह निष्कर्ष निकाल लिया कि भाफ़ बनके पानी के उड़ने से उनके राज्य में पानी का भारी संकट पैदा हो गया है। उनका यह तर्क मेरे जैसे साधारण मानव के समझ में तो आया नहीं, आपकी समझ में कुछ आया हो तो मुझे भी समझा देना।

बाकी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जी कहते हैं जिलापरिषद और बीडीसी के सदस्यों का महत्व केवल एक दिन के लिए होता है। मतलब यह कि बिना सोचे समझे कुछ भी बोल दो।

बाकी हमारे जिम्मेदार न्यूज चैनल जो खुद को खुदा से कम नहीं समझते। जिनके ऐंकर बदतमीज़ी की हर सीमा पार कर जाते हैं धर्मेंद्र जैसे बड़े कलाकार को दस बारह दिन पहले ही मर देते हैं। इनकी चमड़ी इतनी मोटी है कि इन्हें अपने किए पर शर्म तक नहीं आती। जहां तक नौकरी की बात है तो मालिकों के तलवे चाटने वालों की नौकरियां तो कहीं नहीं जाती। अखबारों और चैनल्स की नौकरी तो खुद्दार लोग छोड़ते हैं। पर हमें क्या?