Sunday, 31 May 2026
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असम से बंगाल तक गहराया भगवा प्रभाव, पूर्वी भारत में बदले राजनीतिक समीकरण

नव ठाकुरीया

हाल के वर्षों में पूर्वी भारत पर भगवा लहर का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दिया है। इसकी पुष्टि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की शानदार सफलता और असम में राजनीतिक सत्ता के और अधिक मज़बूत होने से हुई, जहाँ इस राष्ट्रवादी पार्टी ने लगातार तीसरी बार चुनावी जीत हासिल की। हाल के चुनावों से पहले प्रचार अभियान के दौरान जहाँ कुछ लोगों ने आशावादी विचार व्यक्त किए थे, वहीं कुछ विश्लेषकों ने यह अनुमान लगाया था कि BJP के नेतृत्व वाला गठबंधन असम में सत्ता बरकरार रखेगा और 126 सदस्यीय विधानसभा में उसे सौ से अधिक सीटें मिलेंगी। इसी प्रकार बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में भी पार्टी ने दो सौ का आँकड़ा पार करते हुए सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी।

इस बीच, सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, और हिमंत बिस्वा सरमा असम के सरकार प्रमुख बने हुए हैं। 4 मई को हुई मतगणना के परिणाम BJP के लिए अत्यंत उत्साहजनक रहे। पार्टी ने अकेले 82 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि उसके भरोसेमंद सहयोगी असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) को 10-10 सीटें मिलीं। इसके विपरीत विपक्षी कांग्रेस और उसके चुनावी सहयोगियों को केवल 21 सीटों से संतोष करना पड़ा। इनमें गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को केवल 19 सीटें मिलीं। मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किए गए सांसद गौरव गोगोई स्वयं जोरहाट विधानसभा सीट पर BJP के तीन बार के विधायक हितेंद्र नाथ गोस्वामी से चुनाव हार गए।

हालाँकि सत्तारूढ़ गठबंधन ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी, लेकिन सरकार के मौजूदा मुखिया हिमंत बिस्वा सरमा ने ही चुनाव प्रचार की पूरी कमान संभाली। वर्ष 2015 में कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए सरमा आज असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत में भगवा राजनीति का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। उनके आक्रामक चुनाव प्रचार, जिसमें ‘मिया’ यानी बांग्लादेश से आकर बसे मुस्लिम समुदाय के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया, ने स्थानीय लोगों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया। अपनी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चिंतित मतदाताओं ने इन मुद्दों को गंभीरता से लिया। इसके अलावा सरकार ने बुनियादी ढाँचे के विकास, जनकल्याण योजनाओं और पारदर्शी रोजगार प्रक्रिया को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया।

सभी प्रमुख एग्जिट पोल्स ने असम में BJP गठबंधन की शानदार जीत का अनुमान लगाया था। मतगणना के लिए हजारों इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) 35 सुरक्षित स्ट्रॉन्ग रूम में केंद्रीय सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी में रखी गई थीं। यह अनुमान उस समय सही साबित हुआ जब 35 जिला मुख्यालयों में बने 40 मतगणना केंद्रों से परिणाम सामने आए, जहाँ 2,345 से अधिक माइक्रो-ऑब्जर्वर मौजूद थे। चुनाव अधिकारियों ने मतगणना प्रक्रिया के लिए अन्य राज्यों से बुलाए गए 126 मतगणना पर्यवेक्षकों को भी तैनात किया था। BJP को इस बार अब तक के सबसे अधिक विधायक मिले, जबकि वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने 78 सीटें जीती थीं। उस समय हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल थे।

कांग्रेस के पूर्व नेता होने के नाते हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया। हाल ही में असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा भी ‘भगवा खेमे’ में शामिल हो गए। चुनाव से ठीक पहले BJP में शामिल हुए सांसद प्रद्युत बोरदोलोई को प्रतिष्ठित दिसपुर निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया गया और वे चुनाव जीतने में सफल रहे। दूसरी ओर असम विधानसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता देबब्रत सैकिया तथा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रिपुन बोरा अपनी-अपनी सीटों से चुनाव हार गए। हाल ही में सरमा ने असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को मंत्रिपरिषद के प्रमुख के रूप में अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिससे दिसपुर में नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया। नई सरकार का गठन 12 मई को होने की संभावना है।

BJP की चुनावी सफलता के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सक्रिय भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर असम में हजारों ‘हिंदू सम्मेलन’ आयोजित किए। ये आयोजन विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर हुए और उन्होंने व्यापक जनसंपर्क अभियान का रूप ले लिया। स्वयंसेवकों ने व्यक्तिगत संपर्क, सार्वजनिक सभाओं और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से शत-प्रतिशत मतदान के लिए लोगों को प्रेरित किया। विशेष रूप से हिंदू मतदाताओं को बिना किसी हिचकिचाहट के अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। परिणामस्वरूप राज्य में 85.91 प्रतिशत का भारी मतदान दर्ज हुआ, जिसे सीधे तौर पर ‘भगवा उम्मीदवारों’ के लिए लाभकारी माना गया।

असम चुनावों का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ‘ज़ुबीन गर्ग प्रकरण’ भी रहा। चुनाव के दौरान जिन राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने सिंगापुर में ज़ुबीन गर्ग की असामान्य मृत्यु और उससे जुड़ी जाँच प्रक्रिया को चुनावी राजनीति में मुद्दा बनाने की कोशिश की, उन्हें जनता का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। कुछ समूहों ने दावा किया था कि ‘Justice for Zubeen’ अभियान के कारण युवा मतदाता सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ मतदान करेंगे, क्योंकि यह मुद्दा लोकप्रिय सांस्कृतिक व्यक्तित्व ज़ुबीन गर्ग के लाखों प्रशंसकों और शुभचिंतकों की भावनाओं से जुड़ा हुआ था। किंतु वास्तविक परिणामों में मतदाताओं ने बिल्कुल अलग प्रतिक्रिया दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रतिक्रिया पर भविष्य में गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता होगी। उल्लेखनीय है कि ज़ुबीन गर्ग के निकट परिजनों ने सार्वजनिक रूप से अपील की थी कि उनकी असामयिक मृत्यु और उससे जुड़ी घटनाओं को चुनावी लाभ के लिए राजनीतिक रंग न दिया जाए, लेकिन कुछ समूहों ने इस आग्रह की अनदेखी की। (लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)