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चंडीगढ़

पत्रकार एक सैनिक के भांति, करे अपनी कलम का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से, अंशुल छत्रपति

September 08, 2017 08:18 PM

अंशुल के पिता की हत्या 24 अक्तूबर 2004 की हत्या तब की गई जब उन्होंने अपने समाचारपत्र - पूरा सच्चा में उस गुमनाम चिठ्ठी का खुलासा किया जिसमें डेरा प्रमुख राम रहीम द्वारा किये जा रहे कुकर्मो का जिक्र किया गया था । उसी चिठ्ठी ने ही अंत में राम रहीम को जेल की सजा सुनाई । 

चंडीगढ, सीमा पर तैनात अपनी बंदूक के साथ एक सैनिक से पत्रकार की तुलना करते हुये मारे गये पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने आज चंडीगढ प्रेस कल्ब में आयोजित एक सैमिनार के दौरान इस बात पर बल दिया कि पत्रकार अपनी कलम की ताकत को विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग में लायें । 

चंडीगढ प्रेस कल्ब की पहल के अंर्तगत अंशुल आज चंडीगढ की मीडिया से रूबरू हुये और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की कुरूतीयों का खुलासा किया । 
अंशुल के पिता की हत्या 24 अक्तूबर 2004 की हत्या तब की गई जब उन्होंने अपने समाचारपत्र - पूरा सच्चा में उस गुमनाम चिठ्ठी का खुलासा किया जिसमें डेरा प्रमुख राम रहीम द्वारा किये जा रहे कुकर्मो का जिक्र किया गया था । उसी चिठ्ठी ने ही अंत में राम रहीम को जेल की सजा सुनाई । 
अंशुल ने विस्तारपूर्ण तरीके से परिवार के पाकिस्तान प्लायन यात्रा के बाद  प्रकाश डालते हुये कहा, “मेरे पिता की शहीदी पत्रकारिता के सिद्वांतों पर आधारित था । उन्होनंे अपना अखबार इसलिये शुरू किया था कि अन्य संपादकों के सम्पादन शैली से नाखुश थे । वे हमेशा से ही अपना अखबार खोलने के हक में थे ।“ 
उन्होनंे बताया कि उनके पिता पर हुये हमले से भी पूर्व फतेहाबाद में एक अन्य अखबार पर भी डेरा प्रमुख की खिलाफ छपी खबर को डेरा प्रेमियों ने आडे हाथो लिया था ।
अंशुल ने बताया कि उनकी हत्या का मुख्य कारण 30 मई 2002 छपी उस गुमनाम पत्र था । खबर छपने की एक दिन बाद से ही उन्हें धमकियां आने शुरू हो गई थी जिससे की स्पष्ट हो गया था कि उनकी हत्या किसी भी समय हो सकती है । परन्तु वे अपने मूल्यों पर डटे रहे । और तीन दिन बाद तीन लोगों ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी ।राम चन्द्र छत्रपति को 24 अक्तूबर 2002 गोली मारी गई और नई दिल्ली स्थित आपोलो हस्पताल में 21 नवंबर 2002 को उन्होंनेे अंतिम सांस ली । 
 उन्होनंे खुलासा किया डेरा प्रमुख ने पूरा जोर लगाया कि सीबीआई की पूछताछ को आगे न बढाया जा सके । उन्होंने कहा कि हमने पंजाब और हरियाणा में सीबीआई जांच के लिये याचिका दायर  की और वे सफल रहे। पेशियों के दौरान मेडिकल का हवाला देकर वह केस से कन्नी काटता दिखा जबकि असल में फिल्म की शूटिंग में व्यस्त था ।
ओपन हाउस टॉक में अंशुल ने बताया कि डेरा प्रमुख को मिली सजा न्याय का प्रतीक है परन्तु अन्य मामलों की भी जल्द सुनवाई हो । 
एक प्रश्न के जवाब में कि वे किसी विशेष विचारधारा का समर्थन करते हैं क्यांेकि उन्होंने कुछ नामी कांग्रेसी नेताओं का नाम लिया जिन्होंने सीबीआई तक पर दवाब बनाने का प्रयास किया था, तो उन्होनंे बताया कि सभी सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों ने डेरा प्रमुख को सजा दिलवाने में काफी ढिलाई वाला रूख दिखाया था । इस दौरान उनकी किसी ने भी मदद की थी ।
 उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि समूचे मामले में असल हीरो वह दो साध्वीयां और गवाह थे जो कि अनंत दवाब के बावजूद भी सच पर अटल रहे । 
इस सत्र के समापन पर उपाध्यक्ष सौरभ दुग्गल ने छत्रपति  परिवार की पत्रकारिता जगत में दिये अपने योगदान की सराहना की। उन्होनंे उम्मीद जताई की उनके पिता द्वारा चलाये जा रहे अखबार पूरा सच को रिलांच कर एक बार फिर से पुर्नजन्म होगा । इस अवसर पर कल्ब के अध्यक्ष जसवंत राणा ने अंशुल को कल्ब की मानद सदस्यता से भी सम्मानित किया ।
 पत्रकारों ने सुनाई 25 अगस्त की वह खोैफनाक दास्तां
अंशुल के सम्बोधन से पूर्व ईटीवी के भूपिन्दर जीस्टू, हिन्दुस्तान टाईम्स के रवि कुमार, द ट्रिब्यून के राजेन्द्र नगरकोटि, टाईम्स आफ इंडिया के बरिन्दर सलूजा, डीएनए की सष्टि चौधरी, न्यूज 18 के अंकुश महाजन, दैनिक ट्रिब्यून के आदित्य शर्मा और अमरनाथ वशिष्ट, दैनिक भास्कर के गिरिराज अग्रवाल, पंजाब केसरी के रमेश हांडा, जो कि 25 अगस्त को पंचकूला में यह पूरा घटनाक्रम कवर कर रहे थे, ने अपने कडवे अनुभवों को अन्य पत्रकारों से सांझा कर रहे थे । रमेश हांडा ने बताया कि कैसे उन्होंने इस घमासान के बीच एक तडप रहे बच्चे की जान बचाई । अन्यांे ने भी अपनी मानवता का परिचय दिया । सभी ने पुलिस की कार्यवाही के साथ साथ सरकार की कार्यप्रणाली की कडी भर्तसना की  । 
पंचकुला दंगों पर अधारित फोटो प्रदर्शनी  
इस अवसर पर एक फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया जो कि पूर्ण रूप से 25 अगस्त को पंचकुला दंगों पर अधारित थी। प्रेस कल्ब में आयोजित यह प्रदशर्नी रविवार तक खुली रहेगी । पहली फोटो का शीर्षक - ब्लैकआउट है जो कि 25 अगस्त की हिंसा का परिचायक है । यह फोटो दो फोटोजर्निलिस्टों बलिश अहुजा और संत अरोडा की असहाय भावनाओं को प्रकट करते हैं जिसमें उनके कैमरांे को निशाना बनाया गया जिससे की वह पूरी दुनिया को इन फोटो को ही न दिखा सके । कुछ छायाकारों ने पुलिस द्वारा प्रेसवालो की पिटाई का चित्रण किया तो किसी ने प्रदर्शनकारियों के आक्रोश को । यह फोटो प्रदर्शनी फोटोग्राफरों के आदम्य साहस का प्रतीक है जिन्होनंे विशम परिस्थितयों में भी अपनी डियूटी निभाई और पूरी दुनिया को इस दंगों के सच से रूबरू करवाया । 
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