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राष्ट्रीय

जनता की गाढ़ी कमाई पर सत्ताधारियों की खुली ऐश

August 05, 2018 05:18 PM

— रोशन लाल गोयल

भारत देश बहुत ही विचित्र चीज़ों के लिए जाना जाता है। यहाँ कुछ न कुछ ऐसा जरूर देखने को मिलता है जो विश्वभर में कहीं नहीं मिलता। यहां की एक बेहद खासियत है कि यहां नेता बनना बहुत ही सरल है। जनता की नब्ज पकड़नी आनी चाहिए। झूठ सलीके से बोलना आना चाहिए और हां सबसे खास बात शैक्षणिक योग्यता कुछ भी हो। अगर कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि यदि अनपढ हों तो भी नेता बन सकते है। बात घुमाफिरा कर न करते हुए अगर सीधे प्वाइंट पर आऊं तो राजनीति एक ऐसी चीज़ है जो सिर्फ नाम से बदनाम हो चुकी है। अगर सुविधाओं की तरफ नज़र घुमाई जाए तो राजनीतिज्ञों के दोनों हाथ तो क्या पैर भी घी में है और सर कढाई में। शायद यही खास बात है कि नेता इतने चिकने-चुपड़े भाषण देते है कि जनता की सिर्फ लार टपकती है हाथ उनके कुछ नहीं लगता, लेकिन जो दिन-रात मेहनत करके हाथ में आता है वो टैक्स के नाम पर की गई वसूली नेताओं की ऐश-परस्ती में जरूर चला जाता है।  

सत्ताधारियों की ऐश-आमदन में अगर कुछ कटौती की जाए तो जनता पर थोपे गए जायज/नाज़ायज़ टैक्स से देश के विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ेगी और सही मायनों में जनता का पैसा जनता के लिए खर्च होगा। तभी सही मायनों में लोकशाही का अर्थ सार्थक होगा।

सरकारी खाते में जमा हुई जनता की कमाई का कुछ फीसदी ही विकास कार्यों के लेखे में लगता है बाकी जितनी भी राशि बचती है नेताओं/राजनीतिज्ञों की ठाठ-बाठ को बरकरार रखने के लिए खर्च होता है। अगर एक बार विधायक, सांसद, प्रधानमंत्री, मंत्री, संसदीय या फिर राज्यपाल नियुक्त हो गए तो मरणासन्न तक सुविधाएं बरकरार रहती है। उन सुविधाओं को कोई नहीं छीन सकता। एक दिन का सांसद या मुख्यमंत्री भी आजीवन पेंशन और अन्य सुविधाओं के योग्य हो जाता है। अभी ताज़ा उदाहरण कर्नाटक में हुए चुनावों का देख लीजिए। बहुमत के जादुई आंकड़े को न छू पाने की वजह से उथल-पुथल मची और केवल 55 घंटे यानि ढाई दिनों के लिए मुख्यमत्री बने, (इससे पूर्व भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं) लेकिन उन सारी सुविधाओं को पाने के योग्य हो गए जो कार्यकाल पूरा होने होने बाद मिलती है।

पूर्व मुख्यमंत्रियों को पेंशन के अलावा कई अन्य ऐसी सुविधाएं मिलती है जिनसे वे अपना जीवन ठाठ-बाठ से जीते है। हालांकि अलग-अलग राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधाएं अलग हैं। बात अगर उत्तर प्रदेश की हो तो अगस्त 2016 के सुप्रीम कोर्ट के फैंसले के बाद वहां के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले की सुविधा को खत्म कर दिया। इससे पहले सत्ताधारियों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी सभी सुविधाओं से लैश कई एकड़ तक फैले सरकारी बंगले में आजीवन रहने का प्रावधान था। यह प्रावधान वर्ष 1986 में गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले दिवंगत वीपी सिंह के कार्यकाल में शुरू किया गया था। उसके बाद से लेकर वर्ष 2016 तक यह सरकारी बंगले बांटने की सुविधा बरकरार रही। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मंत्रियों का बंगला मोह ख़त्म नहीं हुआ। इसी वर्ष जून महीने में सरकारी बंगला खाली करने को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री काफी चर्चा में रहे। कोर्ट के आदेश अनुसार उन्होंने सरकारी बंगला खाली तो कर दिया लेकिन जितनी तोड़फोड़ और भारी नुक्सान उन्होंने बंगले में किया है, उसे देख कर साफ़ झलक रहा था कि उनकी मंशा जनता के पैसों पर ताउम्र ऐश लूटने की थी। टाइल्स, गार्डन, बाथरूम, एसी, बिजली के बोर्ड्स सब तोड़ दिए है। आगे समय में किसी अन्य सत्ताधारी के लिए उनकी मरम्मत करवाई जाएगी, लेकिन मरम्मत के लिए जो राशि खर्च होगी वो आम जनता की जेब से कटेगी। इसके अलावा यूपी के कई ऐसे सीएम रह चुके है जो सरकारी बंगले को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ चुके है, जिन्हें तुड़वाकर सरकारी खज़ाने से बंगले को महल में तब्दील कर दिया गया। कुछ पूर्व सीएम मुख्यमंत्री रह चुके है और वर्तमान में किसी अन्य राज्य में राज्यपाल की गद्दी पर आसीन है, उन्हें राज्यपाल होने के नाते सरकारी आवास दिया गया है और पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते अलग से सरकारी आवास की सुविधा है। इस तरह से जनता के सामने उन्हीं की कमाई की खूब लूट-खसोट चल रही है। 

अब अगर बात सांसदों की करें तो संसद सदस्यों के भी वारे न्यारे हैं। भत्ता और पेंशन अधिनियम 1954 के तहत एक पूर्व सांसद को हर महीने 20 हजार रुपए पेंशन मिलती है। 5 साल से अधिक होने पर हर साल के लिए 1500 रुपए अलग से दिए जाते हैं। पेंशन के लिए कोई न्यूनतम समय सीमा तय नहीं है। यानी कितने भी समय के लिए सांसद रहा व्यक्ति पेंशन का हकदार होगा। सांसदों और विधायकों को डबल पेंशन लेने का भी हक है। कहने का अर्थ यह कि कोई व्यक्ति पहले विधायक रहा हो और बाद में सांसद भी बना हो तो उसे दोनों की पेंशन मिलती है। सांसद या पूर्व सांसद की मृत्यु पर उनके पति, पत्नी या आश्रित को आजीवन आधी पेंशन दी जाती है। पूर्व सांसदों को किसी साथी के साथ ट्रेन में सेकेंड एसी में मुफ्त यात्रा की सुविधा है। अकेले यात्रा पर प्रथम श्रेणी एसी की सुविधा है। ये तो सारी सुविधाएं पद के बाद दी जाती है। अब अगर पदासीन रहते हुए थोड़ी नज़र घुमाएं तो सांसदों को 50 हजार रुपये हर महीने वेतन के रूप में मिलते हैं। (अब संसदीय समिति ने इसे बढ़ाकर लाखों रुपये करने की सिफारिश की है)

संसदीय क्षेत्र भत्ते, स्टेशनरी और पोस्टेज के लिए, सचिवालय सहायकों को भुगतान करने के लिए, कार्यालय भत्ता खर्च के लिए मोटी रकम मिलती है। संसद सत्र के दौरान संसद आने पर दैनिक भत्ता 2 हजार रुपये हर रोज मिलता है।  इसके अलावा घर में इस्तेमाल के लिए तीन टेलीफोन लाइन, हर लाइन पर सालाना 50,000 लोकल कॉल मुफ्त, घर में फर्नीचर के लिये, पत्नी या किसी और के साथ साल में 34 हवाई यात्राएं मुफ्त, रेल यात्रा के लिये फर्स्ट एसी का टिकट मुफ्त, घर में सालाना 40 लाख लीटर मुफ्त पानी, सालाना 50 हजार यूनिट बिजली मुफ़्त, सड़क यात्रा के लिये 16 रुपये प्रति किलोमीटर का किराया भत्ता, सांसद और उसके आश्रितों को किसी भी सरकारी अस्पताल में मुफ़्त इलाज की सुविधा, निजी अस्पतालों में इलाज पर भी वास्तविक खर्च का भुगतान सरकारी खजाने से, पॉश इलाके में फ्लैट या बंगला, वाहन के लिये ब्याज रहित लोन 4 लाख रुपये तक, कंप्यूटर खरीदने के लिये दो लाख रुपये सरकारी खजाने से, हर तीसरे महीने पर्दे और सोफा कवर धुलवाने का खर्च सरकारी खजाने से, सबसे अहम बात, सांसदों की यह आमदनी टैक्स के प्रावधानों से मुक्त है। यानी सांसदों को अपने वेतन और भत्तों पर टैक्स नहीं भरना पड़ता। जबकि देश पर मर मिटने वाले जवानों को मिले मेहनताने पर उसे पूरा 'कर' चुकाना पड़ता है।

कुछ समय से सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत सांसदों को गांव गोद लेने की प्रथा शुरू हुई। इस योजना के तहत गांव की मूलभूत सुविधाओं से लेकर पूर्ण रूप से विकास करना शामिल है। विकास के नाम पर गोद लिए क्षेत्र रो रहे है लेकिन सांसदों की आवभगत और सुविधाओं में कोई कमी नहीं है। समय-समय पर सुविधाएं उनके दरवाजे पर दस्तक देती है और मंत्री जी खिलखिला कर जनता पर रौब झाड़ते है। तरह-तरह के टैक्स के रूप में जनता के गाढ़े खून-पसीने की कमाई से सत्ता में आते है। उन्हीं से इतनी उच्च कोटि की सुविधाएं और करकरा वेतन और सत्ता के बाद पेंशन, भत्ते और अन्य सुविधाओं से लैस जीवन जीते है। इसके उपरांत जनता की समस्याएं टस से मस नहीं खिसकती। अपने क्षेत्र के विकास के लिए इनके आगे इस तरह जनता हाथ फैलाती है जैसे जनता ने उन्हें विकास करवाने को लेकर नहीं चुना बल्कि हाथ फैलाकर, गिड़गिड़ाकर, रोज-रोज दफ्तरों के चक्कर काटने के लिए चुना है।

ब्रिटेन व अमेरिका जैसे देशों में पूर्व प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को सरकारी आवास देने का कोई प्रावधान नहीं है। ब्रिटेन में तो हाउस ऑफ कामंस में सभी सांसदों के लिए बैठने तक की भी व्यवस्था नहीं है। उसकी क्षमता 650 विधायकों की है जबकि बैठने के लिए सिर्फ 437 लोगों की व्यवस्था है। आवास तो दूर की बात वहां पहले आओ पहले पाओ के आधार पर सदन में बैठने का मौका बनता हैं। मगर भारत तो अजब-गजब चीज़ों के लिए जाना जाता है। सत्ताधारियों ने लोकशाही, लोकतंत्र जैसे शब्दों का मतलब ही बदल कर रख दिया है। अपने आप को जनता का सेवक बताते है लेकिन स्वयं की सेवा में रत्ती भर फर्क बर्दाश्त नहीं करते। देशभर में कितनी ही सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं है जिनमें सेवा करने वाले बिना किसी वेतन के नि:स्वार्थ सेवा में जुटे हैं। सत्ताधारियों की ऐश-आमदन में अगर कुछ कटौती की जाए तो जनता पर थोपे गए जायज/नाज़ायज़ टैक्स से देश के विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ेगी और सही मायनों में जनता का पैसा जनता के लिए खर्च होगा। तभी सही मायनों में लोकशाही का अर्थ सार्थक होगा।  

Roshan Lal Goyal

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