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संपादकीय

अर्थ तेरे कितने अर्थ

March 22, 2016 08:57 PM

— आर एल गोयल

शब्द—शब्द के अर्थ हैं
अर्थ—अर्थ के भेद
अर्थ—अर्थ की बात है पगले
अर्थ—अर्थ की गज़लें समझ सके तो
समझ ले प्यारे न समझो तो हारे
एक अर्थ तो पावन माटी
दूजा अंग है भाषा का
तीजा है धन सम्पदा
चौथा तो वो है जो देता उर्जा को सहारा
अजब चक्रव्यूह है अर्थ का
किसका पलड़ा भारी है और किससे मिले किनारा
कर लो अगर विश्लेषण तो
परिभाषा में छुपे है अर्थ अनेक
जो न होने देते बंटवारा
अर्थ की परख कर सके तो कर ले पगले
जीवन का भी है एक अर्थ
आसमां की ओर से
जमीं के छोर तक
शब्दों की है माला
मूक का भी अर्थ शोर भी नहीं व्यर्थ
तर्क से जुड़ा है वितर्क
समझ सको तो प्यारे समझ ले फर्क
अर्थ है तो शब्द है और
शब्द नही तो अर्थ व्यर्थ


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