ENGLISH HINDI Wednesday, August 22, 2018
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संपादकीय
कानून की आड़ में अपराध आखिर कब तक?

कानून के रखवालों में से कुछ गद्दारों द्वारा जुर्म करने वालों को शह देना। पद, प्रतिष्ठा पाने तथा तिजोरियां भरने के लिए आड़े आने वाले रोड़े को हटाने के लिए जुर्म करना आम बात हो गई है।

जनता की गाढ़ी कमाई पर सत्ताधारियों की खुली ऐश

सांसदों को अपने वेतन और भत्तों पर टैक्स नहीं भरना पड़ता। जबकि देश पर मर मिटने वाले जवानों को मिले मेहनताने पर उसे पूरा 'कर' चुकाना पड़ता है।

कल्पेश याज्ञनिकः एक और बलि

समकालीन मीडिया में पत्रकारिता बस ब्राडिंग मात्र रह गई है। समाचार पत्रों की ब्राडिंग ही पत्रकारिता के मानदंड तय करती है। और बेचारा पत्रकार इस ब्राडिंग के चक्कर में पिस रहा है। भास्कर में टॉप मैनेजमेंट का सीधा फंडा हैः अखबार को हर जगह (प्रकाशन केन्द्र) और हर हाल में नंबर बनना है। और जो कोई भी इसमें पिछड गया, वह ग्रुप में भी पिछड गया। 

1 मई अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष : अब उन की ख़्वाब-गाहों में कोई आवाज़ मत करना, बहुत थक-हार कर फ़ुटपाथ पर मज़दूर सोए हैं

यह कहावत उन मजदूरों पर सटीक बैठती है जो दिन भर मेहनत मजदूरी करने के बाद रात की चांदनी में फुटपाथ को अपना बिस्तर समझकर दो पल आराम के लिए बिताते हैं। न कल की फिक्र न आज का सपना, न कोई समय सीमा का बंधन, बस दो वक्त की रोटी के लिए सिर पर गठरी उठाए बढ़ते जाते हैं कदम। अपनी सारी इच्छाओं को एक कोने में दबाकर आंखों को बंद करके सपने देखने से भी मना करती है।

नासमझी व उतावनेपन के चलते सोना पाने से वचिंत है किसान

किसान न केवल हाड—तोड़ मेहनत करता है बल्कि उसके पास वे सभी साधन भी पहले से मौजूद है जो उसके आस—पास बिखरे घटकों को सोने में बदल सकते हैं।

अहसास रखना यह तो वित्तीय आपातकाल है? दीवाली छूती है जीवन के हर पहलू को कीचड़ में कमल बने रहने की दरकार अधिकारियों की फौज — करने गई थी मौज सत्ता में दागी मंत्रियों का बोलबाला देश में बेखौफ क्यों हैं तस्कर? दर्द बढ़ता गया— ज्यों ज्यों दवा की जीएसटी बिल— फायदा किसको अर्थ न पकड़ा व्यर्थ में उलझे अन्नदाता कर्जदार क्यों? चुनाव 2017: पंजाब की हाईटेक जनता खड़ी कर सकती है त्रिशंकु विधानसभा हम कितने जागरूक हैं? अर्थ तेरे कितने अर्थ क्या हरियाणा सरकार बादल से सबक लेगी पंतजलि द्वारा कैंसर का भय दिखाना क्या नैतिक है? क्या कानून सम्मत है? भारत का संविधान रो रहा है! क्या हमें संविधान का विलाप सुनाई नहीं देता? लालू के लाल क्या कर पाएंगे बिहार में कमाल ? बस्तर में वकीलों, पत्रकारों पर लगातार हमले का विरोध कच्चे सूत से बँधी पक्की डोर है रक्षाबन्धन …तो क्या आमजन का उपभोक्ता अधिकार "जानने का हक़" दफ़न कर दिया जाएगा? जयं​ती पर विशेष: महान स्वतंत्रता सेनानी एवं गांधीवादी नेता बाबू मूलचन्द जैन मिलावट का भूत, नीतियों की नहीं नीयत की जरूरत अरविन्द बाबू दिल्ली का सिंहासन कोई फूलों की सेज नहीं काँटों भारा ताज है ... हम कितने सचेत? जितना खाली होते जाओगे, उतना आनन्द से भरते जाओगे भारतीय संविधान-कमजोर लोगों के शोषण का एक साधन भारतीय संविधान–आम जनता के साथ एक सुनियोजित और संगठित धोखाधड़ी जनता की कीमत पर उद्योगपतियों को फायदा! उपभोक्ता अदालत की दोहरी मानसिकता पहुँचा रही है उपभोक्ता के हितों को नुकसान