ENGLISH HINDI Saturday, September 23, 2017
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संपादकीय
कीचड़ में कमल बने रहने की दरकार

अच्छा संकेत ही दे रहे हैं। मसलन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का होना, केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी का पूर्ण बहुमत में होना, दिल्ली के राज्यपाल का केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि होना व दिल्ली पुलिस का उपराज्यपाल के अधीन होना। यानि अरविंद केजरीवाल के लिए इन परिस्थितियों में काम करना बेशक कठिन है किन्तु देश के लिए ये संकेत अच्छे ही हैं। यदि ऐसा न होता तो शायद केजरीवाल भी निरंकुश शासक बन जाते।

अधिकारियों की फौज — करने गई थी मौज

नरसिंह के खाने में कोई मिलावट कर गया मगर किसी को कुछ पता नहीं चला। किसी के मन में पदक लाने का निशाना होता तभी तो सारी चीजों पर पैनी निगाह रखी जाती। नाडा के तर्क वाडा ने स्वीकार कर भी लिए किन्तु सबूत तो तभी जुटाते अगर इस तरफ ध्यान केन्द्रित करते। आखिर हमारे प्रतिभावन खिलाड़ी को डोपिंग का कलंक सहते हुए न सिर्फ वापिस लौटना पड़ा बल्कि चार वर्ष का प्रतिबंध भी लग गया।

सत्ता में दागी मंत्रियों का बोलबाला

सवाल उठता है कि जब किसी राज्य के 91 फीसदी या 89 फीसदी मंत्रियों पर केस चल रहे हो तो क्या वे लोगों पर शासन करने के योग्य माने जाने चाहिए। जो खुद ही साफ सुथरा नहीं है वो भला लोगों की समस्याओं को क्या समझ पाएगा।

देश में बेखौफ क्यों हैं तस्कर?

सरकार व पुलिस के आला अधिकारी हालांकि इसका कारण पंजाब की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के साथ होना कहते हैं जबकि सच्चाई यह है कि नशे व हथियारों के तस्करों को कई पुलिस अधिकारियों व राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त होने से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

दर्द बढ़ता गया— ज्यों ज्यों दवा की

एनसीईआरटी के नैशनल अचीवमैंट सर्वे के मुताबिक पांचवीं कक्षा तक के 60 फीसदी छात्र तो यह भी नहीं बता पाए कि तीन अंकों से बनी सबसे बड़ी संख्या क्या होगी। इसी तरह 35 फीसदी छात्रों को चतुर्भुज की भी जानकारी नहीं थी। मजेदार तथ्य यह कि इस समय देश में 7.90 लाख प्राइमरी स्कूल है जिनमें कुल 13 लाख छात्र पढ़ते हैं यानि औसतन एक स्कूल में दो छात्र भी नहीं हैं। 

जीएसटी बिल— फायदा किसको

संसद में डेढ दशक से अधिक समय तक गोते खाने के बाद राज्यसभा में यह बिल सात घंटे की बहस के बाद पास हो गया। याद रहे कि लोकसभा ने यह पिछले वर्ष भी पारित कर दिया था किन्तु राज्यसभा में पारित न हो पाने के कारण अधर में लटका था, न डूब रहा था और न तैर रहा था बस गोते खा रहा था

अर्थ न पकड़ा व्यर्थ में उलझे

क्या बताने का प्रयत्न किया और हम क्या समझते चले गए/चले जा रहे हैं। जो उद्देश्य, जो संदेश वे देना चाहते रहे उन्हें पकड़ने की बजाए हम उपदेश देने वालों को ही पकड़ते चले गए। या ये सब कुछ हमारे तथाकथित बाबाओं, पंडितो—पुरोहितों द्वारा हमें समझा दिया गया, पकड़ा दिया गया।

दर्द बढ़ता गया— ज्यों ज्यों दवा की जीएसटी बिल— फायदा किसको अर्थ न पकड़ा व्यर्थ में उलझे अन्नदाता कर्जदार क्यों? चुनाव 2017: पंजाब की हाईटेक जनता खड़ी कर सकती है त्रिशंकु विधानसभा हम कितने जागरूक हैं? अर्थ तेरे कितने अर्थ क्या हरियाणा सरकार बादल से सबक लेगी पंतजलि द्वारा कैंसर का भय दिखाना क्या नैतिक है? क्या कानून सम्मत है? भारत का संविधान रो रहा है! क्या हमें संविधान का विलाप सुनाई नहीं देता? लालू के लाल क्या कर पाएंगे बिहार में कमाल ? बस्तर में वकीलों, पत्रकारों पर लगातार हमले का विरोध कच्चे सूत से बँधी पक्की डोर है रक्षाबन्धन …तो क्या आमजन का उपभोक्ता अधिकार "जानने का हक़" दफ़न कर दिया जाएगा? जयं​ती पर विशेष: महान स्वतंत्रता सेनानी एवं गांधीवादी नेता बाबू मूलचन्द जैन मिलावट का भूत, नीतियों की नहीं नीयत की जरूरत अरविन्द बाबू दिल्ली का सिंहासन कोई फूलों की सेज नहीं काँटों भारा ताज है ... हम कितने सचेत? जितना खाली होते जाओगे, उतना आनन्द से भरते जाओगे भारतीय संविधान-कमजोर लोगों के शोषण का एक साधन भारतीय संविधान–आम जनता के साथ एक सुनियोजित और संगठित धोखाधड़ी जनता की कीमत पर उद्योगपतियों को फायदा! उपभोक्ता अदालत की दोहरी मानसिकता पहुँचा रही है उपभोक्ता के हितों को नुकसान हवाई जहाज में उड़ने और डिज़ाइनर कपड़ों के लिए लोग पहले रिक्शे में चलते हैं भले लोग राजनीति में आ गए तो ये सब राजनेता हो जायेंगे बेरोजगार 1 प्रतिशत परिवर्तन प्रतिवर्ष किया जाता तो व्यवस्था में 67 वर्ष में 67 फीसदी आ सकता था परिवर्तन भारतीय राजनीति सेवा नहीं अपितु मेवा प्रति का अच्छा साधन आमजन की समझ से परे है भारतीय न्याय प्रणाली की भूल भूलैया गिरफ्तारी और जमानत – एक दुधारू गाय न "सूचना का अधिकार", न "सूचित होने का अधिकार", फिर आमजन को कैसे मिलेगी सूचना?