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संपादकीय

सत्ता में दागी मंत्रियों का बोलबाला

August 28, 2016 11:54 AM

संतोष गुप्ता (एफपीएन)  

देश में नैतिक मुल्यों का पतन इतनी तेजी से हुआ कि लोग यहां अंग्रेजों से मिली आजादी का आनंद ही नहीं उठा पाए। वोट का अधिकार तो उन्हें बेशक मिल गया किन्तु विकल्प के तौर पर उनके पास एक अन्धा, एक लंगड़ा, एक गूंगा जैसे ही रहे।


धन और बाहुबल ने आज राजनीति को अपराध की श्रेणी में ला खड़ा किया है। हैरत की बात है कि देश के आठ राज्यों के 50 फीसदी से ज्यादा मंत्री दागी हैं। मोदी सरकार के लिए हालांकि राहत की बात यह है कि दागी मंत्रियों के मामले में गैर भाजपा शासित राज्य सरकारें काफी आगे है। किन्तु झारखण्ड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वहां दागी मंत्रियों का प्रतिशत 91 फीसदी है। वहां के कुल 11 मंत्रियों में से 10 मंत्री दागी हैं। एसोसिएशन फॉर डैमोक्रेटिक रिफोम्र्स एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक झारखण्ड के 9 मंत्रियों के खिलाफ गंभीर अपराधिक मामले हैं। इधर पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य सबसे पहले हासिल करने वाला राज्य भी पीछे नहीं। वहां दागी मंत्रियों का प्रतिशत 89 फीसदी है यानि वहां के कुल 19 मंत्रियों में से 17 मंत्री दागियों की श्रेणी में आते हैं। नवनिर्मित राज्य तेलगाना के 71 फीसदी मंत्री दागी पाए गए हैं। बिहार के कुल 28 मंत्रियों में से 19 और महाराष्ट्र के 39 में से 25 ने अपने शपथपत्र में माना कि उन पर केस चल रहा है। दिल्ली में नई बनी आम आदमी पार्टी भी इस मामले में पीछे नहीं रही। दिल्ली में दागी मंत्रियों का प्रतिशत 57 है यानि उसके सात में से चार मंत्रियों पर केस चल रहे हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के 50 फीसदी और आंध्रा प्रदेश के 50 फीसदी मंत्री दागी हैं। कर्नाटक के 39 फीसदी, गोवा के 33 फीसदी मंत्री दागियों की श्रेणी में आते हैं। इसी तरह 30 फीसदी ओडिशा के 27 और तमिलनाडू के 27 फीसदी मंत्री दागी है। पंजाब में अहपराधिक रिकार्ड वाले 22 फीसदी और हरियाणा में 18 फीसदी है। जम्मू—कश्मीर में से आंकड़ा 9.9 फीसदी और छत्तीसगढ़ में आठ फीसदी है। पूर्वोतर के सात राज्यों में एक भी मंत्री दागी नहीं।
एडीआर और नैशनल इलैक्शन वॉच ने ये आंकड़े मंत्रियों के अपने विधानसभा चुनाव के वक्त दिए गए हलफनामें के आधार तैयार की है, किन्तु सवाल उठता है कि जब किसी राज्य के 91 फीसदी या 89 फीसदी मंत्रियों पर केस चल रहे हो तो क्या वे लोगों पर शासन करने के योग्य माने जाने चाहिए। जो खुद ही साफ सुथरा नहीं है वो भला लोगों की समस्याओं को क्या समझ पाएगा। हमारे देश में दरअसल नैतिक मुल्यों का पतन इतनी तेजी से हुआ है कि लोग यहां अंग्रेजों से मिली आजादी का आनंद ही नहीं उठा पाए। वोट का अधिकार तो उन्हें बेशक मिल गया किन्तु विकल्प के तौर पर उनके पास एक अन्धा, एक लंगड़ा, एक गूंगा जैसे ही रहे। अपराधी किस्म के लोगों ने राजनीति को इतना गंदा कर दिया कि अन्ना हजारे जैसे लोग भी इसे दूर रह कर ही साफ करना चाहते हैं। अरविंद केजरीवाल ने इसमें घुसकर सफाई करने की ठानी तो दूसरे लोगों ने उसे भी अपने जैसा बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उनकी अपनी छवि हालांकि अभी दागदार नहीं किन्तु उनका बड़बोलापन अक्सर उनके लिए घातक सिद्ध हा रहा है।
आज जरूरत इस बात की है कि साफ— सुथरी नीयत वाले लोगों को आगे लाया जाए ताकि सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश का आम आदमी भी पेट भर कर खाए और चैन की नींद ले पाए।

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