Monday, 31 August 2026
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असम और मणिपुर में NRC का मुद्दा फिर गरमाया

नव ठाकुरीया

पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुछ दिलचस्प घटनाक्रम हो रहे हैं। मणिपुर में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC, 1951) को अपडेट करने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने NRC, जिसे असम में अपडेट तो किया गया, लेकिन अभी तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) ने मंजूरी नहीं दी है, की समीक्षा के लिए एक याचिका स्वीकार की है। इसके अलावा, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने असम में मई 2014 से अक्टूबर 2019 के दौरान हुई NRC अपडेट प्रक्रिया में वित्तीय गड़बड़ी के मामले में केस दर्ज किया है।

इन सबके बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 26 अगस्त 2026 को अवैध प्रवासियों से सख्ती से निपटने के लिए केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। नई दिल्ली में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए—जिसमें सुरक्षा एजेंसियों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे—शाह ने घोषणा की कि अवैध रूप से घुसने वालों से संबंधित कानून के तहत निपटा जाएगा। दरअसल, ऐसी अटकलें हैं कि सरकार जल्द ही पूरे भारत में अनधिकृत लोगों की पहचान के लिए देशव्यापी स्क्रीनिंग शुरू कर सकती है।

इस बीच, मई 2023 से बार-बार हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर में जनगणना-2027 से पहले NRC को अपडेट करने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर जन-प्रदर्शन हुए हैं। बहुसंख्यक मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जारी झड़पों में 250 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग विस्थापित हुए। मणिपुर में घर-घर जाकर डिजिटल सर्वे 1 सितंबर से शुरू होने वाला है, लेकिन राज्य के निवासियों का एक बड़ा वर्ग इससे पहले NRC को अपडेट करने के लिए आंदोलन कर रहा है। उनका तर्क है कि जनगणना के आंकड़ों की मदद से कई अवैध प्रवासी, खासकर म्यांमार के लोग, नागरिकता सूची में अपना नाम दर्ज करा लेंगे।

‘कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डेलिमिटेशन’ (JFD) के नेतृत्व में और मणिपुर के नागरिक समाज संगठनों, महिला तथा छात्र-युवा निकायों के समर्थन से चल रहा NRC समर्थक आंदोलन इम्फाल घाटी, जहां हिंदू मैतेई लोगों का वर्चस्व है, से आगे फैल गया है। कुकी-ज़ो लोगों के विपरीत, नागा समूहों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने भी NRC का समर्थन किया है और राज्य विधानसभा ने 2022 में जनगणना से पहले NRC के पक्ष में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था। खेमचंद से पहले मुख्यमंत्री रहे और भारतीय जनता पार्टी के नेता बीरेन सिंह ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में गृह मंत्री शाह को जनगणना गतिविधियों से पहले मणिपुर में NRC के महत्व के बारे में जानकारी दी थी।

लेकिन असम में NRC को अपडेट करने की प्रक्रिया में अनावश्यक अफरातफरी और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई और असम के एक जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी ने इसके पूरी तरह से दोबारा सत्यापन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। असम NRC के पूर्व समन्वयक हितेश देवशर्मा अब ड्राफ्ट और सप्लीमेंट्री NRC के व्यापक और समयबद्ध सत्यापन की मांग कर रहे हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में तैयार किया गया था। देवशर्मा ने व्यक्तिगत तौर पर, और साथ ही असम के मूल निवासियों के एक बड़े वर्ग की ओर से, सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार, NRC राज्य समन्वयक और RGI को नोटिस जारी किए।  उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया गलतियों और अनियमितताओं से भरी थी और इससे देश की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।

बता दें कि असम के लिए NRC का एक ड्राफ्ट 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित किया गया था और बाद में 31 अगस्त 2019 को एक सप्लीमेंट्री सूची जारी की गई थी। इस सूची में 19 लाख से अधिक आवेदक छूट गए थे, जिन्होंने या तो आवेदन नहीं किया था या फिर नकली दस्तावेज जमा किए थे। हैरानी की बात है कि NRC असम के तत्कालीन समन्वयक प्रतीक हजेला ने इसे अंतिम सूची बताकर प्रचारित किया, जबकि ऐसा करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। अब देवशर्मा ने चिंता जताई है कि कई अवैध प्रवासियों यानी बांग्लादेशी मुसलमानों को NRC सूची में शामिल किया गया था। इसके लिए हेरफेर वाले सॉफ्टवेयर और कुछ कर्मचारियों, जिनमें उनके पूर्ववर्ती हजेला भी शामिल थे, की व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की भूमिका थी। हजेला अब असम प्रशासन से VRS सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

देवशर्मा ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि कामरूप जिले में कई लोगों को ‘मूल निवासी’ (OI यानी वे भारत के स्वाभाविक नागरिक हैं और उन्हें कोई दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं है) बताया गया था, जबकि वे सभी बांग्लादेश से आए प्रवासी थे। देवशर्मा ने यह चिंता भी जताई कि कई लोग ‘फैमिली ट्री मैचिंग’ मानदंड को पूरा नहीं कर पाए, फिर भी उनके नाम पिछली NRC सूची में शामिल कर लिए गए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई गंभीर गलतियों और चूक के बाद इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। इसलिए उन्होंने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।

हैरानी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की गई है, जिसमें उन लोगों को नागरिकता प्रमाण-पत्र जारी करने की अपील की गई है, जिनके नाम NRC सूची में शामिल थे। याचिकाकर्ताओं—जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन—ने शायद इसे अंतिम आधिकारिक दस्तावेज मान लिया है। अब उम्मीद है कि सितंबर के अंत तक अदालत में इन दोनों मामलों की सुनवाई होगी।

ED के शामिल होने से NRC को अपडेट करने की प्रक्रिया—जिस पर केंद्र सरकार ने करीब 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए थे—और भी उलझ गई है। कम से कम 260 करोड़ रुपये के गलत इस्तेमाल का मामला सामने आया है, जैसा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने बताया है। 31 मार्च 2020 को समाप्त हुए वर्ष के लिए सामाजिक, आर्थिक और सामान्य क्षेत्रों पर CAG की रिपोर्ट में NRC अपडेट करने के दौरान हुई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर विप्रो लिमिटेड के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की भी सिफारिश की गई थी।

असम के लोगों को NRC पर लिखी गई एक किताब याद हो सकती है, जिसे असम के ही एक टेलीविजन पत्रकार ने लिखा था। इसमें हजेला की बेहतरीन कार्य के लिए जमकर तारीफ की गई थी। सोशल मीडिया पर उसका नाम लेकर उन्हें NRC घोटाले से फायदा उठाने वाला बताया गया। वह टॉक शो होस्ट हजेला की बात को ही दोहराता रहा कि यह फाइनल NRC है और असम के लोगों को इसे बिना किसी और जांच-पड़ताल के स्वीकार कर लेना चाहिए। पता नहीं ऐसा कहने से उसे क्या फायदा हुआ, लेकिन असमिया समुदाय को इससे नुकसान होने की पूरी संभावना है। भगवान उसे सद्बुद्धि दे! (लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)