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कविताएँ
किसी को मुझे आज़माना नहीं है
ग़ज़ल किसी को मुझे आज़माना नहीं है किसी दर पे सर को झुकाना नहीं है मिले हूर कोई या हो…
ग़ज़ल किसी को मुझे आज़माना नहीं है किसी दर पे सर को झुकाना नहीं है मिले हूर कोई या हो…