Tuesday, 15 September 2026
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राह की माटी पे कदमों के निशां बनते रहे

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                 ग़ज़ल
 
राह की माटी पे कदमों के निशां बनते रहे 
मैं अकेला ही चला पर कारवां बनते रहे
 
वास्ता मेरा रहा इन फूल कलियों से सदा
मैं जिधर से भी गया बस गुलिस्तां बनते रहे
 
जो लिखे मैने सुनाने के लिए संसार को
गीत वो मेरे, ग़रीबों की जुबां बनते रहे
 
पा लिया हर इक मुकां राहें सभी हमवार कीं 
मरहले मेरे लिए इक इम्तिहां बनते रहे
 
ज़लज़लों के बीच भी मैने बनाए घर कई
उन घरों के ज़लज़ले खुद पासवां बनते रहे
 
— मनमोहन सिंह 'दानिश'