मनमोहन सिंह ‘दानिश’
इन सवाल पूछने वालों की कई प्रजातियां हैं। उनमें से एक प्रजाति पत्रकारों के नाम से जानी जाती है। पर यह बहुत तेजी से विलुप्त होती जा रही है। इनकी जगह सरकारी लोकसंपर्क विभाग के लोग पत्रकारों के मुखौटे पहन कर पत्रकार कहलाने लगे हैं। इनकी पहचान यह है कि वे बेचारे सत्तापक्ष की जगह विपक्ष से सवाल पूछते हैं, झूठ फैलाते हैं, गलत आंकड़े पेश करते हैं और दुनिया को गुमराह करने में व्यस्त पाए जाते हैं। उन्हें गालियाँ निकालने और सुनने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।
काफी मोटी चमड़ी होती है इनकी। फिर सवाल पूछने का काम होता है विपक्ष का वे लोग बेरोज़गारी, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, छात्रों की आत्महत्यां जैसे मुद्दों पर सवाल करते रहते हैं। लेकिन सबसे खतरनाक होते हैं वे लोग जो दुनिया भर की किताबें पढ़ते हैं, दुनिया की अर्थव्यवस्था और सामाजिक तने बाने को समझते हैं, वे मजहबी जनून के विरोधी होते हैं, वे आर्थिक व्यवस्था को बदलने की सोच रखते हैं। यही सबसे खतरनाक बात है। इन्हें नक्सली कहा जाता है। पहले ये हथियार भी उठाते थे। तब इन्हें मारना आसान था। पर अब इनमें एक और प्रजाति पैदा हो गई है जो बहुत खतरनाक है।
उस प्रजाति में डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, अध्यापक, साहित्यकार, फिल्मकार, लेखक, शायर, कवि सभी शामिल हैं ये सब “दिमागी नक्सल” हैं। मौजूदा राजतंत्र और व्यवस्था के लिए सबसे खरनाक हैं “दिमागी नक्सल”। ” दिमागी नक्सलपन” एक भयानक छूत की बीमारी है जो हर उस व्यक्ति को लग सकती है जो किताबें पढ़ता है, स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाता है। अब सरकार ने इस बीमारी की रोक थाम के लिए कई उपाय किए हैं। देश के एक लाख से अधिक स्कूल बंद कर दिए। युवाओं को धर्म की तरफ मोड़ने के लिए रामरहीम जैसे बाबाओं को जेल से बार बार पैरोल दी है। दूसरे बाबा बापू आसाराम को जेल में मिलने वाली सुविधाओं में बढ़ोतरी की है। जंतर मंतर पर “जेन जी” के विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए सरकार ने पुलिस के अलावा काई शरीफ खूनी, बलतकारी, जो सजा कट रहे हैं, उनकी सेवाएं भी ली हैं। हो सकता है इन सेवाओं के बदले इन बेचारों की बाकी सज़ा माफ कर दी जाए। ऐसा पहले भी हुआ है जब कुछ बलातकारी सज़ा पूरी होने से पहले ही छोड़ दिए गए थे। और फिर एक राष्ट्रीय पार्टी के जांबाज कार्यकर्ताओं ने फूल मालाओं से उनका स्वागत किया और कंधों पर उठा कर उन्हें सभा स्थल तक लगाए।
बलात्कारी, हत्यारे, डाकू, चोर, सभी को जमानत, और पैरोल मिल रही है पर “दिमागी नक्सल” जो एक बार बंद हो गया उसे बिना मुकद्दमा चलाए बरसों तक सलाखों के पीछे रखा जा रहा है। सरकार की मजबूरी है, क्या करे, ये “दिमागी नक्सल” बाहर रहे तो पूरे समाज में लोगों को सरकार से सवाल करना सीखते फिरेंगे। अब बेचारी सरकार काम करे या सवालों के जवाब देती फिरे? हां! एक खतरा ज़रूर है कि अगर “दिमागी नक्सलों” ने बाकी कैदियों, और जेल के स्टाफ में यह बीमारी फैला दी तो क्या होगा?
देखो जी देश हित में कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। इसलिए कई दिमागी नक्सल तो मरवाने भी पड़े। पत्रकार गौरी लंकेश इसकी ज़िंदा मिसाल है । पर अभी काम अधूरा है। वैज्ञानिकों, पत्रकारों, साहित्यकारों, डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, शिक्षकों, इतिहासकारों, और कई राज नेताओं में भी यह बीमारी फैल चुकी है । इनका ईलाज भी कुछ जाहिलों से पूछ कर करना पड़ेगा। नहीं तो आने वाले समय में सरकार के आकाओं के धंधे खतरे में पड़ सकते हैं। अब कब तक सरकार 26000 करोड़ की देनदारी को छह करोड़ में एडजेस्ट करती फिरेगी।
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