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आओ चलें प्रयाग , नहा लें कुंभ

January 07, 2019 05:11 PM

मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, चंडीगढ़.

कुम्भ पर्व विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजन है। सागर मंथन से जब अमृत कलश प्राप्त हुआ तब अमृत घट को लेकर देवताओं और असुरों में खींचा तानी शुरू हो गयी। ऐसे में अमृत कलश से छलक कर अमृत की बूंद जहां पर गिरी वहां पर कुंभ का आयोजन किया गया। भारत में अलग – अलग धर्म होने के कारण संस्कृतिक विविधता भी देखने को मिलती है। जिस कारण भारत में पूरा साल किसी त्योहार की तरह बीतता है क्योंकि लगभग हर महीने कोई ना कोई त्योहार आ ही जाता है जो लोगों को खुश होने और मेल मिलाप करने का मौका दे देता है। हालांकि इन त्योंहारों की आस्था की दृष्टि से भी काफी एहमियत होती है।

वैसे तो लगभग सभी त्योहार हर साल आते है लेकिन कुछ त्योहार या आस्था की दृष्टि से खास दिन सिर्फ कुछ सालों मे सिर्फ एक बार ही आते है। जिनमें से एक कुंभ का मेला भी है हिंदुओं संस्कृति में कुंभ का मेला खास महत्व रखता है। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 

कुंभ का मेला 12 साल में सिर्फ एक बार ही लगता है।

कुम्भ मेला 2019 का आयोजन प्रयागराज में किया जा रहा है, जो जनवरी 15 से मार्च 04 तक चलेगा। प्रयागराज में 'कुम्भ' कानों में पड़ते ही गंगा, यमुना एवं सरस्वती का पावन सुरम्य त्रिवेणी संगम मानसिक पटल पर चमक उठता है। पवित्र संगम स्थल पर विशाल जन सैलाब हिलोरे लेने लगता है और हृदय भक्ति-भाव से विहवल हो उठता है। श्री अखाड़ों के शाही स्नान से लेकर सन्त पंडालों में धार्मिक मंत्रोच्चार, ऋषियों द्वारा सत्य, ज्ञान एवं तत्वमिमांसा के उद्गार, मुग्धकारी संगीत, नादो का समवेत अनहद नाद, संगम में डुबकी से आप्लावित हृदय एवं अनेक देवस्थानो के दिव्य दर्शन प्रयागराज कुम्भ की महिमा भक्तों को निदर्शन कराते हैं।

कुंभ मेले के मौके पर प्रयागराज में तैयारियां जोरो पर चल रही हैं। गंगा-यमुना की संगम नगरी को सजाया जा रहा है और आयोजन से पहले यहां का रंग रूप बिल्कुल बदल चुका है। जगहों को तरह-तरह की पेंटिगों से सजाया गया है और संगम नगरी आकर्षण का केंद्र बन गई है। सड़कें और अन्य निर्माण कार्य तेजी से किए गए हैं। कुंभ 2019 के लिए कई विदेशी प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। कुंभ स्थअल पर तंजानिया, अमेरिका,उजबेकिस्तान, त्रिनिडाड, टोबैगो, ट्यूनीशिया और वेनेजुएला के झंडे लगाए गए हैं।

प्रयागराज का कुम्भ मेला अन्य स्थानों के कुम्भ की तुलना में बहुत से कारणों से काफी अलग है। सर्वप्रथम दीर्घावधिक कल्पवास की परंपरा केवल प्रयाग में है। दूसरे कतिपय शास्त्रों में त्रिवेणी संगम को पृथ्वी का केन्द्र माना गया है, तीसरे भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि-सृजन के लिए यज्ञ किया था, चौथे प्रयागराज को तीर्थों का तीर्थ कहा गया है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण है यहाँ किये गये धार्मिक क्रियाकलापों एवं तपस्यचर्या का प्रतिफल अन्य तीर्थ स्थलों से अधिक माना जाना। मत्स्य पुराण में महर्षि मारकण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह स्थान समस्त देवताओं द्वारा विशेषतः रक्षित है, यहाँ एक मास तक प्रवास करने, पूर्ण परहेज रखने,अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण करने से और अपने देवताओं व पितरों को तर्पण करने से समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

प्रयागराज का कुम्भ मेला लगभग 50 दिनों तक संगम क्षेत्र के आस-पास हजारों हेक्टेअर भूमि पर चलने के चलते विश्व के विशालतम अस्थायी शहर का रूप ले लेता है। समस्त क्रियाकलाप, सारी व्यवस्थायें स्वतः ही चलने लगती हैं। आदिकाल से चली आ रही इस आयोजन की एकरूपता अपने आप में ही अद्वितीय है। लगातार बढ़ती हुई जनांकिकीय दबाव और तेजी से फैलते शहर जब नदियों को निगल लेने को आतुर दिखायी देते हैं ऐसे में कुम्भ जैसे उत्सव नदियों को जगत जननी होने का गौरव देते प्रतीत होते हैं। सनातन काल से भारतीय जनमानस के रगो में बसी, उनके रक्त में प्रवाहित होती अगाध श्रद्धा एवं आस्था ही अमृत है। उनका अमर विश्वास ही प्रलय में अविनाशी "अक्षयवट" है, ज्ञान, वैराग्य एवं रीतियों का मिल ही संगम है और आधार धर्म प्रयाग है।

प्रयागराज मेला प्राधिकरण के गठन से कुम्भ 2019 कुम्भ मेला भ्रमण करने वाले भक्तों को मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराना सुनिश्चित होगा। कुम्भ की दिव्यता और भव्यता को बढ़ाने के लिए नई तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है।

पूरे 50 दिन चलने वाले इस अर्द्ध कुंभ की सभी महत्वपूर्ण स्नान तिथियां.

1-मकर संक्रांति 14 जनवरी - कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति को पहले स्नान से होगी. इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान भी कहा जाता है. इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहले शोभा यात्रा निकलेंगी और फिर स्नान होगा. माघ महीने के इस पहले दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है. इसलिए इस दिन को मकर संक्रान्ति भी कहते हैं. लोग इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ दान भी करते हैं.

2. पौष पूर्णिमा 21 जनवरी-मान्यताओं के मुताबिक पौष महीने की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं. जो कि साल 21 जनवरी को है. इस दिन चांद पूरा निकलता है. इस पूर्णिमा के बाद ही माघ महीने की शुरुआत होती है. माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन विधिपूर्ण तरीके से सुबह स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है. वहीं, इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत कर दी जाती है. वहीं, इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है. इस दिन से कल्पवास भी आरंभ हो जाता है.

3. मौनी अमावस्या -4 फरवरी-तीसरा स्नान मौनी अमावस्या के दिन किया जाता है. मान्यता है कि इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था. मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है.

4. बसंत पंचमी -10 फरवरी-बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋ‍तु शुरू हो जाती है. कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है. वहीं, हिंदू मान्‍यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्‍वती का जन्‍म हुआ था. इस दिन पवित्र नदियों में स्‍नान का व‍िशेष महत्‍व है. पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्‍थानों पर बसंत मेला भी लगता है.

5. माघी पूर्णिमा-19 फरवरी- इस दिन सभी हिंदू देवता स्वर्ग से संगम पधारे थे. वहीं, माघ महीने की पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) को कल्पवास की पूर्णता का पर्व भी कहा जाता है. क्योंकि इस दिन माघी पूर्णिमा समाप्त हो जाती है. इस दिन संगम के तट पर कठिन कल्पवास व्रतधारी स्नान कर उत्साह मनाते हैं. इस दिन गुरू बृहस्पति की पूजा की जाती है.

6. महाशिवरात्रि -4 मार्च-कुंभ मेले का आखिरी स्नान महा शिवरात्रि के दिन होता है. इस दिन सभी कल्पवासियों अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं. भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं. मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतज़ार रहता है.

कब आरंभ हुआ कुंभ का मेला ?

कुंभ का आयोजन 525 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। माना जाता है कि 617-647 ईसवी में राजा हर्षवर्धन ने प्रयागराज में कुंभ में हिस्सा लिया था और अपना सब कुछ दान कर दिया करते थे। इससे पहले साल 2013 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन हुआ था। अगला महाकुंभ साल 2025 में लगेगा। जनवरी 2019 में प्रयागराज में अर्धकुंभ लग रहा है।

कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी।

मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा था,इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। जबकि कुछ दस्तावेज बताते हैं कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था।

कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियाँ हैं। वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ तथा अर्धकुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। परन्तु प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई. के समय से प्राप्त होते हैं। बाद में श्रीमद आघ जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की।

राशियों और ग्रहों से कुंभ का संबंध

गुरू एक राशि लगभग एक वर्ष रहता है। इस तरह बारह राशि में भ्रमण करते हुए उसे 12 वर्ष का समय लगता है। इसलिए हर बारह साल बाद फिर उसी स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है। लेकिन कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन होता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुंभ का विशेष महत्व है। हर 144 वर्ष बाद यहां महाकुंभ का आयोजन होता है।

महाकुंभ के संबंध में मान्यता

शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है।

कुंभ के लिए जो नियम निर्धारित हैं उसके अनुसार प्रयाग में कुंभ तब लगता है जब माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरू मेष राशि में होता है। । 1989, 2001, 2013 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2025 में लगेगा।

कुंभ योग के विषय में विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में बताया गया है कि जब गुरु कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब हरिद्वार में कुंभ लगता है। 1986, 1998, 2010 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला हरिद्वार में 2021 में लगेगा।

सूर्य एवं गुरू जब दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर लगता है। 1980, 1992, 2003 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2015 में लगेगा। 

गुरु जब कुंभ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुंभ लगता है। 1980,1992, 2004, के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2016 में लगेगा।  

कुंभ में महत्वपूर्ण ग्रह

कुंभ के आयोजन में नवग्रहों में से सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए इन्हीं ग्रहों की विशेष स्थिति में कुंभ का आयोजन होता है।

हालाकिं कुंभ का मेला किस स्थान पर लगेगा ये राशियों के अनुसार तय किया जाता है। हिंदु शास्त्रों के अनुसार इलाहाबाद प्रयाग में महाकुंभ माघ अमावस्या के दिन जब सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते है और गुरु मेष राशि में तब ही कुंभ का संयोग बनता है। जो आखिरी बार साल 2013 में 20 फरवरी को बना था। अब ये योग साल 2025 में बनेगा। इसी तरह हरिद्वार में महाकुंभ –लगता है जब गुरु कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेश राशि में प्रवेश करता है। हरिद्वार में अगला महाकुंभ 2021 में लगेगा। इसके अलावा नासिक में महाकुंभ –तब लगता है जब सूर्य और गुरु दोनों सिंह राशि में होते है।उज्जैन में कुँभ मेले –के आयोजन के लिए गुरु को कुंभ राशि में प्रवेश करना पड़ता है।

कुंभ मेले का आयोजन चार जगहों पर होता है:- हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।

प्रत्येक तीन वर्ष में आता है कुंभ : उक्त चार स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराम में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है। जैसे उज्जैन में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा। उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है।

कुंभ क्या है?:- कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।

अर्धकुंभ क्या है?:- अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

सिंहस्थ क्या है?:- सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है।

कुंभ का पर्व इन चार जगहों पर:-

1.हरिद्वार में कुंभ : हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।

2. प्रयाग में कुंभ : प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। 

अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

3. नासिक में कुम्भ : 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।

4. उज्जैन में कुंभ: सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।

कुंभ 2019 की तैयारियां प्रयागराज में जोरों पर हैं। हर तरफ सिर्फ कुंभ की ही चर्चा है। विभिन्न अखाड़ों के साधुओं ने प्रयागराज का रुख कर लिया है तो कुछ साधू संत काफी दिन पहले ही वहां जा बसे हैं। 

2019 का कुंभ उत्सव  कुछ है अलग

कुंभ के दौरान प्रयागराज में सभी सुविधाओं से लैस एक छोटा शहर बस जाता है। पूरे एक महीने तक यह शहर देश ही नहीं दुनियाभर के लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। यहां कल्पवास पर आए श्रद्धालु पूरे एक महीने के लिए सिर्फ साधना में लीन रहते हैं, पूरी दुनिया को भूलकर। गंगा की साफ-सफाई पर काफी पहले से काम चल रहा है। कुंभ के दौरान इस बात का खास खयाल रखा जा रहा है कि गंगा में किसी भी तरह से गंदा पानी और कूड़ा जमा न हो पाए।यूनेस्को द्वारा साल 2017 में कुंभ मेले को ‘ग्लोबल इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट’  में शामिल किया गया था। कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर यूनेस्कों ने अपनी सूची में शामिल करते हुए इसे पृथ्वी पर विभिन्न संप्रदायों के शांतिपूर्ण पर्व के तौर पर देखा था। क्योंकि कुंभ में किसी भी पंथ और धर्म को माननेवाले लोग जा सकते हैं।अपने श्रद्धालुओं और मेहमानों के लिए कुछ इस तरह सज रहे हैं प्रयागराज के घाट और धार्मिक स्थल। जहां संतों के लिए सब सुविधाओं से युक्त कुटिया हैं तो श्रद्धालुओं के लिए लग्जरी तंबू भी हैं, जो किसी लग्जरी होटल से कम नहीं हैं। इनकी कीमत 36 हजार तक है।

कुंभ के दौरान केवल धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां ही नहीं होंगी बल्कि श्रद्धालुओं और आगंतुकों की सेहत का भी पूरा ध्यान रखने की योजना है। इस दौरान हजारों की संख्या में आंखों का ऑपरेशन और लाखों की संख्या नें जरूरतमंद लोगों को चश्मों का वितरण करने की योजना है।नई पीढ़ी को कुंभ का महत्व बताने और वैदिक संस्कृति की जानकारी देने के लिए टेक्नॉलजी का सहारा लिया जा रहा है। साथ ही कुंभ क्यों लगता है और कब इसकी शुरुआत हुई जैसी बातें कुंभ की कहानी के जरिए यूट्यूब पर नवयुवको तक पहुंचाई जा रही है।दिव्यांगों के लिए कुंभ में विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। कुंभ के दौरान उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो इसके लिए कुंभ मेले में अलग से शौचालय और विश्राम गृह की व्यवस्था की जा रही है।

प्रयाग में संगम तट पर नाव की सवारी का आनंद लेने के साथ ही आप पक्षियों की चहचहाहट का आनंद ले सकते हैं, उन्हें दाना डाल सकते हैं और प्रकृति को बेहद नजदीक से महसूस कर सकते हैं।सूर्य की पहली किरण के धरती पर आने का समय हो या अमावस्या की अंधेरी रात। हर समस सुरक्षाकर्मी कुंभ में आए श्रद्धालुओं की देखरेख के लिए तैनात हैं।कुंभ के दौरान खून जमा देनेवाली सर्दी में जहां सभी लोग गर्म कपड़ों से लदे हुए नजर आते हैं, वहीं नागा साधुओं का तप और तपस्या जनवरी और फरवरी की ठंड पर भारी पड़ती है।साधु-सन्यासी और अखाड़े भारतीय पुरातन संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। सन्यास की भी अपनी संस्कृति होती है, अलग रिवाज और नियम-कायदे। कुंभ के दौरान इन्हें करीब से समझा जा सकता है।कुंभ साधु-संतों के लिए बड़ा पर्व होता है।

श्रद्धालु जहां प्रयागराज में कुंभ के दौरान एक महीने के कल्पवास पर जाते हैं, वहीं साधु-संत संगम तीर्थ पर तप करते हैं। यहां उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखा जाता है। कुंभ के रंग में प्रयागराज इस बार कुछ अलग अंदाज में रंगा है। यहां की दीवारें पुल और गलियां सभी एक स्वर में पौराणिक कथाएं सुना रही हैं। धर्म ग्रंथों में लिखे ऋषि-मुनियों के नाम से हमारा साक्षात्कार करा रही हैं।कुंभ के दौरान प्रयागराज के घाट, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप और हर जर्रा-जर्रा सिर्फ कुंभ की ही तैयारियां कर रहा है।

इन्हीं तैयारियों को अंतिम रूप देते कुछ पेंटर।दुनिया की मोह-माया से संयास लिया है लेकिन यादें तो संन्यासियों की भी होती हैं। पूरे शहर और खासतौर पर कुंभ क्षेत्र के आस-पास में बनी दीवारों पर सांस्कृतिक धरोहर, परंपरा और सामाजिक ताने-बाने को रंगों के माध्यम से उकेरा गया है। लंबी-लंबी दीवारों पर सजी ये पेंटिंग इनके बराबर में चलनेवाले को किसी चित्र कथा का चरित्र होने का अहसास कराती हैं।

प्रयागराज के संगम तट पर आप केवल नौका से ही नहीं बल्कि मोटर बोट से भी सवारी कर सकते हैं। कुंभ अपने आप में एक कंप्लीट ट्रिप है, जहां नई चीजें जानने के साथ ही घुमक्कड़ी का आनंद लिया जा सकता है।ढोल की थाप,घंटों की आवाज, धूपबत्ती की सुंगध और दीयों का निर्मल प्रकाश…कुछ इसी अंदाज में हो रहा है कुंभ का आगाज। दुनिया के भीतर की एक दुनिया, जो आपको अनछुई और एकदम नई लगेगी। बेगानों के बीच अपनापन महसूस करने और पुरातन भारत को जानने का पर्व है कुंभ।

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