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एस्ट्रोलॉजी

बदल गए हैं राहु- केतु, क्या ये बदलेंगे आपका भाग्य ?

March 06, 2019 09:09 AM

मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, चंडीगढ़, 

7 मार्च, 2019, वीरवार की सुबह 7 बजकर 54 मिनट पर राहु ग्रह उल्टी चाल से, कर्क राशि से निकल कर मिथुन राशि में आ गए हैंे तथा केतु धनु राशि में प्रवेश कर गए हैं।  और ये दोनों ग्रह इन राशियों में  यहां 18 महीने अर्थात 19 सितंबर, 2020 तक रहेंगे। 

राहु के विषय में कहा गया है कि यह नीले रंग के हैं। राहु-केतु के ग्रह परिवर्तन से राशियां पिछले गोचर की तुलना में अच्छी स्थिति में रहेंगी। राहु का गोचर चंद्र राशि से तीसरे, छठे, दसवें और 11 वें भाव में शुभ माना जाता है। राहु और केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह कहा जाता है। ये दोनों ग्रह एक ही राक्षस के शरीर से जन्मे हैं। राक्षस के सिर वाला भाग राहु कहलाता है, जबकि धड़ वाला भाग केतु। कुछ ज्योतिष इन्हें रहस्यवादी ग्रह मानते हैं। 

राहु का राशि परिवर्तन न केवल व्यक्ति विशेष के लिए अपितु अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर रूप से प्रभावकारी बनेगा। भौतिक जीवन में राहु नामक छाया ग्रह को जहां राजनीति का मूल कहा जाता है। जहां यह ग्रह अपनी शुभावस्था में बिना योग्यता के ही सर्वस्व देने की क्षमता रखता है, वहीं पापाक्रांत अवस्था में सर्वस्व समाप्त करने की भी क्षमता रखता है।राहु-केतु के राशि परिवर्तन में पंचांग भेद भी हैं। इस कारण क्षेत्र के हिसाब से राशि बदलने की तारीख अलग-अलग सकती है।

राहु का प्रवेश मिथुन में है। मिथुन राशि का स्वामी बुध है। कुछ ग्रंथों के अनुसार मिथुन राशि में राहु को उच्च का माना गया है। केतु का प्रवेश धनु राशि में है । इसी राशि में शनि भी स्थित है। इस कारण शनि और केतु का योग बनेगा। इससे 18 वर्ष पहले सन 2001-2002 में राहु मिथुन और केतु धनु राशि में थे। 19 सितंबर 2020 तक राहु मिथुन में और केतु धनु राशि रहेगा। 

 राहु के विषय में कहा गया है कि यह नीले रंग के हैं। राहु-केतु के ग्रह परिवर्तन से राशियां पिछले गोचर की तुलना में अच्छी स्थिति में रहेंगी। राहु का गोचर चंद्र राशि से तीसरे, छठे, दसवें और 11 वें भाव में शुभ माना जाता है। राहु और केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह कहा जाता है। ये दोनों ग्रह एक ही राक्षस के शरीर से जन्मे हैं। राक्षस के सिर वाला भाग राहु कहलाता है, जबकि धड़ वाला भाग केतु। कुछ ज्योतिष इन्हें रहस्यवादी ग्रह मानते हैं। 

केतु जो विवेकशून्य अर्थात् मस्तिष्कहीन ग्रह के नाम से जाना जाता है, वह राहु के राशि परिवर्तन के साथ ही धनु राशि में है। यह भी राहु के समान ही आगामी 18 माह तक धनु राशि में विचरण करेगा। यद्यपि केतु नामक ग्रह मंगल के समान फल देने के लिए जाना जाता है। परंतु इसका फल भावकारी अवस्था के साथ-साथ इसके बलाबल पर विचार करने पर ही किया जाना चाहिए। अपने गुप्त स्वभाव के कारण जहां इसे रहस्मय ग्रह कहा जाता है, वहीं यह असंभव को संभव एवं निश्चितता को अनिश्चितता में बदलने वाला भी होता है। 

राहू केतु जिन्हें खगोलशास्त्री बेशक ग्रह न मानते हैं लेकिन ज्योतिष शास्त्र में इन्हें बहुत प्रभावी माना जाता है। जन्म से वक्री राहू-केतु छाया ग्रह माने जाते हैं। एक राशि में दोनों ग्रह लगभग 18 महीने तक रहते हैं और अपना राशि चक्र 18 साल में पूरा करते हैं। राहू जहां शक्ति, शौर्य, पाप-कर्म, भय, शत्रुता, दुर्भाग्य, राजनीति, कलंक, धोखाधड़ी और छल-कपट आदि के कारक माने जाते हैं तो केतु समस्त मनोरोग, हृद्य रोग, विष जनित रोग, कोढ़, भूत-प्रेत, टोने-टोटके, आक्समिक दुर्घटना आदि के कारक माने जाते हैं। राहू और केतु के छाया ग्रह के रूप में स्थापित होने की कथाएं हिंदू पौराणिक ग्रंथों में मिलती हैं। क्या है राहू-केतु की कहानी और क्यों लगाते हैं सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण आइये जानते हैं। 

वेद के अध्ययन पर विचार करें, तो राहु का अधिदेवता काल और प्रति अधिदेवता सर्प है, जबकि केतु का अधिदेवता चित्रगुप्त एवं प्रति के अधिदेवता ब्रह्माजी है. राहु का दायां भाग काल एवं बायां भाग सर्प है. राहु एवं केतु सर्प ही है और सर्प के मुंह में जहर ही होता है. 

जब प्रसन्न हो राहु-केतु: इससे यह सिद्ध होता है कि राहु-केतु जिस पर प्रसन्न है, उसको संसार के सारे सुख सहज में दिला देते है एवं इसके विपरीत राहु-केतु (सर्प) क्रोधित हो जाए,तो मृत्यु या मृत्यु समान कष्ट देते हैं. सृष्टि का विधान रहा है, जिसने भी जन्म लिया है, वह मृत्यु को प्राप्त होगा. मनुष्य भी उसी सृष्टि की रचना में है, अत: मृत्यु तो अवश्यभांवी है. उसे कोई नहीं टाल सकता है. परंतु मृत्यु तुल्य कष्ट ज्यादा दुखकारी है. 

शास्त्रानुसार जो जातक अपने माता-पिता एवं पितरो की सच्चे मनसे सेवा करते है, उन्हें कालसर्प योग अनुकूल प्रभाव देता है. जो उन्हें दुख देता है, कालसर्प योग उन्हें कष्ट अवश्य देता है. कालसर्प के कष्ट को दूर करने के लिए कालसर्प की शांति अवश्य करना चाहिए एवं शिव आराधना करना चाहिए. 

अवन्ति खंड की कथा के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत का वितरण महाकाल वन में हुआ था। भगवान विष्णु ने यहीं पर मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पान कराया था। इस दौरान एक राक्षस ने देवताओं का रूप धारण कर अमृत पान कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था। अमृत पान के कारण उसके शरीर के दोनों भाग जीवित रहे और राहु और केतु के रूप में पहचाने गए। 

राहु-केतु के अस्तित्व की कहानी : दैत्यों की पक्ति में स्वर्भानु नाम का दैत्य भी बैठा हुआ था। उसे आभास हुआ कि मोहिनी रूप को दिखाकर दैत्यों को छला जा रहा है। ऐसे में वह देवताओं का रूप धारण कर चुपके से सूर्य और चंद्र देव के आकर बैठ गया जैसे ही उसे अमृत पान को मिला सूर्य और चंद्र देवता ने उसे पहचान लिया और मोहिनी रूप धारण किए भगवान विष्णु को अवगत कराया। इससे पहले ही स्वर्भानु अमृत को अपने कंठ से नीचे उतारता भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। क्योंकि उसके मुख ने अमृत चख लिया था इसलिए उसका सिर अमर हो गया। कथा बताती है कि ब्रह्मा जी ने सिर को एक सर्प के शरीर से जोड़ दिया यह शरीर ही राहु कहलाया और उसके धड़ को सर्प के सिर के जोड़ दिया जो केतु कहलाया। पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य और चंद्र देवता द्वारा स्वर्भानु की पोल खोले जाने के कारण राहु इन दोनों देवों का बैरी हो गए। 

कैसा रहेगा राशियों पर प्रभाव ? 

मेष: तृतीयेश राहु अत्यंत कल्याणकारी कहा जाएगा। पारिवारिक एवं सामाजिक रूप से जहां उन्नति प्रदान करेगा, वहीं पराक्रम में वृद्धि, आरोग्य वृद्धि, रुके हुए कार्यों को पूरा करने वाला सिद्ध होगा। चारों तरफ से सुख मिलता है। सोया भाग्य जाग उठता है।माता से धन प्राप्ति के योग बन रहे हैं। कारोबार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। नवम् भाव में केतु पूज्य कहा जाएगा। वाद-विवाद भाग्यावरोध एवं कार्यों में थोड़ा विघ्नता पैदा कर सकता है। 

वृष: राशि से द्वितीयस्थ राहु सामान्य फल प्रदान करने वाला कहा जाएगा। आर्थिक रूप से जहां यह संघर्ष कराने वाला कहा जाएगा। वहीं अपने लोगों से कष्ट, सरकार से असहयोग की स्थिति उत्पन्न करेगा। परिवार में अनावश्यक विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। अष्टम् भाव में केतु अचानक दुर्घटना अथवा स्वास्थ्य में परेशानी पैदा कर पैतृक संपदा में विवाद की स्थिति पैदा कर सकता है।संचित धन की हानि होती है। हवा-हवाई योजनाओं में धन खर्च होता है। वाणी दोष से छवि खराब होती है।कारोबार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। परिश्रम के अनुरूप परिणाम संदिग्ध हैं। धार्मिक कार्य में व्यवधान आ सकते हैं। 

मिथुन: राशि से गोचर कर रहा राहु मतिभ्रम की स्थिति पैदा करेगा। शारीरिक कष्ट, पत्नी से विवाद एवं संतान से मनमुटाव पैदा कर अहंकार की स्थिति उत्पन्न करेगा। सप्तम् भाव का केतु पत्नी से मानसिक तनाव भोग एवं पेट से संबंधित समस्या पैदा करेगा।अचानक धन प्राप्ति के योग बने रहे हैं। किसी रूके हुए धन की प्राप्ति हो सकती है,परन्तु खर्चों में भी वृद्धि होगी। अचानक बीमारी, भय से चिन्ता पैदा हो जाती है। फिजूल में मेहनत करती पड़ती है। 

कर्क: द्वादश राहु बेहद नकारात्मक परिणाम पैदा करेगा। अपव्यय नौकरी में स्थानांतरण, परिवार के सुख में बाधा, शत्रुओं से कष्ट एवं कष्टकारी यात्रा का योग बनाएगा। छठे भाव में गया हुआ केतु अदालती कार्यों से मुक्ति या विजय दिलाएगा। नई योजनाएं सफल बनाने में पूरा सहयोग प्रदान कराएगा। आत्मविश्वास में कमी आयेगी। रहन-सहन अव्यवस्थित हो सकता है। किसी पुराने मित्र के साथ यात्रा का कार्यक्रम बन सकता है। अचानक विघ्न-बाधा पैदा होती है। प्रियजनों को कष्ट से चिन्ता। रोजगार में कमी आती है। 

सिंह: एकादश भाव में गया हुआ राहु चातुर्दिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। धन में वृद्धि, सुख-सम्मान में बढ़ोत्तरी एवं रुके हुए कार्यों को संपन्न कराएगा। 

पंचम भाव में गया हुआ केतु पूजनीय है। मानसिक भ्रम एवं तनाव जोखिम भरा निर्णय, संतान के स्वास्थ्य में समस्या उत्पन्न करने वाला सिद्ध हो सकता है।नौकरी में अफसरों से मतभेद बढ़ सकते हैं। इच्छा-विरूद्ध कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल सकती है। परिश्रम अधिक रहेगा। 

कन्या: कन्या राशि के लिए दशमस्थ राहु परम कल्याणकारी है। मनोवांछित फल प्रदान करने वाला यह राहु राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यक्ति के लिए सर्वदा शुभकारी परिणाम देगा। राजनीतिक विजय, पदोन्नति के लिए अत्यंत उत्तम है। चतुर्थ भाव का केतु अचानक अपयश की स्थिति, माता के स्वास्थ्य में बाधा, भूमि विवाद एवं सीने से संबंधित, रोग पैदा कर सकता है। मन में नकारात्मक विचारों का प्रभाव रहेगा। वाणी में कठोरता का प्रभाव हो सकता है। कला एवं संगीत में रूचि रहेगी। 

तुला: आपकी राशि से नवमस्थ राहु पूजनीय है। अचानक चलते हुए कार्यों में भाग्यावरोध के कारण समस्या आ सकती है। ऐसी स्थिति में श्रेष्ठजन की सहायता आपके लिए सहायक सिद्ध हो सकती है। भाग्य के भरोसे किसी भी जोखिम को लेने में हानि का सामना करना पड़ सकता है। तृतीय भाव में केतु जहां पराक्रम में वृद्धि कराएगा, वहीं ऋण, रोग एवं शत्रुओं का दमन करेगा।क्रोध एवं आवेश की अधिकता रहेगी। शैक्षिक कार्यों में व्यवधान आ सकते हैं। मित्रों का सहयोग मिलेगा स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। हर प्रकार के कार्यों को  नुकसान हो सकता है। फिजूल की योजनाओं में धन का नुकसान। 

वृश्चिक: आपकी राशि के लिए राहु का गोचर बेहद खराब कहा जाएगा। अष्टमस्थ राहु शारीरिक कष्ट, बदनामी, लोकप्रियता में कमी, दुर्घटना, सेहत में बाधा, एवं अपयश की स्थिति पैदा करने वाला कहा जाएगा। द्वितीयस्थ केतु पारिवारिक विवाद के साथ-साथ संग्रह किए हुए धन को व्यय कराएगा एवं मुख से संबंधित रोग पैदा कर सकता है।नौकरी में अफसरों का सहयोग मिलेगा। तरक्की के मार्ग प्रशस्त होंगे। मित्रों का सहयोग मिलेगा। रहन-सहन कष्टमय हो सकता है। करीबी साथी धोखा देते हैं। दुर्घटना की आशंका रहती है। विवादों से छवि खराब होती है। 

धनु: राहु की सप्तमस्थ अवस्था छोटी सी सफलता के लिए बड़े संघर्ष कराएगी। यात्रा में कष्ट, समझौते में हानि एवं बाहरी व्यक्ति से क्षति का संकेत देती है। जन्म राशि पर गोचर कर रहा केतु आपके जीविकोपार्जन में व्यवधान देगा एवं अति चतुराई करने पर गंभीर नकारात्मक परिणाम प्रदान कर सकता है।पारिवारिक समस्याएं परेशान कर सकती हैं। रहन-सहन अव्यवस्थित रहेगा। चिकित्सीय खर्च बढ़ सकते हैं। 

मकर: इस राशि के लिए छठे भाव में गया हुआ राहु आगामी 18 माह तक सर्वथा ही कल्याणकारी परिणाम प्रदान कराएगा। शत्रु विजय, धन के विशिष्ट मार्ग का प्रारंभ होना, यश एवं प्रसिद्धि, रोगों से मुक्ति, शत्रुओं का दमन, नए भूमि एवं वाहन का योग बनाएगा। बारहवें घर में गया हुआ केतु व्यर्थ का व्यय विश्वासघात, चोरी से धनहानि, अनावश्यक यात्रा कराएगा।सन्तान की ओर से सुखद समाचार मिल सकते हैं। जीवनसाथी को स्वास्थ्य विकार हो सकते हैं। खर्च अधिक होंगे। संतान को लेकर तनाव की आशंका है। उच्च शिक्षा में बाधा। निवेशक से भय होता है। 

कुंभ: पंचम भाव में गया राहु संतान, धन, रोजगार की दिशा में नकारात्मक परिणाम प्रदान कर सकता है, लेकिन आपको सरकारी कार्यों में विशिष्ट सफलता दिलाएगा। एकादश भाव में गया हुआ केतु कल्याणकारी परिणाम प्रदान करने के साथ-साथ आर्थिक उन्नति भी देगा।क्षणे रूष्टा-क्षणे तुष्टा के भाव रहेंगे। दाम्पत्य सुख में वृद्धि होगी। वस्त्रों आदि पर खर्च बढ़ सकते हैं। आय में वृद्धि भी होगी। जीवनसाथी से अनबन। साझेदारों से संबंध टूट सकते हैं। 

मीन: चर्तुर्थस्थ राहु अशुभ परिणाम प्रदान करेगा। अचानक बदनामी, संतान से कष्ट, आर्थिक गिरावट एवं प्रत्येक कार्य में बाधा उत्पन्न करेगा।

राशि से दशमस्थ केतु सामान्य फलकारी है। संयम एवं चतुराई से कार्य करने पर थोड़े लाभ की संभावना कही जाएगी।वाणी में कठोरता का प्रभाव हो सकता है। भाई-बहनों के साथ किसी धार्मिक स्थान की यात्रा पर जा सकते हैं। सन्तान को कष्ट होगा। शिक्षा में बाधा, वाहन से कष्ट मिलता है। बुजुर्गों की सेहत को लेकर चिंता होती है।

राहु के दुष्प्रभाव से कैसे बचें  

तीसरे भाव में स्थित राहु पराक्रम में आशातीत बढ़ोत्तरी कर देता है। ऐसा राहु छोटे भाई को भी बहुत मजबूती देता है। यदि इस भाव में बैठे राहु को मित्र या शुभ ग्रहों की दृष्टि प्राप्त हो अथवा वह स्वयं उच्च या उच्चाभिलाषी हो तो अतिशय मात्रा में शुभ फलों की प्राप्ति होती है। 

छठे भाव में मजबूत स्थिति में बैठा राहु शत्रु व रोग नाशक बन जाता है। यदि छ्ठे स्थान पर शुक्र अथवा गुरु आदि शुभ ग्रहों की दृष्टि हो या इस स्थान पर शुक्र व राहु की युति हो तो ऐसी दशा में विशिष्ट शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऐसी दशा वाले जातक के शत्रु या तो होते नहीं और यदि होते हैं तो हार कर समर्पण कर देते हैं। यही नहीं ऐसा जातक शारीरिक रूप से काफी हृष्ट-पुष्ट होता है तथा बीमारी आदि समस्याएं उससे कोसों दूर होती हैं।  

एकादश स्थान पर मजबूत होकर बैठा राहु भी शुभता का द्योतक है। इस स्थिति में संबंधित जातक को व्यापार-उद्योग, सट्टा-लॉटरी, शेयर बाज़ार आदि में एकाएक भारी मात्रा में लाभ प्राप्त होता है। ऐसा जातक शत्रु नाशक तो होता ही है साथ ही जीवनोव्यापार में भी सफल रहता है।

आइए अब जानते हैं कि यदि राहु कुण्डली में अशुभ स्थिति में बैठा हो तो क्या उपाय किए जाएं ताकि भावी या चल रही समस्याओं का निराकरण हो सके: 

अगर आपके जन्मांक में राहु, चंद्र, सूर्य को दूषित कर रहा है तो जातक को भगवान शिवशंकर की सच्चे मन से आराधना करना चाहिए.सोमवार को व्रत करने से भी भगवान शिवशंकर प्रसन्न होते हैं. अतः सोमवार को शिव आराधना पूजन व्रत करने के पश्चात, शाम को भगवान शिवशंकर को दीपक लगाने के पश्चात् सफेद भोजन खीर, मावे की मिठाई, दूध से बने पदार्थ ग्रहण करना चाहिए.राहु महादशा में सूर्य, चंद्र तथा मंगल का अंतर काफी कष्टकारी होता है, अतः समयावधि में नित्य प्रतिदिन भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाकर दुग्धाभिषेक करना चाहिए.ॐ नमः शिवाय मंत्र का नाम जाप लगातार करते रहना चाहिए. 

1.   ॐ रां राहवे नमः प्रतिदिन एक माला जपें। 

2.   नौ रत्ती का गोमेद पंचधातु अथवा लोहे की अंगूठी में जड़वा लें। शनिवार को राहु के बीज मन्त्र द्वारा अंगूठी अभिमंत्रित करके दाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण कर लें।

राहु बीज मन्त्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: (108 बार) 

3.   दुर्गा चालीसा का पाठ करें। 

4.   पक्षियों को प्रतिदिन बाजरा खिलाएं। 

5.   सप्तधान्य का दान समय-समय पर करते रहें। 

6.   एक नारियल ग्यारह साबुत बादाम काले वस्त्र में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। 

7.   शिवलिंग पर जलाभिषेक करें। 

8.   अपने घर के नैऋत्य कोण में पीले रंग के फूल अवश्य लगाएं। 

9.   तामसिक आहार व मदिरापान बिल्कुल न करें। 

10.                       ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।। 

इस मंत्र को विशुद्ध उच्चारण के साथ तेज स्वर में पूरी राहु की दशा के दौरान कीजिए।

मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, मो-9815619620 , 458 सैक्टर 10, पंचकूला.134109

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