Sunday, 09 August 2026
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हसीना की प्रेस मीटिंग से कुछ खास नहीं निकला सिवाय बांग्लादेश लौटने की पुष्टि

नव ठाकुरीया

भारत की राजधानी नई दिल्ली में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर काफी चर्चा थी, लेकिन कई मीडिया आउटलेट्स द्वारा लाइव-स्ट्रीम किए गए इस कार्यक्रम में अवामी लीग प्रमुख के साथ केवल ऑडियो बातचीत हुई। इसमें उन्होंने बस यही दोहराया कि वह आने वाले दिसंबर में अपने देश लौटना चाहती हैं। वहां मौजूद कई पत्रकारों ने हसीना से बांग्लादेश लौटने के रोडमैप के बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने किसी खास तारीख या यात्रा के साधन का खुलासा नहीं किया। हालांकि, 5 अगस्त 2026 को ‘फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया’ द्वारा आयोजित इस प्रेस ब्रीफिंग के दौरान हसीना के बेटे साजीब वाजेद जॉय अमेरिका से लाइव जुड़े। उन्होंने माना कि अवामी लीग सरकार के खिलाफ छात्रों के बड़े पैमाने पर हुए विद्रोह के बाद, जब उनकी मां ने ठीक दो वर्ष पहले ढाका छोड़ा था, तब से भारत उन्हें लगातार समर्थन दे रहा है।

78 वर्षीय हसीना, जो 5 अगस्त 2024 से नई दिल्ली में स्वैच्छिक निर्वासन का जीवन बिता रही हैं, ने घर लौटने को लेकर वही बातें दोहराईं, जो पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों द्वारा प्रकाशित की जा चुकी थीं। दो वर्षों में पहली बार वर्चुअल माध्यम (असल में केवल ऑडियो) से सार्वजनिक रूप से संबोधित करते हुए बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी ने कहा कि ‘चाहे किस्मत में कुछ भी हो’, उन्हें वापस लौटना ही है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान अपने पिता के संघर्ष और अनगिनत मुक्तियोद्धाओं (स्वतंत्रता सेनानियों) के बलिदान को याद करते हुए हसीना ने भावुक स्वर में कहा कि जान का डर उनके बांग्लादेश लौटने के फैसले को नहीं बदल सकता। उन्होंने दिसंबर में लौटने का फैसला इसलिए किया क्योंकि यह विजय का महीना है। 16 दिसंबर 1971 को इस्लामाबाद के आत्मसमर्पण के बाद पाकिस्तान से बांग्लादेश का जन्म हुआ था।

अपने देश में जुलाई-अगस्त 2024 के विद्रोह का उल्लेख करते हुए हसीना ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष मकसद वाले लोगों ने नौकरी में कोटा सुधार आंदोलन में घुसपैठ की और इसे उनके इस्तीफे की मांग तक सीमित कर दिया। उनके अनुसार, शुरुआत में शांतिपूर्ण रहा विरोध-प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गया, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर हत्याएं, आगजनी तथा सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों पर हमले किए। हसीना ने कहा कि सुनियोजित विरोध-प्रदर्शन ने उन्हें बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर किया, लेकिन इससे उन्हें अपने प्रिय देश और वहां के लोगों से अलग नहीं किया जा सका। उन्होंने यह भी दावा किया कि 12 फरवरी 2026 के राष्ट्रीय चुनाव पहले से तय नतीजों वाले थे, क्योंकि उनकी पार्टी अवामी लीग को इसमें हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई। उनके अनुसार, बांग्लादेशी नागरिक आज भी भय, दमन और आर्थिक तंगी के साये में जीवन बिता रहे हैं।

प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने 8 अगस्त को सत्ता संभाली थी। यह तब हुआ, जब हसीना गणभवन (प्रधानमंत्री कार्यालय) से निकलकर भारत चली आईं, क्योंकि एक बेकाबू भीड़ ने वहां धावा बोल दिया था। इसके लगभग 18 महीने बाद हुए आम चुनाव में खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जीत दर्ज की और पार्टी प्रमुख तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बने। इस बीच, जुलाई-अगस्त 2024 के बड़े विद्रोह के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (बांग्लादेश) ने हसीना को कई मामलों में दोषी ठहराया, जिनमें उनकी अनुपस्थिति में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा भी शामिल है। उनकी पार्टी को देश में राजनीतिक गतिविधियां करने और चुनाव लड़ने से भी रोक दिया गया।

अंतरिम प्रशासन ने ढाका में लंबित मुकदमों का सामना करने के लिए शेख हसीना को भारत से वापस लाने की मांग भी की। प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस प्रशासन के नक्शेकदम पर चलते हुए बीएनपी सरकार ने भी नई दिल्ली से कई बार अनुरोध किया है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच हुई संधि के तहत उन्हें प्रत्यर्पित किया जाए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन शुरुआती वैश्विक नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने तारिक रहमान को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले ही बधाई दी थी। हालांकि, नई दिल्ली ने अब तक हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक रुख नहीं अपनाया है। इसकी झलक हाल में तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा में भी दिखाई दी, जिसमें भारत शामिल नहीं था, जबकि मलेशिया और चीन उनकी यात्रा सूची में थे। इसी बीच, उन्हें 12-13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आमंत्रित किया गया है, लेकिन खबरों के मुताबिक अब तक ढाका की ओर से इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

ढाका ने शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा कि नई दिल्ली ने एक दोषी व्यक्ति को ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि नरसंहार की आरोपी और फरार हसीना को मीडिया से सीधे संवाद का अवसर दिया गया, जहां ‘उन्होंने और उनके साथियों ने बांग्लादेश तथा वहां के लोगों के खिलाफ ज़हरीली बातें कहीं।’ मंत्रालय ने इसे ‘बांग्लादेश की संप्रभुता का अपमान और जुलाई क्रांति के शहीदों का गंभीर अनादर’ बताते हुए कहा कि इस कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए था। बयान में यह भी कहा गया कि बांग्लादेश भारत के साथ संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और राष्ट्रीय गरिमा के आधार पर रचनात्मक, पारस्परिक रूप से लाभकारी तथा भविष्योन्मुखी संबंध बनाए रखना चाहता है।

हालांकि, नई दिल्ली ने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम एक स्वतंत्र प्रेस क्लब द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके सदस्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत सरकार की इस कार्यक्रम के आयोजन में कोई भूमिका नहीं थी और न ही वह प्रेस ब्रीफिंग के दौरान व्यक्त किए गए किसी भी विचार का समर्थन करती है। उन्होंने यह भी दोहराया कि भले ही शेख हसीना को भारत में शरण मिली हुई है, लेकिन उन्हें भारतीय भूमि का उपयोग किसी अन्य संप्रभु देश के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के लिए करने की अनुमति नहीं है। माना जा रहा है कि नई दिल्ली हसीना पर भारत छोड़ने का दबाव नहीं बनाएगी और वह जब तक चाहें, यहां रह सकती हैं। जब तक ढाका की ओर से यह भरोसा नहीं दिया जाता कि बांग्लादेश लौटने पर उनके साथ कानूनी प्रावधानों के अनुरूप निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा, तब तक नई दिल्ली उनके प्रस्थान को लेकर कोई दबाव बनाने की संभावना नहीं रखती।

उसी दिन ढाका में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस की मौजूदगी में ‘जुलाई विद्रोह स्मारक संग्रहालय’ का उद्घाटन किया। यह संग्रहालय शेर-ए-बांग्ला नगर क्षेत्र स्थित ‘गणभवन’ परिसर को परिवर्तित कर बनाया गया है, जहां 2024 के घटनाक्रम के दौरान तोड़फोड़ हुई थी। प्रोफेसर यूनुस ने कहा कि यह संग्रहालय 2024 की क्रांति में शहीद हुए हजारों लोगों के अदम्य साहस और बलिदान को प्रदर्शित करेगा। उनके अनुसार, इस क्रांति को अब बांग्लादेश में लोकतंत्र के लिए संघर्ष के रूप में व्यापक पहचान मिल रही है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बांग्लादेशी नागरिक को इस संग्रहालय का दौरा करना चाहिए और ऐसे नए राष्ट्र के निर्माण के संकल्प से स्वयं को जोड़ना चाहिए, जहां फासीवाद और तानाशाही प्रवृत्तियों के लिए कोई स्थान न हो।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच, बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने शेख हसीना के स्वदेश लौटने के फैसले का समर्थन किया। दो वर्षों बाद उनके पहले सार्वजनिक ऑडियो संबोधन को सुनने के बाद तस्लीमा ने कहा कि बांग्लादेश में हसीना को निष्पक्ष और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय न्यायिक प्रक्रिया की गारंटी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह स्वयं तीन दशकों से अधिक समय से निर्वासन का जीवन जी रही हैं, इसलिए देश से दूर रहने की पीड़ा को भली-भांति समझती हैं। उन्होंने हसीना के राजनीतिक जीवन के अगले चरण की सफलता की भी कामना की।

नई दिल्ली में आयोजित हसीना के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग पर बांग्लादेश सरकार द्वारा मीडिया संस्थानों पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए तस्लीमा ने इसे अलोकतांत्रिक करार दिया। उन्होंने अवामी लीग पर लगी रोक तत्काल हटाने की मांग करते हुए कहा कि पार्टी प्रमुख को अपने स्वदेश लौटने के संघर्ष की याद अवश्य होगी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जब शेख हसीना 18 करोड़ की आबादी वाले मुस्लिम बहुल देश में गणभवन से शासन कर रही थीं, तब कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों के विरोध के कारण उन्हें स्वयं बांग्लादेश लौटने की अनुमति नहीं मिली थी। बाद के घटनाक्रम में, उनके अनुसार, शेख हसीना भी अंततः उन्हीं कट्टरपंथी ताकतों का शिकार हो गईं। (लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)