आर्थिक तौर पर कमजोर परिवारों को मजबूत करने किया एक रुपया और एक ईंट भेंट करने का मार्गदर्शन
अखिलेश बंसल
युग पवर्तक एवं अग्रवाल समाज के कुलपितामा महाराजा अग्रसेन जी महाराज का जन्म सूर्यवंशीय महाराजा वल्लभ सेन के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में आज से करीब 5150 वर्ष पूर्व हुआ था। जो की समस्त खांडव प्रस्थ, बल्लभ गढ़, अग्र जनपद (आज की दिल्ली, बल्लभ गढ़ और आगरा) के राजा थे। उनके शासन में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालु राजा थे। ये बल्लभ गढ़ और आगरा के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र, शूरसेन के बड़े भाई थे।
उल्लेखनीय है है कि महाराजा अग्रसेन जी, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पुत्र कुश के 34वीं पीढ़ी के हैं। जिन्होंने 15 वर्ष की आयु में पांडवों के पक्ष से महाभारत युद्ध लड़ा था। इस बारे में भगवान श्री कृष्ण जी ने एक टिप्पणी की है कि अग्रसेन जी कलयुग में एक युग पुरुष और अवतार होंगे जो जल्द ही द्वापर युग की समाप्ति के बाद आने वाले हैं। अग्रसेन सौरवंश के एक वैश्य राजा थे, जिन्होंने अपने लोगों के लाभ के लिए वानिका धर्म अपनाया था । अग्रवाल का अर्थ है “अग्रसेन की संतान” या ” अग्रोहा के लोग “, प्राचीन में एक शहर हरियाणा क्षेत्र में हिसार के निकट कुरु पंचला की स्थापना अग्रसेन ने की थी। गौरतलब है कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र के वृत्तांत ने भी पुष्टि की है कि महाराजा अग्रसेन एक सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे। जिनका जन्म महाभारत महाकाव्य काल में द्वापर युग के अंतिम चरणों में हुआ था, वे भगवान कृष्ण के समकालीन थे। वह राजा वल्लभ देव के पुत्र थे जो कुश (भगवान श्री राम के पुत्र) के वंशज थे। वह सूर्यवंशी राजा मान्धाता के वंशज भी थे ।
विवाह में इंद्र देव से हुआ सामना:
युवावस्था में महाराजा अग्रसेन जी को राजा नागराज कुमुद की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। स्वयंवर में देवताओं के राजा एवं स्वर्ग के देवता इंद्र भी पधारे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन को अपने पति के रूप में चुना और राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। इस विवाह से इंद्र देव जलन और गुस्से के चलते आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। क्योंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख सभी देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थता करने का आग्रह किया, जिससे अग्रसेन और इंद्र के बीच शांति हो सकी।
राज्य एवं समाज के लिए की तपस्या:
महाराज अग्रसेन ने अपनी प्रजा की खुशहाली के लिए काशी नगरी जाकर देवों के देव महादेव की घोर तपस्या की, जिससे महादेव भगवान ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गई तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अपने राज्य तथा प्रजा का पालन-पोषण व रक्षा करें, उनका राज्य हमेशा धन-धान्य से परिपूर्ण रहेगा|
समाजवाद के अग्रदूत कहलाए महाराजा अग्रसेन
महाराजा अग्रसेन जी महाराज को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले प्रत्येक परिवार की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक परिवार उसे एक तत्कालीन प्रचलन का एक सिक्का व एक ईंट देगा, जिससे आसानी से नवागन्तुक परिवार स्वयं के लिए निवास स्थान व व्यापार का प्रबंध कर सके। महाराजा अग्रसेन ने तंत्रीय शासन प्रणाली के प्रतिकार में एक नई व्यवस्था को जन्म दिया, उन्होंने पुनः वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य की पुनर्गठन में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया।
इस तरह महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोदय गणराज्य ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरू कर लेता था।
इसलिए किया क्षत्रिय वंश को त्याग:
माता महालक्ष्मी की कृपा से महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 गणराज्यो में विभाजित कर एक विशाल राज्य का निर्माण किया था, जो इनके नाम पर अग्रेय गणराज्य या अग्रोदय कहलाया। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 गणाधिपतियों के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। यज्ञों में बैठे इन 18 गणाधिपतियों के नाम पर ही अग्रवंश के साढ़े सत्रह गोत्रो (अग्रवाल एवं राजवंशी समाज) की स्थापना हुई। उस समय यज्ञों में पशुबलि अनिवार्य रूप से दी जाती थी। गौरतलब हो कि 17 यज्ञ पूर्ण हो चुके थे। जिस समय 18 वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, महाराज अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न माँस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने अहिंसा धर्म को अपना लिया। इधर अंतिम और अठाहरवे यज्ञ में यज्ञाचार्यो द्वारा पशुबलि को अनिवार्य बताया गया, ना होने पर गोत्र अधूरा रहने और क्षत्रिय वंश से वैश्य को अपनाने को कहा गया। परन्तु महाराजा अग्रसेन के आदेश पर अठारवें यज्ञ में नगेन्द्र ॠषि द्वारा नांगल गोत्र से अभिमंत्रित किया और उन्होंने क्षत्रिय वंश को त्याग वैश्य को अपनाया। महाराजा अग्रसेन जी ने कहा कि किसी जीव की हत्या करने से बेहतर है, वंश बदल लेना।
अग्रवाल समुदाय का हर गोत्र ॠषियों द्वारा मंत्रित
महाराजा अग्रसेन द्वारा, तब उस वंशकर – यज्ञ में आचार्य पद पर कुल पुरोहित महर्षि गर्ग का वरण किया गया, और महर्षि वेदव्यास ब्रह्मा पद पर अभिषिक्त किए गए। बहुत से उद्दीप्त तेजस्वी ऋषि उस यज्ञ में ऋत्विज हुए। उस महायज्ञ में महर्षि कश्यप, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि गौतम, महर्षि अत्रि, महर्षि जैमिनी, महर्षि महर्षि, महर्षि सकल, महर्षि भारवी, महर्षि शांडिल्य, धनुर्विद्या श्रृंगी, महर्षि तांड्य, महर्षि मुद्गल, ज्योतिष शास्त्र, महर्षि कौण्डिन्य, महर्षि आश्वलायक, महर्षि माण्डव्य, महर्षि गुरुव, ये सभी प्रमुख रूप से ऋत्विज बनाये गये।
उन्हीं यज्ञों के आयोजन से माधवी देवी के गर्भ से 18 पुत्र पैदा हुए जिनमें वे पुत्र क्रमशः) विभु, विक्रम, अजेय, विजय, अनल, नीरज, अमर, नागेन्द्र, सुरेश, श्रीमंत, सोम, धरणीधर, अतुल, अशोक, सुदर्शन, सिद्धार्थ, गणेश्वर और लोकपति हुए। इन अट्ठारहपुत्रों में विभुसेन ज्येष्ठ पुत्र थे। पुत्रों के जनम के बाद उन्हीं ऋषियों महर्षि तपस्वियों द्वारा उनके गोत्र के नाम गर्ग, गोयल, गोयन, बंसल, कंसल, सिंघल, मंगल, जिंदल, तिंगल, ऐरण, धारण, मधुकुल, बिंदल, मित्तल, तायल, भंदल, नागल और कुच्छल रखे गए।
विश्व में है अग्रवाल समाज की पहचान
महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पड़ोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण महाराजा अग्रसेन जी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पड़ता रहता था। समय के चलते अग्रवंश के परिवार भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी। वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण करते हैं। महाराजा अग्रसेन की राजधानी अग्रोहा थी। उनके शासन में अनुशासन का पालन होता था।
महाराजा अग्रसेन जी के जीवन पर कई पुस्तकें:
महाराजा अग्रसेन पर अनगिनत पुस्तके लिखी जा चुकी हैं। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र, जो खुद भी अग्रवाल समुदाय से थे, उन्होंने 1871 में “अग्रवालों की उत्पत्ति” नामक प्रामाणिक ग्रंथ लिखा है, जिसमें विस्तार से इनके बारे में बताया गया है। रामपुर-उत्तर प्रदेश के महान लेखक रवि प्रकाश ने महाराजा अग्रसेन पर “एक राष्ट्र एक जन” पुस्तक लिखी जिसमें महालक्ष्मी व्रत कथा का हिंदी पद्य अनुवाद भी है। प्रसिद्ध ग्रंथकार एवं युगऋषि श्री राम गोपाल बेदिल ने संस्कृत में “श्री अग्र भागवत” लिखा, जिसमें हर श्लोक का हिंदी भाषा में अनुवाद है। ताकि अग्रवाल समुदाय अपने कुल्पितामा महाराजा अग्रसेन जी महाराज के जीवन और उनके आदर्श को भलीभांति समझ सकें।
भारत सरकार द्वारा सम्मान
* 24 सितंबर 1976 में भारत सरकार द्वारा महाराजा अग्रसेन के नाम पर 25 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया।
* सन 1975 में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से 350 करोड़ रूपये में एक विशेष तेल वाहक पोत (जहाज) खरीदा, जिसका नाम “महाराजा अग्रसेन” रखा गया। जिसकी क्षमता 1,80,0000 टन है।
* राष्ट्रीय राजमार्ग-10 का आधिकारिक नाम महाराजा अग्रसेन के नाम पर रखा गया।
* दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास हैली रोड पर स्थित अग्रसेन की बावली है। यह 60 मीटर लम्बी व 15 मीटर चौड़ी बावड़ी है, जो पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में हैं।
* सन 2012 में भारतीय डाक अग्रसेन की बावली पर डाक टिकट जारी किया गया।