नव ठाकुरीया
काजीरंगा के आसपास स्थानीय समुदायों के भूमि अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वाले असम के चर्चित कार्यकर्ता प्रणब डोले आखिरकार जेल से बाहर आ गए हैं। गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत उनकी निवारक हिरासत रद्द किए जाने के बाद शुक्रवार शाम करीब सात बजे उन्हें गोलाघाट जिला जेल से रिहा कर दिया गया। करीब 118 दिनों की हिरासत के बाद अपने घर पहुंचे डोले ने शनिवार को कहा कि उनकी रिहाई लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों में विश्वास रखने वाले लोगों की जीत है।
रिहाई के एक दिन बाद अपनी प्रतिक्रिया में डोले ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की मनमर्जी पर NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करना चिंताजनक है। खासकर तब, जब किसी मूल निवासी समुदाय की जमीन और अधिकारों से जुड़े सवाल उठाने के कारण किसी व्यक्ति को इस कानून के तहत हिरासत में रखा जाए।
डोले के अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक देश या राज्य को केवल इसलिए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उन्होंने अपने समुदाय की वास्तविक समस्याओं और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई है। उन्होंने सवाल किया कि यदि लोग अपनी चिंताओं को व्यक्त करने से डरने लगेंगे, तो भारत में लोकतंत्र कैसे कायम रहेगा?
उन्होंने पिछले चार महीनों के घटनाक्रम को याद करते हुए कहा कि जेल में बिताए समय को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। हिरासत की परिस्थितियां उनके लिए अमानवीय, दमनकारी और गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली थीं। हालांकि, उन्होंने कहा कि लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को ऐसी चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ते रहना होगा।
डोले ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी की भूमिका की सराहना की। उनका कहना था कि पिछले चार महीनों में उन्होंने देखा कि युवा अब अपने अधिकारों, सच्चाई और न्याय के लिए संघर्ष की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं। लगातार दबाव और धमकियों के बावजूद युवाओं का आवाज उठाना उनके लिए उम्मीद की बात है।
उन्होंने बताया कि उनके वृद्ध माता-पिता, पड़ोसी, आंदोलन से जुड़े साथी और शुभचिंतक उनकी घर वापसी का इंतजार कर रहे थे। कई लोग उन्हें लेने जेल के दरवाजे तक पहुंचे थे, जबकि कुछ अन्य लोग किसी अप्रिय घटना अथवा प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका के बीच रातभर उनके घर के आसपास मौजूद रहे।
गुवाहाटी हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति सुस्मिता फुकन खौंड की खंडपीठ ने 6 नवंबर को प्रणब डोले की निवारक हिरासत को रद्द करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने अपने फैसले में असम सरकार की हिरासत संबंधी कार्रवाई को तथ्यों और कानून की कसौटी पर अस्थिर माना।
अदालत ने पाया कि राज्य सरकार ने डोले के खिलाफ पुराने आपराधिक मामलों को निवारक हिरासत का आधार बनाया था, जबकि इनमें से अधिकांश मामलों में उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका था अथवा आरोपमुक्त किया गया था। सरकार द्वारा उद्धृत 13 मामलों में से नौ में डोले को बरी किए जाने की बात सामने आई। अदालत ने संबंधित अधिकारियों की ओर से इन तथ्यों पर समुचित विचार नहीं किए जाने पर सवाल उठाया।खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि हिरासत में रखने वाले अधिकारियों ने इस बात पर अपना विवेकपूर्ण विचार नहीं किया कि डोले की गतिविधियों से निपटने के लिए देश के सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त क्यों नहीं थे। अदालत के अनुसार, निवारक हिरासत जैसे कठोर प्रावधान का इस्तेमाल करने से पहले इस पहलू पर विचार करना आवश्यक था।
विदेश यात्राओं और कथित विदेशी धनराशि प्राप्त करने से जुड़े आरोपों पर भी अदालत ने सवाल उठाए। केवल विदेश यात्राएं करना अपने आप में किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखने का आधार नहीं हो सकता। सरकार की ओर से इन यात्राओं और कथित विदेशी लेन-देन का राज्य की सुरक्षा अथवा सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से निकट संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई थी।
इसके अतिरिक्त, हिरासत के आधार के रूप में इस्तेमाल किए गए जरूरी दस्तावेज डोले को उपलब्ध नहीं कराए गए थे। इससे उन्हें अपनी हिरासत के खिलाफ प्रभावी अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के अधिकार पर असर पड़ा। अदालत ने 10 अगस्त को प्रस्तुत उनकी दूसरी अभ्यावेदन पर समय रहते कार्रवाई नहीं किए जाने को भी गंभीर प्रक्रियागत चूक माना।इन आधारों पर खंडपीठ ने राज्य सरकार का हिरासत आदेश निरस्त कर दिया और डोले को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
प्रणब डोले ग्रेटर काजीरंगा लैंड एंड ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के संयोजक हैं। वह काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के निकट प्रस्तावित एक पांच सितारा होटल परियोजना के खिलाफ स्थानीय समुदायों के भूमि अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
इस सिलसिले में गोलाघाट पुलिस ने जुलाई में उन्हें गिरफ्तार किया था। 29 जुलाई को गोलाघाट की एक अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी। हालांकि, अगले ही दिन 30 जुलाई को असम सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) के तहत उनकी निवारक हिरासत का आदेश जारी कर दिया। इस कारण जमानत मिलने के बावजूद वह गोलाघाट जिला जेल से बाहर नहीं आ सके।
राज्य सरकार ने हिरासत के पक्ष में डोले के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों, कथित विदेशी लेन-देन और उनकी गतिविधियों को सार्वजनिक व्यवस्था तथा राज्य की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल बताया था। डोले ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए गुवाहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के निकट हाथीखुली क्षेत्र के इंगले पाथर गांव में प्रस्तावित लग्जरी होटल परियोजना से जुड़ी है। असम पर्यटन विकास निगम को परियोजना के लिए जमीन सौंपे जाने के बाद स्थानीय समुदायों में असंतोष बढ़ा था।
प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि परियोजना के लिए कृषि भूमि और सामुदायिक चरागाहों के उपयोग से स्थानीय परिवारों के पारंपरिक भूमि अधिकार तथा आजीविका प्रभावित हो सकते हैं। उनका यह भी कहना था कि इस तरह के बड़े पर्यटन विकास से काजीरंगा के संवेदनशील पर्यावरण और आसपास रहने वाले मूल निवासी समुदायों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
स्थानीय लोगों ने परियोजना के लिए लगभग 30 बीघा जमीन आवंटित किए जाने तथा व्यापक भू-उपयोग बदलावों को लेकर भी सवाल उठाए थे। आंदोलनकारियों का दावा था कि 60 बीघा से अधिक कृषि और सामुदायिक भूमि को उचित सार्वजनिक परामर्श के बिना पुनर्वर्गीकृत किया गया। इन दावों और जमीन आवंटन की प्रक्रिया को लेकर विवाद लगातार बढ़ता गया।
28 जून 2026 को इसी परियोजना के विरोध में प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इसके बाद पुलिस ने डोले और अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की। पुलिस ने परियोजना स्थल में कथित अवैध प्रवेश, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा और अन्य आपराधिक गतिविधियों के आरोप लगाए थे। डोले के समर्थकों ने इन आरोपों और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए।
डोले की गिरफ्तारी और बाद में NSA के तहत हिरासत ने असम के बाहर भी नागरिक अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों का ध्यान आकर्षित किया था।
कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन सहित कई संगठनों ने निवारक हिरासत कानून के इस्तेमाल की आलोचना की। लगभग 60 नागरिक समाज समूहों, संगठनों, ट्रेड यूनियनों और जागरूक नागरिकों ने भी उनकी लंबी हिरासत के खिलाफ आवाज उठाई थी। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने उनकी रिहाई की मांग की।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी NSA के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे। असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने आरोप लगाया था कि सरकार असहमति की आवाज को दबाने के लिए कठोर कानूनी प्रावधानों का सहारा ले रही है। बोकाखाट में आयोजित विरोध कार्यक्रमों में भी डोले की बिना शर्त रिहाई की मांग उठी थी।भूमि अधिकार संयुक्त संग्राम समिति ने अगस्त में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को ज्ञापन सौंपकर डोले की रिहाई और प्रस्तावित होटल परियोजना रद्द करने की मांग की थी। सेव काजीरंगा अभियान से जुड़े लोगों ने भी काजीरंगा की पारिस्थितिकी, स्थानीय समुदायों की आजीविका और पारंपरिक भूमि अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था।
प्रणब डोले की रिहाई ने उनके समर्थकों और स्थानीय समुदायों को बड़ी राहत दी है, लेकिन काजीरंगा के आसपास प्रस्तावित पर्यटन परियोजना तथा भूमि अधिकारों को लेकर विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। इसकी जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी के साथ आसपास रहने वाले समुदायों की आजीविका और पारंपरिक अधिकार भी इस क्षेत्र के भविष्य से जुड़े हैं। ऐसे में किसी भी बड़े पर्यटन अथवा बुनियादी ढांचा परियोजना के आर्थिक लाभ के साथ उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों पर भी विचार करना आवश्यक है।डोले की हिरासत रद्द करने का हाई कोर्ट का फैसला एक व्यापक संवैधानिक सवाल भी सामने लाता है—क्या भूमि, पर्यावरण और समुदायों के अधिकारों को लेकर आवाज उठाने वाले नागरिकों के विरुद्ध निवारक हिरासत जैसे असाधारण कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल उचित है?
फिलहाल डोले की रिहाई के बाद काजीरंगा के भूमि अधिकार आंदोलन को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्थानीय समुदायों की चिंताओं, प्रस्तावित होटल परियोजना और क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है। (लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)
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असम: भूमि अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले बाहर, NSA पर उठाए सवाल