हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशक डॉ. सागर प्रीत हुड्डा ने कथा में की शिरकत
चंडीगढ़: चंडीगढ़ के सेक्टर-34 स्थित मेला ग्राउंड में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ के छठे दिन भक्ति, ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला। ‘भजो राधे गोविंद’ और ‘हरि बोल’ के जयघोष से पूरा कथा पंडाल भक्तिमय हो उठा। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति रस में डूबकर भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का श्रवण किया। नंदगांव और बरसाना से आए ब्रजवासियों की उपस्थिति ने आयोजन की धार्मिक गरिमा को और बढ़ा दिया।
इस पावन अवसर पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया तथा चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशक डॉ. सागर प्रीत हुड्डा विशेष रूप से कथा श्रवण करने पहुंचे। प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश महाराज जी और अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने अपने आध्यात्मिक प्रवचनों से श्रद्धालुओं को भक्ति, प्रेम और सनातन संस्कृति का संदेश दिया। आयोजन से जुड़े ट्रेस लाउंज के प्रबंध निदेशक मुनीश बजाज और प्रसिद्ध गायक बी प्राक ने मुख्य अतिथियों का अंगवस्त्र एवं स्मृति चिह्न भेंट कर स्वागत किया।
कथा के दौरान इंद्रेश महाराज जी ने वृंदावन की दिव्यता का वर्णन करते हुए कहा कि वृंदावन केवल पृथ्वी का एक हिस्सा नहीं, बल्कि श्रीजी अर्थात श्री राधा रानी जी की नित्य दिव्य रचना है। उन्होंने बताया कि सामान्य सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी से जुड़ी है, लेकिन वृंदावन की आध्यात्मिक महिमा इससे भी परे है। जब भगवान श्रीकृष्ण ब्रज लीला के लिए पृथ्वी पर आने लगे, तब श्रीजी ने कहा कि जहाँ वृंदावन, गिरिराज जी और यमुना जी नहीं होंगे, वहाँ उनका जाना संभव नहीं है। इसी प्रसंग के माध्यम से महाराज जी ने ब्रजभूमि की अलौकिक महिमा और श्री राधा रानी जी के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया।
प्रसिद्ध कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने भगवान और भक्त के अटूट प्रेम को सुदामा जी के प्रसंग के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि जब भक्त भगवान की ओर दो कदम बढ़ाता है, तो भगवान उसकी ओर सौ कदम बढ़ाकर आते हैं। सुदामा जी और भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि सच्ची भक्ति में प्रेम, विश्वास और समर्पण का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति और धर्म की परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में धार्मिक कथाओं की अहम भूमिका है। यदि मनुष्य वर्ष के 365 दिनों में से केवल सात दिन भी प्रभु की कथा और सत्संग के लिए निकाल ले, तो उसे जीवन की सही दिशा प्राप्त हो सकती है।
हरिनाम की महत्ता समझाते हुए महाराज जी ने कहा कि मनुष्य को नाम-स्मरण को केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि अपने जीवन का आध्यात्मिक आधार मानना चाहिए। जिस प्रकार व्यक्ति धन को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन समझता है, उसी प्रकार हरिनाम को जीवन का पोषण और आत्मिक शांति का माध्यम स्वीकार करना चाहिए। भगवान के नाम का निरंतर स्मरण मनुष्य को सकारात्मकता, धैर्य और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
गुरु-शिष्य परंपरा की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए कथा में एक दृष्टांत भी सुनाया गया। इसके माध्यम से समझाया गया कि गुरु का दायित्व केवल दक्षिणा प्राप्त करना नहीं, बल्कि शिष्य को सही ज्ञान, संस्कार और धर्म का मार्ग दिखाना है। गुरु बनना एक बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि गुरु के मार्गदर्शन का शिष्य के जीवन और आध्यात्मिक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को गुरु के प्रति सम्मान के साथ-साथ उनके कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों पर भी विचार करने का संदेश दिया।
श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन पूरा कथा स्थल भक्ति और श्रद्धा से सराबोर नजर आया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, वृंदावन की दिव्यता और सनातन संस्कृति के आध्यात्मिक संदेशों का श्रवण किया। हरिनाम के जयघोष और भक्तिमय वातावरण के बीच आयोजित कथा ने श्रद्धालुओं को प्रेम, सेवा, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
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श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, वृंदावन को बताया श्रीजी की दिव्य रचना