Monday, 31 August 2026
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“अश्लीलता” का दायरा और परिभाषा बदलने की ज़रूरत

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

बड़ा अच्छा है जंग टल गई। बहुत जल्दी समझौता हो गया। दो बहुत बड़े विद्वानों के बीच शुरू हुआ वाक युद्ध जल्दी थम गया। एक टीवी ऐंकर की मार्फत सरकार ने दोनों महान देशभक्तों को संदेश दिलाया कि एक दूसरे के कपड़े फाड़ने से कुछ मिलने वाला नहीं। इस हमाम में तुम दोनों नंगे हो। वैसे तो ये दोनों नंगे ही रहते हैं, एक के किरदार के लिए कम और एक खास रंग के पहनना उसकी मजबूरी है तो दूसरी की रोज़ी रोटी कम से कम कपड़े पहने से चलती है।

इन दोनों बड़ी हस्तियों ने जिस भाषा का इस्तेमाल एक दूजे के लिए किया उससे इनकी भाषा, संस्कृति और विद्वत्ता खुल कर सामने आ गा गई। खास करके उस महिला ने जो अलंकार बाबा के लिए इस्तेमाल किए उनमें सच्चाई कितनी है वह तो बाबा जी और वो मोहतरमा ही जानें, क्योंकि वो इतने निजी हैं कि उन दोनों के अलावा इसी दूजे को मालूम हो ही नहीं सकते। इन दोनों के आपसी संवाद सुनने या पढ़ने के बाद मेरे जैसे कलमकार को लगता है कि अब हमें अश्लीलता की परिभाषा बदलनी चाहिए। और मां बहिन की गालिओं को इस दायरे से बाहर कर देना चाहिये। वैसे भी तो आजकल टीवी की बहस में कई बाबाओं और प्रवक्ताओं के मुख से गाली ग्लोज सुनने को मिल जाती है। यहां तक कि महिला ऐंकर के होते हुए भी यह सब चलता रहता है। तो जाहिर है कि अब गली मुहल्लों में दी जाने वाली गाली हमारे सभ्य समाज में स्वीकार कर ली गई है। बधाई हो, उन सभी को जो इन अलंकारों का सदियों से इस्तेमाल करते आए हैं।

इसे भी हम अपने देश की तरक्की का ही हिस्सा मान सकते हैं। विकास जब होगा तो हर चीज़ का होगा। गालियाँ भी उसमें शामिल हैं।